Amir Alam and Nawazish Alam join Congress ahead of UP Election 2027: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले पश्चिमी यूपी की सियासत में एक और बड़ा फेरबदल हुआ है. पूर्व सांसद अमीर आलम और उनके बेटे, पूर्व विधायक नवाजिश आलम ने चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी छोड़कर कांग्रेस का हाथ थाम लिया है. दोनों के साथ समर्थक भी कांग्रेस में पहुंचे हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इस विदाई से चंद्रशेखर की दलित-मुस्लिम रणनीति को झटका लगा है और क्या BJP, सपा, कांग्रेस और BSP के बीच पश्चिमी यूपी का सियासी गणित बदल सकता है? तो बिना देर किए जानते हैं पूरी कहानी.
मीर आलम-नवाजिश ने क्यों बदला पाला?
मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, अमीर आलम और नवाजिश आलम ने 18 सितंबर को आजाद समाज पार्टी से इस्तीफा दिया था. 23 सितंबर को दोनों ने दिल्ली में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली. कांग्रेस में शामिल होने के दौरान प्रदेश अध्यक्ष अजय राय, यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम और सांसद इमरान मसूद मौजूद रहे. अमीर आलम परिवार करीब डेढ़ साल पहले RLD छोड़कर आजाद समाज पार्टी में आया था. नवाजिश ने आसपा छोड़ते समय पार्टी से अपनी अपेक्षाएं पूरी नहीं होने की बात कही थी. उन्होंने पार्टी की स्वीकार्यता और मुस्लिम समाज के राजनीतिक हितों को लेकर भी सवाल उठाए. अमीर आलम की ओर से भी पार्टी नेतृत्व पर वादे पूरे नहीं करने और संपर्क में कमी जैसे आरोप लगाए गए. ये दोनों नेताओं के अपने दावे हैं.
क्या चंद्रशेखर का मुस्लिम समीकरण कमजोर हुआ?
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है. क्योंकि चंद्रशेखर आजाद ने पश्चिमी यूपी में दलित-मुस्लिम राजनीतिक समीकरण को अपनी राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया हुआ है. 2024 के लोकसभा चुनाव में नगीना से उनकी जीत के बाद पश्चिमी यूपी में उनकी राजनीति को लेकर चर्चा और बढ़ी थी. अब अमीर आलम और नवाजिश जैसे मुस्लिम राजनीतिक चेहरों के अलग होने से उनकी रणनीति पर सवाल उठना स्वाभाविक है. लेकिन यहां एक फर्क समझना जरूरी है. किसी बड़े नेता का पार्टी छोड़ना और पूरे मुस्लिम वोट का दूसरी पार्टी की ओर जाना एक ही बात नहीं है. अमीर आलम और नवाजिश के कांग्रेस में जाने से उनके राजनीतिक समर्थकों पर कितना असर पड़ेगा, यह 2027 के चुनाव में ही ज्यादा सटीक दिख पाएगा.
अमीर आलम परिवार की पुरानी पकड़
अमीर आलम का पश्चिमी यूपी की राजनीति में करीब चार दशक का सफर रहा है. वह 1985 में पहली बार थानाभवन से विधायक बने. 1989 में मोरना से विधानसभा पहुंचे और 1996 में फिर थानाभवन से विधायक चुने गए. वह उत्तर प्रदेश सरकार में परिवहन मंत्री भी रहे. इसके बाद कैराना लोकसभा सीट से सांसद बने और सपा से राज्यसभा सदस्य भी रहे. नवाजिश आलम ने भी पिता की राजनीतिक विरासत के साथ अपनी पहचान बनाई. 2012 में वह सपा के टिकट पर बुढ़ाना से विधायक चुने गए. 2017 में उन्होंने मीरापुर से BSP के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए. 2018 में वह RLD में गए और 2025 में पिता के साथ आजाद समाज पार्टी में शामिल हुए. अब दोनों कांग्रेस में हैं.
थानाभवन पर क्यों टिकी निगाहें?
अमीर आलम का थानाभवन से पुराना रिश्ता है. कांग्रेस में शामिल होने के बाद नवाजिश आलम के 2027 में थानाभवन से चुनाव लड़ने की चर्चा भी तेज हुई है. मीडिया की रिपोर्ट में भी इस सीट से उनकी संभावित दावेदारी का जिक्र हो रहा है.. हालांकि कांग्रेस ने अभी नवाजिश को थानाभवन से उम्मीदवार घोषित नहीं किया है. अगर कांग्रेस और सपा के बीच 2027 में सीटों को लेकर तालमेल होता है और थानाभवन कांग्रेस के खाते में आती है, तो नवाजिश की दावेदारी महत्वपूर्ण हो सकती है. लेकिन अभी इन दोनों स्तरों पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है.
कांग्रेस के साथ आया पुराना चेहरा
अमीर आलम परिवार का कांग्रेस में आना पश्चिमी यूपी में पार्टी के लिए अहम माना जा रहा है. अमीर आलम की इस इलाके की राजनीति में लंबी पारी रही है. कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी कहा है कि उनके आने से पश्चिमी यूपी में पार्टी मजबूत होगी. दोनों नेता जब कांग्रेस में शामिल हुए तो उनके साथ कई समर्थक भी मौजूद थे. अब देखना होगा कि ये समर्थक और पुराना राजनीतिक संपर्क 2027 में कांग्रेस के कितने काम आता है.
सपा के लिए क्या मतलब?
नवाजिश आलम की राजनीति सपा से ही शुरू हुई थी. 2012 में वह बुढ़ाना से सपा के विधायक बने थे. बाद में वह अलग-अलग दलों में गए और अब कांग्रेस में हैं. ऐसे में 2027 के चुनाव में उनकी भूमिका पर नजर रहेगी. खासकर तब, जब सपा और कांग्रेस साथ चुनाव लड़ते हैं. सीट बंटवारे में कौन सी सीट किसके खाते में जाती है, यह भी अहम होगा. लेकिन सिर्फ किसी नेता के पार्टी बदलने से यह नहीं माना जा सकता कि पूरा वोट भी उसके साथ चला गया. चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार और पार्टी का संगठन भी बहुत मायने रखता है.
BJP और BSP के लिए क्या बदलेगा?
अमीर आलम और नवाजिश के कांग्रेस में जाने से पश्चिमी यूपी के कुछ इलाकों में मुकाबला जरूर बदलेगा. लेकिन अभी यह कहना मुश्किल है कि इसका सीधा फायदा BJP को होगा या नुकसान. BSP के लिए नवाजिश का पुराना रिश्ता भी ध्यान देने वाला है. वह 2017 में मीरापुर से BSP के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं. अब कांग्रेस में जाने से उनकी राजनीतिक दिशा एक बार फिर बदल गई है. इसका असर कितना होगा, यह चुनाव के समय ही पता चलेगा.
क्या चंद्रशेखर का पश्चिम यूपी में मुस्लिम वोट से हुए ‘पैदल’?
अब सबसे बड़ा सवाल चंद्रशेखर आजाद को लेकर है. अमीर आलम और नवाजिश के जाने से उनकी पार्टी को पश्चिमी यूपी में एक बड़ा मुस्लिम राजनीतिक परिवार जरूर खोना पड़ा है. इसी वजह से उनकी दलित-मुस्लिम राजनीति को लेकर सवाल उठ रहे हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पूरा मुस्लिम वोट चंद्रशेखर से दूर हो गया. अमीर आलम और नवाजिश का अपना राजनीतिक आधार है, जबकि वोटर का फैसला अलग-अलग मुद्दों और उम्मीदवारों के आधार पर होता है. अब चंद्रशेखर के सामने चुनौती यह होगी कि वह पश्चिमी यूपी में अपने साथ नए मुस्लिम और दलित नेताओं को कितनी मजबूती से जोड़ पाते हैं.