Pitru Paksha 2026 Katha: पितृ पक्ष हर साल आश्विन कृष्ण प्रतिपदा तिथि से शुरू होता है. पितृ पक्ष को श्राद्ध पक्ष भी कहते हैं क्योंकि इस पक्ष में श्रद्धापूर्वक पितरों को जल और अन्न का दान करते हैं. उनको प्रसन्न करने के लिए तर्पण और पिंडदान करते हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस समय में पितर धरती पर निवास करते हैं और उनको उम्मीद होती है कि उनकी संतान जल, अन्न, वस्त्र, वचन आदि से तृप्त करेंगे. जब वे इससे प्रसन्न होते हैं तो अपनी संतान को आशीर्वाद देकर पितृ लोक वापस लौट जाते हैं. लेकिन जो लोग पितृ पक्ष में अपने पितरों का श्राद्ध, तर्पण आदि नहीं करते हैं, उनको पितरों की नाराजगी का शिकार होना पड़ता है. इसे ही पितृ दोष कहा गया है. पितरों का श्राद्ध इसलिए भी जरूरी है कि मनुष्य जन्म लेता है तो उस पर तीन ऋण होते हैं, देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण, तो पितृ ऋण से मुक्ति का ही माध्यम श्राद्ध है. आइए जानते हैं कि इस धरती पर सबसे पहले किसने पितरों का श्राद्ध किया और उसके बाद यह पर्व बन गया.
सबसे पहले किसने की श्राद्ध की शुरूआत?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, धरती पर सबसे पहले महर्षि निमि ने अपने पितरों का श्राद्ध किया था. उसके बाद से उनको देखकर अन्य लोगों ने अपना लिया, जिसके बाद यह पितृ पक्ष पर्व के रूप में स्थापित हुआ.
महाभारत के अनुशासन पर्व में श्राद्ध के शुरूआत की कथा मिलती है. जब पितामह भीष्म कुरुक्षेत्र के मैदान में बाणों की शैय्या पर लेटे हुए अपनी मृत्यु समय की प्रतीक्षा कर रहे थे, तो उन्होंने युधिष्ठिर को श्राद्ध के बारे में बताया था. उसमें ही उन्होंने महर्षि निमि की कथा का जिक्र किया था.
श्राद्ध की कथा
महर्षि निमि के पुत्र का निधन हो गया तो वे पुत्र शोक में डूब गए. उसकी वजह से उनका मन काफी दुखी और व्याकुल था. पुत्र की आत्मा की शांति के लिए उन्होंने तर्पण और अन्न से विधिपूर्वक अनुष्ठान किया. लेकिन तभी उनके मन में यह बात आई कि जो काम मुनियों ने पहले नहीं किया, उस काम को उन्होंने क्यों किया?
इस प्रश्न के मन में आने पर उन्होंने पर उन्होंने अपने पिता महर्षि अत्रि का स्मरण किया. ऐसा करते ही महर्षि अत्रि प्रकट हुए. वे महर्षि निमि की चिंता समझ गए. उन्होंने महर्षि निमि को पुत्र शोक से बाहर आने के लिए ढांढस बंधाया. उसके बाद उन्होंने महर्षि निमि को पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध की पूजा विधि बताई.
उसके बाद महर्षि निमि ने अपने पुत्र की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण किया, जिसे देवताओं और पितरों ने स्वीकार किया. जब इस बात का पता अन्य ऋषियों को हुआ तो उन्होंने भी इसे करना प्रारंभ कर दिया. उसके बाद यह पर्व बन गया.
युधिष्ठिर ने किया था महाभारत के सभी मृत आत्माओं का श्राद्ध
जब युधिष्ठिर को श्राद्ध के महत्व के बारे में पता चला, तो उन्होंने महभारत युद्ध में मारे गए सभी लोगों के लिए श्राद्ध किया था, ताकि उनकी आत्मा को शांति मिले और वे तृप्त हों.
भगवान राम ने किया था पिता का श्राद्ध
त्रेता युग में भी भगवान राम ने अपने पिता दशरथ का श्राद्ध किया था. सीता जी ने राजा दशरथ को बालू का पिंड बनाकर दान किया था. इसे पता चलता है कि श्राद्ध कर्म अभी से नहीं, काफी सालों से चलता आ रहा है.