‘आरोपी को तुरंत नोटिस थमाओ’, रेप केस में पटना हाईकोर्ट के आदेश पर भड़क गए CJI सूर्यकांत, पढ़ाया मर्यादा का पाठ

‘आरोपी को तुरंत नोटिस थमाओ’, रेप केस में पटना हाईकोर्ट के आदेश पर भड़क गए CJI सूर्यकांत, पढ़ाया मर्यादा का पाठ


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‘आरोपी को तुरंत नोटिस थमाओ’, रेप केस में पटना हाईकोर्ट के आदेश पर भड़क गए CJI

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पटना हाईकोर्ट के एक बेहद चौंकाने वाले और विवादित न्यायिक फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख रुख अख्तियार किया है. हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में यह अजीबोगरीब दलील दी थी कि किसी महिला की सलवार खोलने की कोशिश करना और उसके साथ जबरन शारीरिक छेड़छाड़ करना ‘रेप का प्रयास’ नहीं माना जा सकता. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोषी को धारा 376 और 511 के तहत मिली सजा को निरस्त कर दिया था.

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत आरोपी का पक्ष सुने बिना आदेश को रद्द नहीं कर सकती. (पीटीआई)

पटना हाईकोर्ट के एक बेहद विवादित और आपत्तिजनक फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए खुद संज्ञान (सुओ मोटो) लिया है. हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में यह अजीबोगरीब टिप्पणी की थी कि महिला की सलवार खोलने की कोशिश करना और उसके साथ जबरन शारीरिक छेड़छाड़ करना ‘रेप का प्रयास’ (अटेम्प्ट टू रेप) के दायरे में नहीं आता. इस व्यवस्था पर गंभीर ऐतराज जताते हुए प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष बेंच ने मामले को सीधे अपने हाथ में ले लिया है.

सर्वोच्च अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में कई बातें बेहद आपत्तिजनक और मर्यादा के खिलाफ हैं. सीजेआई सूर्यकांत ने बिहार के एडवोकेट जनरल एसडी संजय को सख्त निर्देश देते हुए कहा कि अदालत आरोपी का पक्ष सुने बिना आदेश को रद्द नहीं कर सकती. उन्होंने राज्य प्रशासन और स्थानीय पुलिस को यह सुनिश्चित करने को कहा कि आरोपी को जल्द से जल्द कानूनी नोटिस थमाया जाए, ताकि इस अपमानजनक कानूनी व्याख्या को निरस्त करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सके.

पटना हाईकोर्ट ने फैसले में कहा था कि किसी महिला की सलवार उतारने की कोशिश करने और उसकी छाती दबाकर शारीरिक छेड़छाड़ करने के आरोपों को ‘रेप की कोशिश’ का अपराध नहीं माना जा सकता, जब तक कि पेनिट्रेशन (यौन संबंध बनाने की कोशिश) या रेप करने के इरादे को साफ तौर पर साबित करने वाली कोई स्पष्ट हरकत न हुई हो. लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने माना कि इन आरोपों से ज़्यादा से ज़्यादा भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 के तहत महिला की मर्यादा भंग करने का अपराध बनता है, इसलिए कोर्ट ने IPC की धारा 376 और 511 के तहत अपील करने वाले व्यक्ति की सज़ा को रद्द कर दिया.

जुलाई में, CJI की बेंच को पटना हाईकोर्ट के एक आदेश के बारे में बताया गया. यह जानकारी इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले पर स्वतः संज्ञान लेकर की जा रही सुनवाई के दौरान दी गई, जिसमें कहा गया था कि नाबालिग लड़की के ब्रेस्ट को पकड़ना, उसके पजामे का नाड़ा खोलना और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना ‘रेप की कोशिश’ के अपराध के दायरे में नहीं आता है.

सीनियर वकील शोभा गुप्ता और एच.एस. फूलका ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर स्वतः संज्ञान लेने और उसे रद्द करने के बावजूद, पटना हाईकोर्ट ने भी लगभग वैसी ही परिस्थितियों और टिप्पणियों के आधार पर आदेश पारित कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के विवादित फैसले को रद्द कर दिया था और जजों को यौन अपराधों के मामलों को संवेदनशीलता से संभालने के लिए गाइडलाइंस जारी की थीं.



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