ये एक केम‍िकल महंगी कर सकता है हमारी ‘थाली’? क‍िसानों की हर द‍िन बढ़ रही है टेंशन

ये एक केम‍िकल महंगी कर सकता है हमारी ‘थाली’? क‍िसानों की हर द‍िन बढ़ रही है टेंशन


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दुनिया का 90 प्रतिशत सल्‍फर तेल रिफाइनरी और नेचुरल गैस प्रोसेसिंग से म‍िलता है. इनमें से 56 प्रतिशत तेल रिफाइनिंग से और 34 प्रतिशत नेचुरल गैस से निकलता है. भारत अपनी सल्फर जरूरत का आधे से ज्यादा हिस्सा आयात करता है. लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध और म‍िड‍िल ईस्‍ट में चल रहे संघर्ष ने इसकी कीमतें बढ़ा दी हैं. जानिए क्‍यों क‍िसानों के ल‍िए इतना जरूरी है ये सल्‍फर.

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केम‍िस्‍ट्री लैब का ये केम‍िकल लगा सकता है खाने की थाली की कीमत में आग?

सल्‍फर या सल्‍फ्यूर‍िक एस‍िड ऐसी चीज़े हैं, ज‍िनका नाम सुनते ही द‍िमाग में केम‍िस्‍ट्री लैब, स्‍कूल की साइंस की बुक और केम‍िकल की तस्‍वीर आने लगती है. रूस-यूक्रेन युद्ध ने सल्‍फर की कीमतों में मानों आग लगा दी है. जो सल्‍फर इस युद्ध से पहले 100 डॉलर प्रति टन में ब‍िक रहा था, वो अब 400-500 डॉलर पहुंच गया है. पर सवाल खड़ा होता है कि सल्‍फर का हमारी आम ज‍िंदगी में क्‍या काम? ये महंगाई तो सिर्फ उन फैक्‍ट्र‍ियों के ल‍िए होगी, जो इस केम‍िकल का इस्‍तेमाल करती हैं? अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो ऐसा ब‍िलकुल नहीं है. यही सल्‍फर हमारे ल‍िए आने वाले समय में बड़ी परेशानी और हमारी खाने की थाली महंगा होने की वजह बन सकता है.

सल्फर किसानों के लिए बहुत जरूरी है. इसका इस्‍तेमाल खाद बनाने में होता है. दुनिया भर में उपयोग होने वाले सल्फर का करीब 60% हिस्सा खाद उत्पादन में जाता है. भारत में भी कई फसलों के लिए इस्तेमाल होने वाली खादों में यह शामिल होता है. जब सल्फर महंगा होता है तो खाद बनाने का खर्च बढ़ जाता है और इसका असर आखिरकार बाजार में बिकने वाली खाने की चीजों की कीमतों पर नजर आता है.

कहां से आता है सल्‍फर?
दुनिया का 90 प्रतिशत सल्‍फर तेल रिफाइनरी और नेचुरल गैस प्रोसेसिंग से म‍िलता है. इनमें से 56 प्रतिशत तेल रिफाइनिंग से और 34 प्रतिशत नेचुरल गैस से निकलता है. जबकि इसका महज 10 प्रतिशत ही सीधे खदानों से निकाला जाता है. ऐसे में जब तेल रिफाइनरियों या एनर्जी सोर्स पर कोई खतरा होता है तो सल्‍फर भी महंगा हो जाता है.

यूक्रेन रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमले बढ़ा रहा है. इसका सीधा असर सल्फर की सप्लाई पर पड़ रहा है.

क्‍यों बड़ी हैं सल्‍फर की कीमतें?
सल्फर की कीमतें इस साल दोगुनी से ज्यादा बढ़ चुकी हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले भारत सल्‍फर 100 डॉलर प्रति टन की कीमत से खरीदता था. लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद 2022 में ये कीमतें 400 से 500 डॉलर तक पहुंच गई हैं. अब एक बार फिर कीमतें बढ़ रही हैं. भारत में आयातित सल्फर की कीमत अब 150 से 1100 डॉलर प्रति टन के आसपास है. यूक्रेन रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमले बढ़ा रहा है. मिडिल ईस्‍ट में चल रहे संघर्ष में भी ऊर्जा सुविधाओं को ही निशाना बनाया जा रहा है. इसका सीधा असर सल्फर की सप्लाई पर पड़ रहा है.

सिर्फ क‍िसानों की खाद ही नहीं, आजकल तेजी से बढ़ रही ईवी में भी सल्‍फर का इस्‍तेमाल होता है. यही वजह है कि युद्ध के साथ-साथ इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती मांग भी सल्‍फर की कीमतें बढ़ा रही हैं. सल्फर से बनने वाला सल्फ्यूरिक एसिड इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बैटरी बनाने में इस्तेमाल होता है. इससे निकल निकाला जाता है जो बैटरी का एक जरूरी रॉ मैटेर‍ियल है. 2021 में निकल उद्योग के लिए सल्फ्यूरिक एसिड की मांग 3.5 मिलियन टन थी. जबकि 2025 में ये बढ़कर 16 मिलियन टन हो गई है. यानी अब क‍िसानों के साथ-साथ ईवी गाड़ि‍यों का निर्माण भी इसकी कीमतें बढ़ा रहा है.

भारत 50% सल्‍फर के ल‍िए व‍िदेशों पर न‍िर्भर
भारत अपनी सल्फर जरूरत का आधे से ज्यादा हिस्सा आयात करता है. इसमें से 50 प्रतिशत से अधिक पश्चिम एशिया से आता है. महंगा सल्फर खाद बनाने की लागत बढ़ा देता है जिससे किसानों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है. भारत का किसान पहले ही मौसम के बदलते मिजाज की मार झेल रहा है. अगर खाद महंगी या दुर्लभ हो गई तो फसल उगाने का खर्च बढ़ेगा और आखिर में ये सारा बोझ हमारी थाल‍ियों तक ही आएगा.



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