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Siddhi Vinayak Ganpati Temple Khargone: नागा साधुओं ने भगवान गणेश की मूर्ति का निर्माण करवाने के बाद गांव में बड़ा यज्ञ किया. प्रतिमा को स्थापना के लिए दूसरी जगह ले जाया जा रहा था. रात होने पर साधु कुंदा नदी के किनारे विश्राम के लिए रुक गए. सुबह जब प्रतिमा को उठाने की कोशिश की गई, तो वह नहीं उठी. साधुओं ने इसे गणपति महाराज की इच्छा मानी और इसी स्थान पर विधि-विधान से प्रतिमा की स्थापना कर दी.
खरगोन. मध्य प्रदेश के खरगोन में कुंदा नदी के तट पर भगवान गणेश का एक ऐसा मंदिर है, जो अपनी विशेष मान्यताओं और परंपराओं सहित स्थापना से जुड़ी रोचक कहानी के लिए प्रसिद्ध है. शहर के श्री सिद्धि विनायक गणपति मंदिर को निमाड़-मालवा क्षेत्र के प्रमुख गणेश मंदिरों में गिना जाता है. इंदौर के प्रसिद्ध खजराना गणेश मंदिर के बाद खरगोन का यह मंदिर भव्य प्रतिमा और श्रृंगार के लिए सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है. यहां भगवान के शाही ठाठ-बाट देख भक्त भी हैरान रह जाते हैं.
मंदिर में भगवान गणेश की करीब 9 फीट ऊंची दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है. चांदी के सिंहासन पर बैठे गणेश जी का प्रतिदिन भव्य श्रृंगार होता है. इस दौरान भगवान को करोड़ों रुपये के आभूषण और महंगे वस्त्र पहनाए जाते हैं. खास बात है कि भगवान के पास चढ़ावे में इतने वस्त्र आ चुके हैं कि एक बार पहनाए वस्त्र दोबारा कभी नहीं पहनाए जाते. आज चढ़ाई पोशाक का नंबर कई महीनों बाद आता है. गणेशोत्सव के दौरान यहां प्रदेश सहित पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र से भी बड़ी संख्या में भक्त भगवान के दर्शन पहुंचते हैं.
मूर्ति की स्थापना से जुड़ी रोचक कहानी
ग्राम नवमपुरा के दिनेश यादव लोकल 18 को बताते हैं कि करीब 524 साल पहले खरगोन से कुछ दूर उन्हीं गांव में भगवान गणेश की इस प्रतिमा का निर्माण हुआ था. यहां आज भी उस समय से जुड़े अवशेष और शिवलिंग मौजूद हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं. बताया जाता है कि नागा साधुओं ने भगवान गणेश की प्रतिमा का निर्माण करवाने के बाद गांव में बड़ा यज्ञ किया था. इसके बाद प्रतिमा को स्थापना के लिए दूसरी जगह ले जाया जा रहा था. रास्ते में रात होने पर साधु कुंदा नदी के किनारे विश्राम के लिए रुक गए. सुबह जब प्रतिमा को उठाने का प्रयास किया गया, तो वह नहीं उठी. साधुओं ने इसे भगवान गणेश की इच्छा माना और इसी स्थान पर विधि-विधान से प्रतिमा की स्थापना कर दी. यही स्थान बाद में सिद्धि विनायक गणपति मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हुआ.
दुर्लभ गणेश प्रतिमा की विशेषता
मंदिर की सबसे खास पहचान यहां स्थापित भगवान गणेश की प्रतिमा है. एक ही पाषाण पर बनी भगवान की यह प्रतिमा चतुर्भुज स्वरूप में है और इसकी ऊंचाई करीब 9 फीट है. भगवान को त्रिनेत्रधारी स्वरूप में दर्शाया गया है. माथे पर चंद्रमा, सूंड पर नाग की आकृति और हाथ में शिवलिंग की अंगूठी बनी हुई है. गले में 108 दानों की रुद्राक्ष माला है जबकि चरणों में कमल पुष्प की आकृति उकेरी गई है.
मन्नत पूरी होने पर चढ़ाते हैं पोशाक
मंदिर समिति के अध्यक्ष कैलाश महाजन के अनुसार, मंदिर में भगवान को पोशाक चढ़ाने की भी विशेष परंपरा है. मान्यता है कि मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु भगवान गणेश को नई पोशाक अर्पित करते हैं. मंदिर में अब तक हजारों पोशाक एकत्रित हो चुकी हैं. इसी वजह से भगवान को रोजाना श्रृंगार के दौरान नई पोशाक पहनाई जाती है. एक बार पहनाई गई पोशाक दोबारा भगवान को नहीं पहनाई जाती. इसी के साथ गणेशोत्सव में करीब सवा क्विंटल चांदी के आभूषणों से भगवान का श्रृंगार होता है.
गणेशोत्सव पर होते हैं आयोजन
गणेशोत्सव के दौरान मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं. मंदिर समिति के अनुसार, रोजाना करीब 20 ब्राह्मण भगवान का लगभग चार घंटे तक महाभिषेक कराते हैं. इसके बाद आकर्षक श्रृंगार और काकड़ा आरती होती है. करीब एक घंटे तक स्वाध्याय पाठ भी किया जाता है. दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को रोजाना करीब डेढ़ क्विंटल प्रसादी वितरित की जाती है. इस बार 11 दिनों तक यहां गणेशोत्सव मनाया जा रहा है.