आज से पितृपक्ष शुरू, पितरों के पिंडदान के लिए क्यों प्रसिद्ध है नारायणी शिला? भगवान के कमलासन से क्या है संबंध

आज से पितृपक्ष शुरू, पितरों के पिंडदान के लिए क्यों प्रसिद्ध है नारायणी शिला? भगवान के कमलासन से क्या है संबंध


होमताजा खबरधर्म

आज से पितृपक्ष शुरू, पितरों के पिंडदान के लिए क्यों प्रसिद्ध है नारायणी शिला?

Last Updated:

Pitru Paksha 2026 Today: आज से पितृपक्ष की शुरुआत हो चुकी है और इन दिनों पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए श्राद्ध कर्म, पिंडदान, तर्पण आदि कार्य किए जाते हैं. साथ ही पितृपक्ष के दौरान हरिद्वार स्थित नारायणी शिला पर पिंडदान और श्राद्ध कर्म का विशेष महत्व है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह स्थान भगवान विष्णु के हृदय (कमल रूपी स्थान/कमलासन) का प्रतीक माना जाता है. आइए जानते हैं इस स्थान के बारे में खास बातें…

Zoom

Pitru Paksha 2026 Today: पितृपक्ष की आज से शुरुआत हो चुकी है और इसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के दिन होगा. पितृपक्ष की यह अवधि पितरों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा प्रकट करने का 16 दिनों का एक पवित्र काल है. इस दौरान पितरों के नाम का तर्पण, दान और श्राद्ध कर्म किया जाता है और आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है. पितृपक्ष में पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए कई श्रद्धालु धर्मनगरी हरिद्वार पहुंचते हैं. इस पवित्र स्थल को गंगा स्नान और मोक्ष की नगरी कहा जाता है, लेकिन यहां की एक शिला ऐसी भी है जो पितरों की मुक्ति का द्वार मानी जाती है. वह है नारायणी शिला.

नारायणी शिला मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित
हरिद्वार में गंगा तट पर स्थित यह प्राचीन तीर्थस्थल पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध है. गयाजी के बाद इसे पितृ कर्म के लिए सर्वोच्च स्थान माना जाता है. खासकर पितृ पक्ष में यहां देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु अपने पूर्वजों की शांति के लिए पहुंचते हैं. नारायणी शिला मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है. धार्मिक मान्यताओं और स्कंद पुराण के अनुसार यह शिला भगवान विष्णु के श्रीविग्रह का हृदय स्थल है. मान्यता है कि यहां की गई प्रार्थना सीधे भगवान विष्णु तक पहुंचती है और यहां पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष मिलता है.

नारायणी शिला मंदिर की पौराणिक कथा
वायु पुराण और स्कंद पुराण के केदारखंड में गयासुर की कथा का उल्लेख मिलता है. कथा के अनुसार, गयासुर ने नारदजी से अपने पापों से मुक्ति का उपाय पूछा. नारदजी ने कहा कि कठोर तप से या भगवान से युद्ध कर उनके हाथों मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है. असुर बुद्धि से गयासुर बद्रीधाम में भगवान बदरीनाथ के दर्शन करने गया, लेकिन मंदिर के कपाट बंद होने पर क्रोधित होकर वह भगवान के कमलासन को उठाकर ले जाने लगा.

इन तीन भागों में टूटा कमलासन
तभी भगवान विष्णु ने केस-लोचन तीर्थ में उसे रोका. दोनों में घोर युद्ध हुआ. युद्ध के दौरान भगवान ने गदा से प्रहार किया और गयासुर ने कमलासन को ढाल बनाकर बचाव किया. इस प्रहार से कमलासन तीन भागों में टूट गया. इसका एक भाग हरिद्वार में गिरा, जहां नारायणी शिला मंदिर स्थापित हुआ, दूसरा भाग बद्रीनाथ के ब्रह्मकपाल में और तीसरा भाग गयाजी में गिरा. गंगा के पवित्र तट पर स्थित नारायणी शिला इसलिए पितृ पक्ष के दौरान खास आकर्षण का केंद्र बन जाती है. आस्था रखने वालों के लिए यह वह स्थान है, जहां वे अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए उनकी शांति की कामना करते हैं.

15 दिन में 16 श्राद्ध कर्म
पितृपक्ष की शुरुआत हमेशा आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होती है और समापन आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि यानी सर्वपितृ अमावस्या को होता है. साल 2026 में पितृपक्ष 27 सितंबर यानी आज से शुरू हो चुके हैं और समापन 10 अक्टूबर दिन शनिवार को होगा. इस बार 15 दिनों में 16 दिन के श्राद्ध किए जाएंगे, दरअसल तिथि के क्षय के कारण 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध कर्म एक ही दिन किया जाएगा. ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, पूर्वजों की मृत्यु की तिथि के अनुसार ही उनका श्राद्ध उसी तिथि पर किया जाता है. वहीं जिन दिवंगत परिजनों की मृत्यु तिथि के बारे में जानकारी नहीं है तो उनका श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या के दिन किया जाता है.



Source link