सुवेंदु अधिकारी को पहला झटका, एंटी गुंडा बिल पर राष्ट्रपति ने नहीं दी मंजूरी
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Anti Goonda Bill News: पश्चिम बंगाल के एंटी गुंडा बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिल पाई है. केंद्र ने बिल में NDPS कानून से टकराव की आशंका जताई है. बिल में NDPS अधिनियम के तहत अपराध करने वाले व्यक्ति को ‘गुंडा’ की परिभाषा में शामिल करने का प्रावधान है.केंद्र का कहना है कि इससे पहले से लागू PITNDPS कानून के साथ एक और हिरासत व्यवस्था बन जाएगी. मामला संविधान के अनुच्छेद 254 से भी जुड़ गया है. अब बिल को जरूरी बदलाव के लिए वापस भेजा गया है. राज्य सरकार इसे विधानसभा में दोबारा पेश कर सकती है और संशोधन के बाद फिर राष्ट्रपति की मंजूरी मांग सकती है.
पश्चिम बंगाल के एंटी गुंडा बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिली. (फाइल फोटो)
पश्चिम बंगाल सरकार और CM सुवेंदु अधिकारी को दिल्ली से पहला झटका मिला है. राज्य सरकार जिस एंटी गुंडा बिल कानून को जल्द लागू करना चाहती थी उसे राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिल पाई है. बिल को वापस भेजकर दोबारा विचार करने को कहा गया है. अब सवाल है कि आखिर ऐसा क्या था जिसकी वजह से मामला अटक गया? दरअसल केंद्र ने इस बिल के कुछ प्रावधानों को लेकर आपत्ति जताई है. खासतौर पर नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों में प्रस्तावित कानून और पहले से मौजूद केंद्रीय कानून के बीच टकराव की बात कही गई है. केंद्र के मुताबिक बिल में NDPS कानून के तहत अपराध करने वाले लोगों को ‘गुंडा’ की परिभाषा में शामिल करने से एक अलग तरह की लोगों को हिरासत में लेने की व्यवस्था बन सकती है. यही बात अब पूरे विवाद की सबसे बड़ी वजह बन गई है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार मामला सिर्फ एक प्रावधान का नहीं है. इसके साथ संविधान के अनुच्छेद 254 का सवाल भी जुड़ गया है. केंद्र का कहना है कि अगर राज्य का कानून उसी विषय पर अलग और समानांतर व्यवस्था खड़ी करता है तो दोनों कानूनों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है. इसी वजह से राष्ट्रपति के स्तर पर बिल को वापस भेजा गया है. राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भी माना है कि यह सरकार के लिए झटका है. हालांकि उन्होंने कहा कि रास्ता बंद नहीं हुआ है. विधानसभा में जरूरी बदलाव किए जा सकते हैं. इसके बाद बिल को फिर से राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जा सकता है. यानी फिलहाल एंटी गुंडा कानून की गेंद दोबारा विधानसभा के पाले में है.
आखिर बिल में ऐसा क्या था?
पश्चिम बंगाल सरकार ने जून 2026 में ‘वेस्ट बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल’ पेश किया था. इसका मकसद राज्य में असामाजिक गतिविधियों पर रोक लगाना बताया गया. बिल में यह तय करने की कोशिश की गई है कि ‘असामाजिक गतिविधि’ क्या होगी और किसे ‘गुंडा’ माना जाएगा. इसमें ऐसे लोगों के खिलाफ निवारक कार्रवाई का प्रावधान भी रखा गया है.
NDPS कानून से टकराव क्यों?
- केंद्र की मुख्य आपत्ति नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों को लेकर है. बिल में ऐसे व्यक्ति को ‘गुंडा’ की परिभाषा में शामिल किया गया है जो NDPS अधिनियम 1985 के तहत किसी अपराध को करता है या करने की कोशिश करता है. इसके अलावा अपराध में मदद करने या उसे बढ़ावा देने और उसके लिए पैसा देने जैसे मामलों को भी इसमें शामिल किया गया है.
- केंद्र का कहना है कि इस तरह का प्रावधान पहले से मौजूद केंद्रीय कानून से टकरा सकता है. PTINDPS अधिनियम 1988 नशीले पदार्थों की अवैध तस्करी से जुड़े लोगों की निवारक हिरासत के लिए विशेष केंद्रीय कानून है. ऐसे में राज्य के प्रस्तावित कानून में समानांतर व्यवस्था बनने की आशंका जताई गई है.
अनुच्छेद 254 का पेंच क्या है?
यही विवाद संविधान के अनुच्छेद 254 तक पहुंच गया है. केंद्र के मुताबिक अगर राज्य का कानून किसी ऐसे विषय पर केंद्रीय कानून से टकराता है जिस पर दोनों कानून लागू होते हैं तो कानूनी पेच खड़ा हो सकता है. इसी आधार पर केंद्र ने सुझाव दिया है कि बिल की धारा 2(d)(iii)(B) से NDPS अधिनियम 1985 के तहत अपराधों का संदर्भ हटा दिया जाए.
राज्य सरकार के पास अब क्या रास्ता है?
राज्य प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक सरकार जरूरी बदलाव कर सकती है. इसके बाद बिल को विधानसभा में दोबारा पेश किया जा सकता है. बदलावों के बाद इसे फिर राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा. यानी फिलहाल बिल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. सरकार के पास संशोधन के जरिए आगे बढ़ने का रास्ता मौजूद है.
बिल में एक साल तक इलाके में एंट्री पर रोक
प्रस्तावित कानून में सिर्फ ‘गुंडा’ की परिभाषा तय करने की बात नहीं है. इसमें ऐसे व्यक्ति को किसी खास इलाके या जिले में जाने से रोकने का प्रावधान भी है. जिलाधिकारी या पुलिस आयुक्त और राज्य सरकार की ओर से अधिकृत डीआईजी स्तर के अधिकारी को यह अधिकार देने की बात कही गई है. अगर अधिकारी को आशंका हो कि कोई व्यक्ति असामाजिक गतिविधियों में शामिल है या ऐसा कर सकता है तो उसे किसी क्षेत्र या जिले से बाहर जाने का निर्देश दिया जा सकता है. उसे एक साल तक उस इलाके में लौटने से भी रोका जा सकता है. इसके अलावा उसकी गतिविधियों की रिपोर्टिंग का आदेश भी दिया जा सकता है.
विपक्ष ने कानून पर उठाए थे सवाल
बिल को लेकर विपक्ष की ओर से पहले ही सवाल उठाए गए थे. खासतौर पर निवारक हिरासत से जुड़े प्रावधानों को लेकर चिंता जताई गई थी. इन आलोचनाओं के बीच राज्य सरकार की ओर से यह आश्वासन दिया गया था कि कानून का इस्तेमाल राजनीतिक बदले के लिए नहीं होगा. सरकार ने कहा था कि प्रशासन कानून के मुताबिक काम करेगा और इसके दुरुपयोग की कोई गुंजाइश नहीं होगी.
कलकत्ता हाईकोर्ट में भी पहुंचा था मामला
इस बिल को चुनौती देते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट में तीन जनहित याचिकाएं दाखिल हुई थीं. 6 अगस्त को न्यायमूर्ति तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी चटर्जी की खंडपीठ ने इन याचिकाओं को खारिज कर दिया था. अदालत ने इन्हें समय से पहले दायर माना था क्योंकि बिल को अभी राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिली थी. हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने और कानून लागू होने के बाद याचिकाकर्ता इसकी वैधता को चुनौती दे सकते हैं.
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल एंटी गुंडा बिल को वापस भेजे जाने के बाद राज्य सरकार को इसमें बदलाव पर विचार करना होगा. सबसे बड़ा सवाल NDPS कानून से जुड़े प्रावधान का है. अगर राज्य सरकार इस हिस्से में बदलाव करती है तो बिल को दोबारा विधानसभा में लाया जा सकता है. इसके बाद फिर राष्ट्रपति की मंजूरी का रास्ता खुलेगा. इस पूरी प्रक्रिया के बीच बिल के लागू होने में देरी तय है. हाईकोर्ट की पहले की टिप्पणी भी यही बताती है कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बिना यह प्रस्तावित कानून अभी लागू कानून नहीं बना है.