UP 2027: का कहत बा यूपी? ओवैसी को हल्के में लेना कांग्रेस- सपा और BSP के लिए क्यों पड़ सकता है भारी, सीमांचल से समझिए पूरा गणित

UP 2027: का कहत बा यूपी? ओवैसी को हल्के में लेना कांग्रेस- सपा और BSP के लिए क्यों पड़ सकता है भारी, सीमांचल से समझिए पूरा गणित


UP 2027: का कहत बा यूपी? | Part 22

यूपी में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन सियासी तैयारियां तेज हो चुकी हैं. BJP, सपा, BSP और कांग्रेस अपने-अपने सामाजिक समीकरण साधने में जुटी हैं. इसी बीच AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कानपुर की जनसभा से यूपी में अपनी चुनावी बिगुल को फूंक दिया है. ओवैसी ने बीजेपी को सत्ता में लौटने से रोकने के लिए विपक्षी दलों को AIMIM के साथ हाथ मिलाने का भी न्योता दिया है और गठबंधन को लेकर 2 अक्टूबर तक फैसला लेने की बात कही है. यही नहीं इस चुनावी सभा में उन्होंने सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर भी जमकर निशाना साधा है और जयंत चौधरी का बचाव किया है. ऐसे में सवाल यह है कि यूपी की सियासत में ओवैसी की एंट्री का असर क्या हो सकता है, सपा को इससे क्या नुकसान हो सकता है. आइए और बिहार के सीमांचल का उदाहरण के साथ UP 2027: का कहत बा यूपी? के Part 22 में समझते हैं पूरा सच.

यूपी में AIMIM का अब तक क्या रिकॉर्ड?

सबसे पहले यूपी में AIMIM का चुनावी रिकॉर्ड देख लेते हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी ने 95 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. उसे 4,50,929 वोट मिले, जो कुल वोट का 0.49 फीसदी था. पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी. यानी सीटों के लिहाज से यूपी में AIMIM का अब तक कोई बड़ा रिकॉर्ड नहीं रहा है. लेकिन चुनावी राजनीति में सिर्फ सीट जीतना ही पूरी कहानी नहीं होती. किसी सीट पर किसी उम्मीदवार को मिले वोट अगर जीत और हार के अंतर के आसपास हों, तो वह वोट बंटवारे के लिहाज से चर्चा में आ जाते हैं. यही वजह है कि 2027 में AIMIM किन सीटों पर उम्मीदवार उतारती है और वहां उसे कितना वोट मिलता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा.

सीमांचल में पांच सीटों के उदाहरण से समझें कहानी

ओवैसी की पार्टी के चुनावी असर की बात होती है तो बिहार के सीमांचल में हुए चुनावी खेल की बात जरूरी होती है. 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में AIMIM ने सीमांचल की 24 सीटों में से 5 पर जीत दर्ज की थी. पार्टी ने इस इलाके में 16 उम्मीदवार मैदान में भी उतारे थे. उस चुनाव में AIMIM ने खुद को आरजेडी और कांग्रेस के सामने एक अलग राजनीतिक विकल्प के तौर पर पेश किया था. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी का असर सिर्फ उन पांच सीटों तक सीमित चर्चा में नहीं रहा, बल्कि कई दूसरी सीटों पर भी महागठबंधन के प्रदर्शन और वोटों के बंटवारे को लेकर इसकी भूमिका बनी रही, जिसका नतीजा क्या हुआ? आप सब जानते हैं.

क्या सीमांचल वाला खेल यूपी में होगा?

यहां एक बात साफ समझनी जरूरी है. बिहार के सीमांचल का उदाहरण यूपी में वही नतीजा आने की गारंटी नहीं है. दोनों राज्यों के राजनीतिक समीकरण, उम्मीदवार, गठबंधन और स्थानीय मुद्दे अलग हैं. फिर भी सीमांचल यह जरूर बताता है कि किसी पार्टी के पास विधानसभा में बहुत ज्यादा सीटें न हों, तब भी कुछ खास सीटों पर उसका वोट चुनावी मुकाबले को प्रभावित कर सकता है. 2027 में यूपी में AIMIM के साथ भी यही सवाल जुड़ा हुआ है. अगर पार्टी उन सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतारती है, जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या महत्वपूर्ण है, तो वहां सपा, कांग्रेस, बीजेपी, BSP और दूसरे दलों के बीच वोटों के बंटवारे का गणित अलग हो सकता है. लेकिन किस पार्टी को कितना नुकसान या फायदा होगा, यह सीट-दर-सीट आंकड़ों पर निर्भर करेगा.

AIMIM ने यूपी में बढ़ाई तैयारी

2027 के लिए AIMIM ने इस बार अपनी तैयारी पहले से तेज कर दी है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी करीब 150 से 200 विधानसभा सीटों पर संगठन खड़ा करने की तैयारी की बात कर रही है. पार्टी ने पश्चिमी यूपी और रोहिलखंड के कई इलाकों पर खास ध्यान दिया है. सहारनपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, रामपुर और अमरोहा जैसे इलाकों में संगठन मजबूत करने की बात सामने आई है. यानी 2027 की तैयारी में AIMIM सिर्फ चुनाव के समय उम्मीदवार उतारने की रणनीति पर नहीं, बल्कि पहले से संगठन खड़ा करने पर भी जोर दे रही है.

सपा के लिए सवाल कहां खड़ा होता है?

सपा के लिए AIMIM का सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यूपी की कई सीटों पर मुस्लिम मतदाता चुनावी मुकाबले में अहम भूमिका निभाते हैं. अगर AIMIM अलग से उम्मीदवार उतारती है और उसे किसी सीट पर पर्याप्त वोट मिलते हैं, तो वहां कुल वोटों का बंटवारा बदल सकता है. लेकिन इसे सीधे यह मान लेना कि AIMIM का हर वोट सपा का ही वोट है, सही नहीं होगा. किसी भी चुनाव में मतदाता का फैसला स्थानीय उम्मीदवार, मुद्दों, संगठन, गठबंधन और दूसरे कई कारणों से प्रभावित होता है. इसलिए असली सवाल यह है कि AIMIM किन सीटों पर अपना संगठन और उम्मीदवार खड़ा कर पाती है और वहां उसका वोट कितना होता है.

कांग्रेस के सामने भी यही चुनौती

यह गणित सिर्फ सपा तक सीमित नहीं है. कांग्रेस के लिए भी AIMIM की सक्रियता को समझना जरूरी होगा. खासकर उन सीटों पर जहां विपक्षी दलों के उम्मीदवारों के बीच वोटों का अंतर कम रहता है, वहां किसी तीसरे दल को मिलने वाला वोट चुनावी समीकरण में चर्चा का विषय बन सकता है. दूसरी तरफ अगर AIMIM किसी विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बनती है, तो तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है. ऐसी स्थिति में उसका वोट अलग से मुकाबले में आने के बजाय गठबंधन के उम्मीदवार के साथ जा सकता है. यही वजह है कि ओवैसी ने फिलहाल गठबंधन का विकल्प खुला रखा है.

2 अक्टूबर के बाद तस्वीर साफ होगी

कानपुर की जनसभा में ओवैसी ने विपक्षी दलों को AIMIM के साथ आने का न्योता दिया और कहा कि गठबंधन को लेकर 2 अक्टूबर तक इंतजार किया जाएगा. इसके बाद पार्टी अपने सहयोगियों के नाम और चुनावी रणनीति का ऐलान कर सकती है. यानी फिलहाल AIMIM के सामने दोनों रास्ते खुले हैं. एक तरफ संगठन को विस्तार देकर ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी है, तो दूसरी तरफ विपक्षी दलों के साथ गठबंधन की संभावना भी बनी हुई है.

ओवैसी के सामने भी आसान राह नहीं

हालांकि AIMIM के लिए यूपी में चुनौती कम नहीं है. 2022 में 95 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी थी. इसलिए 2027 में उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने वोट को सीट में बदलने की होगी. यही वजह है कि 2027 में AIMIM के प्रदर्शन को सिर्फ इस आधार पर नहीं देखा जाएगा कि उसने कितनी सीटें जीतीं. यह भी देखा जाएगा कि किन सीटों पर उसके उम्मीदवार मजबूत रहे, उन्हें कितना वोट मिला और उन सीटों पर जीत-हार का अंतर कितना था. फिलहाल इतना जरूर है कि AIMIM ने 2027 के लिए यूपी में अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं. ओवैसी गठबंधन का विकल्प भी खुला रखे हुए हैं और कई इलाकों में संगठन मजबूत करने की तैयारी की बात सामने आई है. ऐसे में सपा और कांग्रेस के लिए AIMIM को लेकर सबसे अहम सवाल यही रहेगा कि वह किन सीटों पर उतरती है और वहां कितना वोट हासिल करती है.



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