कौन हैं एडवोकेट शैलेंद्र मणि त्रिपाठी? SC में ज्ञानेश कुमार की बढ़ाई टेंशन
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Who is Shailendra Mani Tripathi: CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका के बाद एडवोकेट शैलेंद्र मणि त्रिपाठी चर्चा में हैं. दिल्ली में प्रैक्टिस करने वाले त्रिपाठी ने SIR के दौरान वोटर लिस्ट से नाम हटाने और कथित एकतरफा फैसलों को लेकर सवाल उठाए हैं. उनकी कानूनी सक्रियता केवल इसी मामले तक सीमित नहीं है. वह महिलाओं के पीरियड लीव से जुड़े मामलों में भी सुप्रीम कोर्ट का रुख कर चुके हैं. 2022 में उन्होंने वकीलों के गर्मियों में काला कोट पहनने की अनिवार्यता से राहत की मांग वाली याचिका भी दायर की थी. अब CEC के खिलाफ उनकी याचिका ने उन्हें फिर सुर्खियों में ला दिया है.
कौन हैं शैलेंद्र मणि त्रिपाठी जिन्होंने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लगाई याचिका. (फाइल फोटो)
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इन दिनों संकट में हैं. जब से इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में SIR में हेरफेर और चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद के दावे किए गए हैं तब से वह मुश्किलों में घिरे हुए नजर आ रहे हैं. कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल उनके खिलाफ प्रदर्शन कर रही है ओर इस्तीफे की मांग कर रही है. इस बीच उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई. इस याचिका को दाखिल करने वाले है एडवोकेट शैलेंद्र मणि त्रिपाठी. याचिका दाखिल करने के बाद वह चर्चा में हैं. दिल्ली में प्रैक्टिस करने वाले त्रिपाठी ने SIR को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए याचिका दाखिल की है. इसमें वोटर लिस्ट से बड़ी संख्या में नाम हटाने और कथित एकतरफा फैसलों की जांच की मांग की गई है. मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि एस्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि दोनों आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कई फैसलों पर आपत्ति जताई. ऐसे में अब ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची याचिका ने चुनाव आयोग को लेकर चल रही बहस को और चर्चा में ला दिया है.
शैलेंद्र मणि त्रिपाठी का नाम हालांकि सिर्फ इसी मामले से नहीं जुड़ा है. वह सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता हैं. सार्वजनिक हित से जुड़े कई मुद्दों पर वह अदालत का रुख कर चुके हैं. इनमें महिलाओं और छात्राओं के लिए पीरियड लीव से जुड़ी याचिकाएं खास तौर पर चर्चा में रही हैं. उन्होंने 2023 में इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. इसके बाद 2024 और 2026 में भी इसी विषय पर याचिकाएं दाखिल की गईं. अदालत ने इसे नीतिगत विषय माना और केंद्र सरकार से इस पर विचार करने को कहा. यानी त्रिपाठी की कानूनी सक्रियता केवल चुनाव से जुड़े मामलों तक सीमित नहीं रही है.
SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में क्या मामला है?
- शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की मौजूदा याचिका में SIR प्रक्रिया से जुड़े फैसलों और वोटर लिस्ट में बदलावों को लेकर सवाल उठाए गए हैं. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक याचिका में वोटर लिस्ट से करीब 13 करोड़ नाम हटाए जाने के दावे की जांच की मांग की गई है. इसके अलावा Form 6 में कथित अनधिकृत बदलावों को रद्द करने और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी बताई गई है.
- यह याचिका उस रिपोर्ट के बाद चर्चा में आई जिसमें चुनाव आयोग के दो आयुक्तों की आपत्तियों का जिक्र था. रिपोर्ट के मुताबिक सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कुछ फैसलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं. इनमें मतदाता पंजीकरण और नाम हटाने या बहाल करने से जुड़े मुद्दे भी शामिल बताए गए थे. हालांकि चुनाव आयोग ने संस्थागत टूट की धारणा को खारिज किया है और कहा है कि अलग-अलग विचार संस्थागत विचार-विमर्श का हिस्सा होते हैं.
पीरियड लीव से लेकर काले कोट तक दायर की याचिकाएं
- शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की कानूनी सक्रियता के कई दूसरे उदाहरण भी सामने आते हैं. 2022 में उन्होंने वकीलों के लिए गर्मियों के दौरान काले कोट की अनिवार्यता से राहत की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. हालांकि अदालत ने उस याचिका को सुनवाई योग्य नहीं माना था. महिलाओं के पीरियड लीव से जुड़ी उनकी याचिकाएं भी लंबे समय से चर्चा में रही हैं. इन मामलों में उन्होंने कामकाजी महिलाओं और छात्राओं से जुड़े मुद्दे को सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनाने की कोशिश की.
- उपलब्ध जानकारी में शैलेंद्र मणि दिल्ली में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन से जुड़े वकील के तौर पर सामने आते हैं. उनकी हालिया याचिका ने उन्हें एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया है.
- इस मामले से जुड़ी एक अलग कानूनी पहल भी सामने आई है. 24 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता बृजेश सिंह ने अटॉर्नी जनरल की वैधानिक सहमति मांगते हुए CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की मांग की.
- उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हवाला दिया और चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर सवाल उठाए. उन्होंने टीएन शेषन बनाम भारत संघ और अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी उल्लेख किया. हालांकि यह पहल शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की याचिका से अलग है. इसलिए दोनों मामलों को एक ही कानूनी कार्रवाई मानना सही नहीं होगा.