पटना. चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं. कांग्रेस-सीजेपी के बाद अब जन सुराज पार्टी ने भी चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सवाल उठाए है. पार्टी प्रमुख प्रशांत किशोर ने चुनाव आयोग की कार्यशैली को लेकर कहा कि यह मुद्दा सिर्फ हाल में सामने आए किसी एक आर्टिकल या घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि पिछले कई वर्षों से चुनाव आयोग की साख को लेकर सवाल उठते रहे हैं. प्रशांत किशोर ने 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय भी उन्होंने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे. पश्चिम बंगाल चुनाव में बीजेपी को 77 सीटों पर जीत मिली थी. प्रशांत किशोर ने बताया कि आखिर ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग पर क्यों सवाल उठ रहे हैं.
‘हर स्तर पर सत्तारूढ़ दल को फायदा पहुंचा रहा आयोग’
प्रशांत किशोर ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की भूमिका वोटर लिस्ट तैयार करने से लेकर आचार संहिता लागू कराने, चुनावी संसाधनों और सरकारी मशीनरी के इस्तेमाल तथा मतगणना तक सवालों के घेरे में रही है. उनके मुताबिक, इन सभी स्तरों पर आयोग की भूमिका को लेकर विपक्षी दलों और अन्य पक्षों की ओर से सवाल उठाए जाते रहे हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ दल को चुनाव आयोग से ऐसा फायदा मिलता है कि बड़े अंतर से आगे चल रहा उम्मीदवार अंतिम नतीजे में काफी कम अंतर से जीतता है, जबकि कम अंतर से आगे चल रहे उम्मीदवारों के लिए स्थिति बदल सकती है. हालांकि, ये प्रशांत किशोर के राजनीतिक आरोप और उनका आकलन हैं, न कि चुनाव आयोग की ओर से स्वीकार किए गए तथ्य.
बांकीपुर चुनाव का भी किया जिक्र
प्रशांत किशोर ने हालिया बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव का भी जिक्र किया. चुनाव आयोग के अंतिम आंकड़ों के मुताबिक, उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को 19,324 वोटों से हराया था. किशोर को 64,151 और बीजेपी उम्मीदवार को 44,827 वोट मिले थे. किशोर ने चुनाव के दौरान और परिणाम के बाद चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि उनके समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई और मतदान के अंतिम घंटों में हुई गतिविधियों पर आयोग को प्रभावी कदम उठाना चाहिए था.
चुनावी खर्च और संसाधनों पर भी सवाल
प्रशांत किशोर ने चुनावों में राजनीतिक दलों के खर्च का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने आरोप लगाया कि सैकड़ों करोड़ रुपये के चुनावी खर्च और सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल पर पर्याप्त रोक नहीं लगाई जा रही है. हालांकि, निर्वाचन आयोग चुनावी खर्च की निगरानी के लिए नियम और तंत्र लागू करता है. आयोग के दिशानिर्देशों के मुताबिक उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों को चुनावी खर्च का हिसाब देना होता है और पेड न्यूज समेत चुनावी खर्च से जुड़े मामलों की निगरानी के लिए भी व्यवस्था है.
‘चुनाव आयोग की साख का सवाल’
प्रशांत किशोर ने कहा कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल सिर्फ किसी एक चुनाव या एक मुद्दे तक सीमित नहीं हैं. उनके मुताबिक, मतदाता सूची, आचार संहिता, चुनावी खर्च, सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल और मतगणना जैसे हर चरण में पारदर्शिता जरूरी है. उन्होंने चुनाव आयोग और उसके शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए और कहा कि चुनाव के बाद अधिकारियों को मिलने वाली जिम्मेदारियों को लेकर भी सार्वजनिक तौर पर पारदर्शिता होनी चाहिए. उनके इस बयान के बाद चुनाव आयोग की भूमिका और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर राजनीतिक बहस फिर तेज हो गई है.