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Raghubir Yadav: 18 सितंबर को रघुबीर यादव और अंशुमान झा की फिल्म ‘ओम का हरी’ रिलीज हुई. फिल्म के प्रमोशन के दौरान दिग्गज एक्टर रघुबीर यादव ने न्यूज18 हिंदी के साथ खास बातचीत की. हमारे साथ बातचीत में रघुबीर यादव ने बताया कि वो घर से भागकर एक्टर बने. उन्होंने नाराजगी में पान की दुकान भी खोल ली थी, लेकिन ये फैसला उनको बहुत भारी पड़ा. थिएटर से निकलर फिल्मों और भी ओटीटी पर धाक जमाने वाले रघुबीर यादव ने हमारे साथ अपना पूरा सफर साझा किया.
रघुबीर यादव की हालिया फिल्म ‘ओम का हरी’ थिएटर्स में रिलीज हो चुकी है.
नई दिल्ली. हम अक्सर सितारों को चमक-धमक और अवॉर्ड्स के चश्मे से देखते हैं. इसी चकाचौंध भरी इंडस्ट्री में कुछ कलाकार ऐसे हैं जो गांव की गलियों और संघर्ष के रास्ते से होते हुए हमारे दिलों में उतरे हैं. वो पर्दे पर आते हैं तो ऐसा लगता है कि जैसे हर किरदार जीवित हो उठा. भारतीय सिनेमा के सबसे मंझे हुए और स्वाभाविक कलाकारों की फेहरिस्त में शामिल रघुबीर यादव भी एक ऐसा ही नाम हैं. फुलेरा के प्रधान जी कहें या दूरदर्शन के मुंगेरीलाल, रघुबीर नाम एक और किरदार कई हैं. रघुबीर यादव के अभिनय में वो ठहराव है जो सीधे दिल में उतर जाता है. लेकिन, इस बेमिसाल मुकाम तक पहुंचने का उनका सफर बिलकुल भी आसान नहीं था.
अपनी फिल्म ‘ओम का हरी’ की रिलीज के मौके पर रघुबीर यादव ने न्यूज18 हिंदी के साथ खास बातचीत की. इस बातचीत में उन्होंने अपनी जिंदगी के उस पहलू से रूबरू कराया जिसे आमतौर पर लोग नजरअंदाज कर देते हैं. जब कोई कलाकार ‘सितारा’ बन जाता है तो उसकी चमक दूर तक पहुंचती है, लेकिन उस चमक के पीछे छिपा दर्द और संघर्ष हर कोई नहीं समझ पाता है. रघुबीर यादव ने हमारे साथ अपना वो सफर साझा किया जिससे गुजरकर उन्होंने ये मुकाम हासिल किया.
पिता के नक्शे कदम पर नहीं चले रघुबीर यादव
मध्य प्रदेश के जबलपुर के पास स्थित छोटे से कस्बे ‘माझाौली’ से ताल्लुक रखने वाले रघुबीर यादव का बचपन खेत-खलिहानों और पारंपरिक माहौल में बीता. उनके पिता एक किसान थे और चाहते थे कि बेटा खेती-किसानी संभाले या फिर बैलगाड़ी के साथ अपना जीवन बिताए. परिवार में पारंपरिक काम और जमीन से जुड़ाव ही सबकुछ था. लेकिन कम उम्र से ही रघुबीर के भीतर एक अलग ही धुन सवार थी. उन्होंने अपने पिता के नक्शे कदमों पर चलने के बजाय अपने लिए एक अलग राह तलाशने का फैसला लिया.
रघुबीर यादव ने पान की दुकान में किया था काम
रघुबीर यादव बताते हैं कि उनकी जिंदगी में एक दौर ऐसा आया जब घर के पारंपरिक दबाव और अपनी जिद्द के बीच बगावत करते हुए उन्होंने गुस्से में आकर एक पान की दुकान खोल ली. उन्हें लगा कि शायद यह उनकी आजादी का रास्ता है, लेकिन जैसे ही उनके पिता को इस बात की भनक लगी, उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. पिता ने परिवार की साख और खेती-किसानी के भविष्य को बचाने के लिए रघुबीर की जमकर पिटाई की, उन्हें खूब थप्पड़ पड़े. वो पल उनके जीवन का एक कड़वा मोड़ था, लेकिन उस डांट और गुस्से ने उन्हें यह अहसास करा दिया कि उनका रास्ता मिट्टी के हल से नहीं, बल्कि कला के मंच से होकर गुजरता है.
NSD से ली एक्टिंग की ट्रेनिंग
12वीं क्लास में फेल होने के बाद एक बार फिर पिता की भयंकर पिटाई से डरकर रघुबीर अपने घर से भाग खड़े हुए. घर-परिवार के विरोध और तमाम मुश्किलों को पार करते हुए रघुबीर ने आखिरकार अभिनय की दुनिया में कदम रखा. उन्होंने थिएटर से करियर की शुरुआत की और फिर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) से अभिनय के गुर और बारिकियां सीखीं. आज भी दिग्गज एक्टर का पहला प्यार थिएटर हैं.
रघुबीर यादव को अभिनय के साथ ही सिंगिंग का भी है शौक
अभिनय के महारथी रघुबीर यादव कमाल के गायक भी हैं. अपनी हालिया रिलीज फिल्म ‘ओम का हरी’ में उन्होंने दो गीत गाए हैं. उनके गीत ‘राम राखे’ संत कबीर के बोल हैं. खास बात है कि रघुबीर यादव के इस गाने को उनके बेटे अंचल ने कंपोज किया है. पिता-पुत्र की जोड़ी ने मिलकर इस गाने को और भी खास बना दिया.