Badrinath Dham DJ Concert Row: जहां भगवान विष्णु करते हैं योग निद्रा, वहां तेज DJ का शोर! जानें बद्रीनाथ धाम क्यों वर्जित है शंख बजाना?

Badrinath Dham DJ Concert Row: जहां भगवान विष्णु करते हैं योग निद्रा, वहां तेज DJ का शोर! जानें बद्रीनाथ धाम क्यों वर्जित है शंख बजाना?


Badrinath Dham DJ Concert Row: बद्रीनाथ धाम में हाल ही में सांस्कृतिक महोत्सव के दौरान शोर-शराबे वाले संगीत और नाच-गाने के कार्यक्रम को लेकर उठ रहे विरोध के स्वरों को अब वरिष्ठ बीजेपी नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी का समर्थन भी मिल गया है. डॉ. जोशी ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में बद्रीनाथ धाम में शोर-शराबे वाले संगीत समारोह के आयोजन को अनुमति प्रदान करने को ना केवल सांस्कृतिक मर्यादाओं का उल्लंघन बताया बल्कि कहा कि यह धाम की पवित्रता पर भी सीधा आघात है. धार्मिक परंपराओं के अनुसार, इस पवित्र धाम में पूजा के दौरान शंख बजाना भी मना है. आइए जानते हैं यहां आखिर पूजा में भी शंख बजाना क्यों मना है.

भारतीय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों की घोर उपेक्षा
आदि गुरु शंकराचार्य ने बद्रीनाथ धाम की स्थापना हिमालयी पर्यावरण में शांतिपूर्ण तरीके से भगवत भजन के लिए की थी. अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए बीजेपी नेता ने कहा कि उल्लेखनीय है कि इस स्थान पर शंख बजाना भी मना है लेकिन हम उसे भूलकर शोर-शराबे वाले संगीत कार्यक्रमों का आयोजन कर भारतीय आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय मूल्यों की घोर उपेक्षा तो कर ही रहे है, साथ में इतनी ऊंचाई पर हजारों लोगो के नाचने से उनके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की भी उपेक्षा कर रहे है. यह इस बात का प्रतीक है कि अब देवभूमि को बाजारू संस्कृति के रूप में परिणीत किया जा रहा है.

भारतीयों की आस्था पर गहरा आघात
उन्होंने शंकराचार्यों तथा महात्माओं से संस्कृति के इस क्षरण को रोकने के लिए प्रभावी रूप से आवाज उठाने का अनुरोध किया तथा कहा कि केंद्र एवं राज्य सरकार से भी उनका आग्रह है कि वे ऐसे आयोजनों पर प्रतिबंध लगाकर देवभूमि की मर्यादा को बनाए रखें. उन्होंने कहा कि हिमालय देवात्मा है, भगवान शंकर का निवास और मां गंगा का उद्गम है, इसे नाच ग्रह बनाना करोड़ो भारतीयों की आस्था पर गहरा आघात है. पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री के ताजा बयान के बाद इस महोत्सव को लेकर हो रहा विरोध फिर चर्चा में आ गया है.

क्या था मामला?
बता दें कि भारतीय सेना और चमोली जिला प्रशासन के संयुक्त तत्वाधान में बद्रीनाथ धाम में 19 और 20 सितंबर को ‘देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव-2026’ का आयोजन किया गया था, जिसका उद्देश्य प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपरा और सीमांत क्षेत्र के स्थानीय उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने के साथ ही महिलाओं और युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उद्यमिता और पर्यटन को बढ़ावा देना बताया गया था. महोत्सव के समापन समारोह में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए थे.

चार धाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने लगाया आरोप
हालांकि, उत्तराखंड चार धाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने आरोप लगाया कि आयोजकों ने बताए गए उद्देश्यों की बजाय धाम की धार्मिक परपंराओं और मान्यताओं के विपरीत नाच गाने और शोर-शराबे वाले कार्यक्रम किए. धाम में स्थित अराइवल प्लाजा में हुए कार्यक्रमों की निंदा करते हुए महापंचायत के महासचिव डॉ. बृजेश सती ने कहा कि हमारा विरोध सांस्कृतिक महोत्सव के आयोजन को लेकर नहीं बल्कि उसके स्वरूप और प्रस्तुति को लेकर है. यहां बद्रीनाथ की धार्मिक और पौराणिक मर्यादाओं के अनुरूप कार्यक्रम होने चाहिए. उन्होंने कहा कि बद्रीनाथ धाम में शंख की ध्वनि की भी मनाही है, वहां तेज ध्वनि और संगीत का शोर उत्पन्न करना धाम की धार्मिक गरिमा के अनुरूप नहीं है.

ज्योतिर्मठ बदरिकाश्रम के शंकराचार्य मठ ने जताई आपत्ती
आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित ज्योतिर्मठ बदरिकाश्रम के शंकराचार्य मठ ने भी इस आयोजन को परंपरा-विरुद्ध, सांस्कृतिक फूहड़ता एवं धार्मिक मर्यादा का उल्लंघन बताते हुए इस पर घोर आपत्ति जताई. शंकराचार्य स्वामी अवधेशानंद के शिष्य और मठ के प्रभारी स्वामी प्रत्यक्चैतन्यमुकुन्दानन्द गिरि ने कहा कि बदरिकाश्रम वह पावन क्षेत्र है, जहां ऋषियों-मुनियों ने अत्यंत शांति और संयम के नियम तय किए हैं. उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में शंख बजाना तक वर्जित है, ताकि तपस्यारत भगवान नर-नारायण एवं साधकों की एकाग्रता में कोई विघ्न ना पड़े. लेकिन इस तरह के कार्यक्रमों के माध्यम से यहां का धार्मिक वातावरण बिगाड़ा जा रहा है.

कठोर कार्रवाई की मांग की
उन्होंने कहा कि जहां ब्रह्मकमल जैसे अति संवेदनशील पुष्प को भी विशेष नियमों, पवित्रता और श्रद्धा के साथ प्रभु चरणों में अर्पित किया जाता है, वहां संगीत की तेज ध्वनि में नाच-गाने और फूहड़ता का सांस्कृतिक प्रदूषण कहां तक उचित है? स्वामी प्रत्यक्चैतन्यमुकुन्दानन्द गिरि ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से इस मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह करते हुए परंपराओं के उल्लंघन, मर्यादाहीन कृत्यों और फूहड़ आयोजनों के जिम्मेदार आयोजकों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग की है. उन्होंने बद्रीनाथ धाम एवं अन्य तीर्थ क्षेत्रों में संगीत कार्यक्रम, फूहड़ प्रदर्शन और शोर-शराबे वाले आयोजनों पर तुरंत पूर्ण प्रतिबंध लगाने और किसी बड़े आयोजन से पूर्व शंकराचार्य जी से परामर्श एवं मार्गदर्शन लेने की अनिवार्य व्यवस्था बनाए जाने का अनुरोध किया.

जिला प्रशासन ने दी सफाई
इस बीच, बढ़ते विवाद के बीच चमोली के जिला प्रशासन ने अपनी सफाई देते हुए कहा कि उसने सेना के स्थानीय अधिकारियों को बद्रीनाथ धाम की धार्मिक आस्था, परंपराओं और पौराणिक एवं आध्यात्मिक महत्व को देखते हुए ही कार्यक्रम करने की सलाह दी थी. भारतीय सेना ने हर साल की तरह इस साल भी बद्रीनाथ धाम स्थित ‘टूरिस्ट अराइवल प्लाजा’ में ‘देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव-2026’ का आयोजन किया गया. आयोजन के दौरान प्रस्तुत किए गए विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों, प्रस्तुतियों तथा उनके स्वरूप का चयन एवं निर्धारण सेना द्वारा किया गया था.

बद्रीनाथ धाम में शंख बजाना क्यों है मना?
उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित बद्रीनाथ धाम भगवान विष्णु के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है. यहां पूजा-अर्चना के दौरान शंख बजाने की परंपरा नहीं है, जबकि भगवान विष्णु स्वयं शंख धारण करते हैं. इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, बद्रीनाथ में माता लक्ष्मी तुलसी रूप में ध्यान कर रही थीं. इसी दौरान भगवान विष्णु ने शंखचूर्ण नामक राक्षस का वध किया. विजय के बाद शंख बजाने की परंपरा होने के बावजूद भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी की साधना भंग ना हो, इसलिए शंखनाद नहीं किया. मान्यता है कि तभी से बद्रीनाथ में शंख नाा बजाने की परंपरा चली आ रही है.

दूसरी मान्यता
दूसरी मान्यता यह है कि बद्रीनाथ धाम को तपस्थल माना गया है. यहां बद्रीनाथ भगवान के साथ कई देवी-देवता और साधु-संत साधना कर रहे होते हैं. शंख या कोई अन्य चीज का शोर करने से उनकी साधना भंग ना हो जाए इसलिए इस पवित्र धाम में शंख बजाने तक की मनाही है.

तीसरी मान्यता
एक कथा नाग वंश से भी जुड़ी हुई है. कथा के अनुसार, बद्रीनाथ धाम के पास नागों का वास माना जाता है. शंख समेत किसी भी ध्वनि से परेशान हो जाते हैं, उनके लिए यह कष्टदायक माना जाता है. इसलिए बद्रीनाथ धाम में शंख बजाने तक पर शंकराचार्य द्वारा रोक लगाई गई है.

वैज्ञानिक और प्राकृतिक कारण
वैज्ञानिक और प्राकृतिक कारण के तौर पर बताते हैं कि बद्रीनाथ हिमालय के ऊंचे और बर्फीले क्षेत्र में स्थित है. शंख की तेज ध्वनि पहाड़ों से टकराकर प्रतिध्वनि पैदा करती है. परंपरागत व्याख्याओं में आशंका जताई जाती है कि बर्फीले मौसम में ऐसी ध्वनि और कंपन से बर्फ की परतों पर असर पड़ सकता है और हिमस्खलन जैसी प्राकृतिक घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है.



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