ममता की तरह इंदिरा गांधी को भी 2-2 बार लगे झटके, मगर शेरनी बनकर आईं पूर्व पीएम
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Indira Gandhi Also Faced Mamata Banerjee Like Situation: ममता बनर्जी को चुनाव आयोग से झटका लगा है. लेकिन, भारतीय राजनीतिक इतिहास को देखें तो यह कोई बड़ी घटना नहीं है. ऐसी स्थिति का सामना बड़े से बड़े नेताओं को झेलनी पड़ी थी. पूर्व पीएम दिवंगत इंदिरा गांधी को भी दोबार पार्टी से निकाला गया था. वर्ष 1969 में कांग्रेस दोफाड़ हुई, इंदिरा ने कांग्रेस-आर बनाई. 1977 में हार के बाद उन्होंने कांग्रेस-आई बनाई और 1980 के चुनाव में एक बार फिर शानदार जीत हासिल थी.
ममता बनर्जी की तरह इंदिरा गांधी को भी एक नहीं बल्कि दो-दो बार ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा था. फोटो- आईएनसी/रायटर
Indira Gandhi Also Faced Mamata Banerjee Like Situation: ममता बनर्जी को चुनाव आयोग से लगा झटका भारतीय राजनीति के लिए कोई नई घटना नहीं है. देश के राजनीतिक इतिहास में दसियों बार ऐसा हुआ है जब स्थापित बड़ी पार्टीयां दोफाड़ हुईं और उनके नैतिक वारिस को पार्टी का नाम और उसके चुनाव चिन्ह से बेदखल होना पड़ा. सबसे ताजा मामला महाराष्ट्र के चाणक्य कहलाने वाले वयोवृद्ध नेता शरद पवार और बाला साहेब ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे का है. बिहार में रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान को भी ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ा था. लेकिन, इनसे इतर इंदिरा गांधी की बात ही अलग है. भारतीय राजनीतिक इतिहास की सबसे ताकतवर नेता इंदिरा गांधी को भी ममता बनर्जी की तरह ही चुनाव आयोग से बड़ा झटका लगा था. इतना ही नहीं ये झटका एक बार नहीं बल्कि दो-दो बार लगा. तो आइए आज 1970 और 80 के दशक की उस कहानियों के बारे में आपके साथ बात करते हैं.
जब कांग्रेस ने इंदिरा को पार्टी से निकाला
लालबहादुर शास्त्री के निधन के बाद 1965 में जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं तो उनको कांग्रेस पार्टी के भीतर कोई कद्दावर नेता नहीं माना जाता था. बल्कि वह उस वक्त कांग्रेस के अध्यक्ष रहे के कामराज की एक साजिश के तहत पहली बार पीएम बनीं. कामराज ने कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे मोरारजी देसाई को रोकने के लिए इंदिरा के नाम को आगे किया. उनकी योजना थी कि इंदिरा गांधी अभी राजनीतिक रूप से इतनी परिपक्व नहीं हैं कि वह अपने दम पर सरकार चला पाएंगी. कांग्रेस संगठन पर के. कामराज की जबर्दस्त पकड़ थी. वह पंडित नेहरू के वक्त तमिलनाडु के सीएम रह चुके थे. सीएम की कुर्सी छोड़कर उन्होंने पार्टी अध्यक्ष पद संभाला था. वह संगठन पर अपनी पकड़ के दम पर सोचते थे कि इंदिरा गांधी एक गूंगी गुड़िया की तरह वह जो कहेंगे वह करेंगी. कुछ राजनीतिक पंडित यहां तक कहते हैं कि खुद कामराज पीएम बन सकते थे लेकिन हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में उनके हाथ तंग थे. वे एक खाटी तमिल नेता थे. वह तमिल भाषा ही अच्छी तरह जानते थे. इस कारण उन्होंने खुद के पीएम पद की रेस से बाहर कर लिया था. खैर, मूल कहानी पर आते हैं.
बदल गया इंदिरा का रूप
पीएम बनने के बाद इंदिरा गांधी पार्टी संगठन से इतर स्वतंत्र फैसले लेने लगीं. इस कारण धीरे-धीरे सरकार और संगठन के बीच दूरी बढ़ने लगी. फिर राष्ट्रपति चुनाव आया. दरअसल, राष्ट्रपति जाकिर हुसैन का 3 मई 1969 को असामयिक निधन हो गया. फिर उप राष्ट्रपति वीवी गिरी ने भी कुछ दिनों बाद चुनाव लड़ने के लिए अपने पद से इस्तीफा दे दिया. गिरि उस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार बने और कांग्रेस पार्टी ने आधिकारिक तौर पर नीलम संजीवा रेड्डी को अपना आधिकारिक उम्मीदवार बनाया. इंदिरा गांधी वीवी गिरी को राष्ट्रपति बनवाना चाहती थीं. इसी मसले पर संगठन और सरकार में ठन गई. इंदिरा गांधी ने निर्दलीय उम्मीदवार के समर्थन में पार्टी सांसदों और विधायकों से अंतर आत्मा की आवाज पर वोट करने की अपील कर दी. उन्होंने सांसदों-विधायकों को व्हीप जारी करने से इनकार कर दिया. फिर इंदिरा की अपील का असर यह हुआ कि निर्दलीय उम्मीदवार गिरी की जीत हो गई. वह राष्ट्रपति बन गए. फिर अंतर कलह चरम पर पहुंच गया. पीएम होने के बावजूद कांग्रेस पार्टी ने इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया.
दिवंगत पीएम इंदिरा गांधी. फोटो- आईएनसी
कांग्रेस दोफाड़ हुई
इसके बाद कांग्रेस पार्टी दोफाड़ हो गई. यह वक्त 1969 का था. कांग्रेस के भीतर हुए इस राजनीतिक ड्रामे को ही सिंडिकेट वर्सेस इंदिरा कहा जाता है. पार्टी संगठन पर दबदबा रखने वाले पुराने खाटी कांग्रेसियों को ही सिंडिकेट कहा जाता है. कांग्रेस के दोफाड़ होने के बाद कांग्रेस-ओ और कांग्रेस-आर नाम से दो पार्टियां बनीं. कांग्रेस-ओ की कमान कामराज सेक्शन के हाथों में थी. वहीं इंदिरा के नेतृत्व वाली पार्टी बनी कांग्रेस-आर. फिर 1971 का चुनाव आया. इंदिरा के नेतृत्व वाली कांग्रेस-आर ने शानदार जीत हासिल की. और एक शेरनी की तरह इंदिरा गांधी ने केंद्र की सत्ता में वापसी की. चुनाव के कुछ ही वक्त बाद इंदिरा सरकार को बांग्लादेश संकट का सामना करना पड़ा और पूरी दुनिया ने उनके नेतृत्व कौशल की ताकत देखी. इसी चुनाव में इंदिरा गांधी ने सबसे फेमस गरीबी हटाओ नारा दिया था. 1971 के चुनाव में कांग्रेस-आर को 518 में से 352 और कांग्रेस-ओ को केवल 16 सीटें मिली थीं. इस 1971 के चुनाव से पहले कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी था. फिर इंदिरा गांधी को 1971 के चुनाव से पहले गाय-बछड़ा चुनाव चिन्ह मिला.
फिर टूटी कांग्रेस
अब दूसरी कहानी इमर्जेंसी के वक्त की है. 1971 के चु्नाव के बाद इंदिरा गांधी के नेतृ्त्व में जो सरकार बनी थी उसके सामने आंतरिक और बाहरी स्तर पर कई चुनौतियां थीं. जनता की अपेक्षाएं चरम पर थीं. पूरे देश में छात्रों का आंदोलन भड़क उठा था. फिर इंदिरा गांधी ने 1975 में देश में इमरजेंसी लगा दी. इसके बाद 1977 का चुनाव आया. इमरजेंसी और फिर 1977 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस-आर की बुरी हार के बाद पार्टी के अध्यक्ष और बड़े नेताओं ने इसके लिए इंदिरा गांधी को जिम्मेदार ठहराया. इसमें सबसे बड़ी भूमिका महाराष्ट्र के कद्दावर कांग्रेसी रहे वाईबी चव्हाण और पार्टी अध्यक्ष के. ब्रह्मानंदा रेड्डी की रही. पार्टी के भीतर इंदिरा गांधी बुरी तरह अलग-थलग पड़ गईं. फिर इंदिरा गांधी ने अपने समर्थक नेताओं की एक बैठक बुलाई और अपने लिए कांग्रेस-आर से अलग एक नई पार्टी बनाई. उस पार्टी का नाम कांग्रेस-आई रखा गया. मामला चुनाव आयोग के पास पहुंचा और इंदिरा गांधी की कांग्रेस-आई को नया चुनाव चिन्ह मिला हाथ का पंजा. इसी पंजे के निशान पर इंदिरा गांधी की पार्टी कांग्रेस-आई ने 1980 में लोकसभा चुनाव लड़ा. और 529 सदस्यीय लोकसभा में कांग्रेस-आई को 353 सीटों पर जीत मिली.
इस तरह इंदिरा गांधी एक नहीं दो-दो बार नई पार्टी और नए चुनाव चिन्ह के साथ जनता के बीच गईं और शेरनी बनकर वापस आईं. इसके बाद इंदिरा गांधी ने राजनीतिक तौर पर यह साबित कर दिया कि वही असली कांग्रेस हैं. फिर कानूनी प्रक्रियाओं को अपनाते हुए चुनाव आयोग ने 1981 में एक अहम फैसला दिया और कांग्रेस-आई को ही मूल इंडियन नेशनल कांग्रेस पार्टी मान लिया गया. फिर कांग्रेस पार्टी ने इस फैसले के बाद अपने नाम से आई अक्षर हटा दिया और वह केवल कांग्रेस कहलाई. हालांकि उनसे पुराने चुनाव चिन्ह को अपनाने की बजाय पंजे को बरकरार रखा.