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Success Story: बिहार के रोहतास के अभिषेक आनंद ने पढ़ाई और खेल के बीच ऐसा तालमेल बनाया कि आज वह जापान की नेशनल क्रिकेट टीम का हिस्सा हैं. दिनारा के अहरांव गांव से निकलकर IIT से पढ़ाई की, फिर जापान में नौकरी शुरू की. नौकरी के साथ क्रिकेट का जुनून भी जारी रखा और लगातार अभ्यास करते रहे. आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और जापान की राष्ट्रीय टीम में जगह मिली.
अभिषेक आनंद परिवार के साथ.
सासारामः बिहार के रोहतास जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर जापान की नेशनल क्रिकेट टीम तक पहुंचने वाले अभिषेक आनंद इन दिनों चर्चा में हैं. दिनारा प्रखंड के अहरांव गांव के रहने वाले अभिषेक ने IIT से पढ़ाई पूरी की. इसके बाद जापान में नौकरी शुरू की. लेकिन क्रिकेट के प्रति उनका जुनून कम नहीं हुआ. नौकरी के साथ वह लगातार क्रिकेट खेलते और अभ्यास करते रहे. इसी मेहनत के दम पर उन्हें जापान की राष्ट्रीय क्रिकेट टीम में जगह मिली है.
अभिषेक के जापान की टीम में शामिल होने की खबर से रोहतास के खेल प्रेमियों में खुशी है. गांव में रहने वाले उनके परिजन भी इस उपलब्धि से उत्साहित हैं. अभिषेक के पिता बिशनदेव राय बिहार पुलिस में इंस्पेक्टर पद से सेवानिवृत्त हुए हैं, जबकि उनकी मां का नाम किरण देवी है.
गांव की गलियों और पगडंडियों से शुरू हुआ सफर
मीरा देवी (अभिषेक की बड़ी मां) बताती हैं कि गांव में क्रिकेट खेलने के लिए कोई मैदान नहीं था. इसके बावजूद अभिषेक ने खेतों, पगडंडियों और गांव की गलियों में क्रिकेट खेलते हुए अपने शौक को जिंदा रखा. पढ़ाई में भी वह काफी तेज थे. क्रिकेट के साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान दिया और IIT की पढ़ाई पूरी की. IIT से पढ़ाई के बाद अभिषेक को जापान की एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिल गई. नौकरी के सिलसिले में वह जापान चले गए. वहां पहुंचने के बाद भी उन्होंने क्रिकेट खेलना नहीं छोड़ा. काम के साथ वह नियमित रूप से क्रिकेट का अभ्यास करते रहे.
जापान की टीम में मिली जगह
जापान में क्रिकेट के प्रति अभिषेक की लगन और प्रदर्शन ने उन्हें राष्ट्रीय टीम तक पहुंचा दिया. हाल में उनका चयन T20 इंटरनेशनल मैच के लिए भी हुआ है. इस उपलब्धि के बाद उनके गांव और आसपास के इलाके में खुशी का माहौल है. अलख निरंजन (रिश्ते के चाचा) का कहना है कि अभिषेक ने अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर यह मुकाम हासिल किया है. गांव में क्रिकेट के लिए बेहतर सुविधाएं नहीं होने के बावजूद उन्होंने खेल को नहीं छोड़ा. पढ़ाई में सफलता हासिल करने के बाद विदेश में नौकरी की और वहां भी क्रिकेट के अपने जुनून को जारी रखा.