कभी अरपा किनारे बसा था छोटा सा गांव, आज है न्यायधानी…बिलासपुर का रोचक इतिहास

कभी अरपा किनारे बसा था छोटा सा गांव, आज है न्यायधानी…बिलासपुर का रोचक इतिहास


बिलासपुर. छत्तीसगढ़ के जिस बिलासपुर को आज हम हाईकोर्ट, रेलवे जोन, बड़े बाजारों और तेजी से फैलते शहर के रूप में जानते हैं, उसकी शुरुआत कभी अरपा नदी के किनारे बसी एक छोटी सी बस्ती से हुई थी. लोकमान्यता के अनुसार, बिलासा नाम की मछुआरिन के नाम से इस बस्ती की पहचान बिलासपुर के रूप में बनी. रतनपुर के कलचुरी काल से लेकर मराठा और भोंसला शासन, अंग्रेजों के दौर में रेलवे के आगमन और फिर न्यायधानी बनने तक बिलासपुर ने कई ऐतिहासिक पड़ाव देखे हैं. जूना बिलासपुर, किलावार्ड, पचरीघाट, हटरी चौक और पुराने पारा-मोहल्ले आज भी उस दौर की कहानी अपने भीतर समेटे हुए हैं. कभी अलग-अलग काम और समुदाय के आधार पर बसी छोटी-छोटी बस्तियां धीरे-धीरे बाजारों और मोहल्लों में बदलीं. रेलवे के आने के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां पहुंचे और यहीं बसते गए. फिर आसपास के गांव भी शहर से जुड़ते गए.

वरिष्ठ लोक साहित्यकार डॉ सोमनाथ यादव के अनुसार, बिलासपुर का विकास सिर्फ शहर के फैलाव की कहानी नहीं बल्कि अलग-अलग समाज, संस्कृति, रोजगार और परंपराओं के एक साथ जुड़ने की कहानी है. बिलासपुर के इतिहास की बात रतनपुर के बिना अधूरी मानी जाती है. कलचुरी काल में रतनपुर क्षेत्र की प्रमुख राजधानी रहा. इसके बाद मराठा शासन और नागपुर के भोंसला वंश का प्रभाव इस क्षेत्र में आया. जानकारों के मुताबिक, भोंसला शासन के दौरान जूना बिलासपुर के किलावार्ड क्षेत्र में किले के निर्माण का प्रयास भी किया गया था लेकिन यह पूरा नहीं हो सका. इसी दौर से जुड़ी कल्याण सहाय और उनके सेनापति गोपाल राय की वीरता की लोककथाएं भी सुनाई जाती हैं. वहीं बिलासा की कहानी बिलासपुर की पहचान से जुड़ी सबसे चर्चित लोकमान्यताओं में से एक है. कहा जाता है कि अरपा किनारे बसी बस्ती को बिलासा के नाम से पहचान मिली और समय के साथ यही नाम बिलासपुर बन गया.

अरपा नदी के किनारे बसते गए लोग
कहा जाता है कि जहां पानी होता है, वहीं बस्ती बसने लगती है. खोंडरी के पहाड़ों से निकलने वाली अरपा नदी आगे बढ़ते हुए बिलासपुर क्षेत्र में चौड़े पाट का रूप लेती है. इसी नदी के दोनों किनारों पर लोगों ने घर बनाए और धीरे-धीरे बस्ती का विस्तार हुआ. पचरीघाट के आसपास की बसावट को पुराने बिलासपुर का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. छत्तीसगढ़ी में ‘जूना’ का अर्थ पुराना होता है, इसलिए यह क्षेत्र जूना बिलासपुर कहलाया. पुराने समय में अरपा नदी शहर के सामाजिक और धार्मिक जीवन का भी केंद्र थी. पचरीघाट पर भोजली विसर्जन के साथ गणेश और दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन जैसे आयोजन होते थे. नदी के अलग-अलग घाटों का उपयोग भी अलग-अलग परंपराओं और सामाजिक कार्यों के लिए किया जाता था.

ऐसे बसे पारा-मोहल्ले
पुराने बिलासपुर के मोहल्लों के नाम आज भी यहां की पुरानी अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना की कहानी बताते हैं. कोष्टापारा में कपड़ा बुनने का काम, कुम्हारपारा में मिट्टी के बर्तन बनाने, तेलीपारा में घानी से तेल निकालने और काछीपारा में सब्जी उगाने का काम होता था. इसी तरह केवटपारा, नाऊपारा, गोंडपारा, बंगालीपारा, कतियापारा, ब्राह्मणपारा, लोधीपारा, घसियापारा, डबरीपारा, मगरपारा, इमलीपारा, तालापारा, ईरानीपारा और टिकरापारा जैसे मोहल्लों की अपनी अलग पहचान रही. तोरवा, सरकंडा, चाटीडीह, दयालबंद, मसानगंज, खपरगंज, जूनीलाइन, कुदुदंड और जरहाभाठा जैसे इलाके भी पुराने बिलासपुर के विस्तार का हिस्सा बने.

साप्ताहिक हटरी से रेलवे स्टेशन तक
किलावार्ड और आसपास के इलाके में कभी हटरी बाजार लगता था. बताया जाता है कि पहले यह साप्ताहिक बाजार था, जो बाद में रोजाना लगने लगा. धीरे-धीरे कपड़े, सोने-चांदी, किराना और दूसरी जरूरतों की दुकानें बढ़ती गईं. अंग्रेजी शासन के दौरान बिलासपुर का प्रशासनिक महत्व बढ़ा और फिर रेलवे ने शहर की तस्वीर ही बदल दी. वर्ष 1889 में बिलासपुर में रेलवे स्टेशन बना. रेलवे कॉलोनी विकसित हुई, कर्मचारियों के लिए आवास, खेल मैदान और क्लब बनाए गए. दैनिक जरूरतों के लिए बुधवारी बाजार भी विकसित हुआ. रेलवे के साथ दक्षिण भारत, बिहार, उत्तर प्रदेश और देश के दूसरे हिस्सों से अधिकारी-कर्मचारी बिलासपुर पहुंचे. कई लोगों ने नौकरी पूरी करने के बाद भी इसी शहर को अपना घर बना लिया. इसके बाद गोल बाजार, सदर बाजार, तेलीपारा और व्यापार विहार जैसे व्यापारिक केंद्रों का विस्तार हुआ.

और बन गया आज का ‘मिनी भारत’ बिलासपुर
समय के साथ बिलासपुर का दायरा लगातार बढ़ता गया. उसलापुर, सकरी, तोरवा, राजकिशोर नगर, सरकंडा, चाटीडीह और आसपास के कई गांव और बस्तियां शहर के विस्तार में शामिल होती गईं. गांवों से रोजगार और बेहतर सुविधाओं की तलाश में लोग शहर आए और बड़ी संख्या में यहीं बस गए. एसईसीएल और दूसरे संस्थानों के विस्तार के साथ महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा, ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश और दक्षिण भारत समेत कई राज्यों के लोग यहां पहुंचे. यही वजह है कि आज बिलासपुर में अलग-अलग राज्यों की भाषा, खानपान और त्योहारों की झलक दिखाई देती है. भोजली, गणेश उत्सव, राउत नाचा, दीपावली, नागपंचमी के दंगल, कबड्डी, हॉकी और फुटबॉल जैसी परंपराओं ने शहर की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत किया.

बिलासपुर से जुड़ा महान विभूतियों का नाम
बिलासपुर की धरती से पं. सत्यदेव दुबे, डॉ शंकर शेष और श्रीकांत वर्मा जैसी महान विभूतियों का नाम भी जुड़ा है. महान हॉकी खिलाड़ी लेस्ली क्लॉडियस ने 1948, 1952 और 1956 ओलंपिक में स्वर्ण और 1960 में कप्तान के रूप में रजत पदक जीता जबकि उन्हें 1971 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. कभी गांव और कृषि-केंद्रित क्षेत्र रहा बिलासपुर आज हाईकोर्ट, रेलवे जोन, शिक्षा, व्यापार और उद्योग के कारण न्यायधानी के रूप में अपनी पहचान बना चुका है. अरपा किनारे शुरू हुई यह बसावट आज विशाल शहर का रूप ले चुकी है लेकिन जूना बिलासपुर की गलियों में आज भी उस पुराने शहर की कहानी सांस लेती है.



Source link