UAE Israel Relations : नेतन्याहू को देखकर बिदक गए अरब देश, सऊदी भाग निकला लेकिन यूएई क्यों बैठा रहा, डेलीगेशन ने क्यों नहीं किया वॉक आउट?

UAE Israel Relations : नेतन्याहू को देखकर बिदक गए अरब देश, सऊदी भाग निकला लेकिन यूएई क्यों बैठा रहा, डेलीगेशन ने क्यों नहीं किया वॉक आउट?


न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा का माहौल उस वक्त बेहद गर्म हो गया, जब इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भाषण देने के लिए पोडियम पर पहुंचे. नेतन्याहू ने जैसे ही माइक संभाला, यूएन हॉल में एक अजीब सी हलचल शुरू हो गई. देखते ही देखते दर्जनों देशों के प्रतिनिधि अपनी सीटों से उठे और बाहर की तरफ बढ़ गए. सऊदी अरब, ईरान, तुर्की, कतर, जॉर्डन, अल्जीरिया, मलेशिया और बांग्लादेश समेत कई अरब और मुस्लिम देशों के डेलीगेशन ने विरोध दर्ज कराते हुए हॉल खाली कर दिया. इस पूरे हाई-वोल्टेज ड्रामे के संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का डेलीगेशन अपनी जगह पर शांति से बैठा रहा.

संयुक्त राष्ट्र में ‘हंगामेदार’ 40 मिनट और नेतन्याहू का तंज

जैसे ही अलग-अलग देशों के राजनयिक हॉल से बाहर जाने लगे, समर्थकों ने तालियां बजानी शुरू कर दीं. लेकिन ये ड्रामा नेतन्याहू पर बेअसर रहा. उन्होंने चेहरे पर मुस्कान लाते हुए बाहर जाने वाले डेलीदगेशन पर सीधा निशाना साधा और कहा ‘अगर इस हॉल में कोई और नैतिक कायर बचा है, तो कृपया वो भी अभी बाहर चला जाए’.

नेतन्याहू ने कई वॉकआउट करने वाले देशों को एक्सपोज करते हुए कहा कि, जिन देशों के डेलीगेशन हॉल छोड़कर जा रहे हैं, इजरायल ने खुद को बचाने के साथ-साथ उन देशों की भी मदद की है. उन्होंने दावा किया कि पर्दे के पीछे कई अरब नेता, ईरान के खिलाफ इजरायली कार्रवाई के लिए निजी तौर पर धन्यवाद देते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर ढोंग करते हैं.

सऊदी अरब का वॉक आउट: फिलिस्तीन कार्ड और अरब जगत की लीडरशिप

सऊदी अरब का वॉक आउट करना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) का सऊदी अरब खुद को पूरे मुस्लिम और अरब जगत का अनौपचारिक नेता मानता है.

  • पब्लिक प्रेशर और अरब एकजुटता: गजा और वेस्ट बैंक के हालात को लेकर पूरे अरब जगत के नागरिकों में भारी गुस्सा है. ऐसे समय में अगर सऊदी प्रतिनिधि हॉल में बैठे रहते, तो इससे मुस्लिम देशों के बीच रियाद की छवि को नुकसान पहुंच सकता था.
  • सऊदी-इजरायल नॉर्मलाइजेशन पर ब्रेक: अमेरिका लंबे समय से सऊदी अरब और इजरायल के बीच ऐतिहासिक समझौता कराने की कोशिश में है. लेकिन सऊदी अरब ने साफ कर दिया है कि जब तक फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा नहीं मिलता और युद्ध विराम नहीं होता, तब तक इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते. वॉक आउट करके सऊदी अरब ने दुनिया को यही संदेश दिया है.

UAE क्यों बैठा रहा? अब्राहम एकॉर्ड्स की ‘प्रैक्टिकल कूटनीति’

सऊदी के बाहर जाने के बावजूद यूएई का डेलीगेशन हॉल में क्यों बैठा रहा? इसके पीछे यूएई की ‘रियलोपोलिटिक’ विदेश नीति छिपी है.

  1. ‘अब्राहम एकॉर्ड्स’ का बंधन : साल 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता में यूएई और इजरायल ने औपचारिक कूटनीतिक संबंध स्थापित किए थे, जिसे ‘अब्राहम एकॉर्ड्स’ कहा जाता है. यूएई उन चुनिंदा अरब देशों में से है, जिनके इजरायल में दूतावास हैं और दोनों देशों के बीच सीधे व्यापारिक और राजनयिक संबंध हैं. औपचारिक रिश्ते होने के नाते यूएई प्रतीकात्मक बहिष्कार के बजाय बातचीत के रास्ते को प्राथमिकता देता है.
  2. ‘सुनना और फिर जवाब देना’, यूएई का डिप्लोमैटिक विजन : यूएई की विदेश नीति का मूल मंत्र है, ‘डिप्लोमैटिक एंगेजमेंट’ यानी संवाद न तोड़ना. यूएई का मानना है कि आप जिससे असहमत हैं, उसकी बात को सुने बिना आप अपनी बात प्रभावी ढंग से नहीं रख सकते. हॉल में बैठकर नेतन्याहू का भाषण सुनना उनके रुख का समर्थन करना नहीं, बल्कि कूटनीतिक मौजूदगी दर्ज कराना था.
  3. आर्थिक और तकनीकी Vision 2031 : यूएई अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से हटाकर टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और फाइनेंस का ग्लोबल हब बनाना चाहता है. इसमें इजरायल एक महत्वपूर्ण साझेदार है. यूएई ने गज़ा युद्ध की कड़े शब्दों में निंदा की है और भारी मात्रा में राहत सामग्री भेजी है, लेकिन उसने इजरायल के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को पूरी तरह खत्म नहीं किया है.
  4. ईरान से सुरक्षा की साझा चिंता : भले ही सार्वजनिक रूप से यूएई और इजरायल कई मुद्दों पर अलग दिखें, लेकिन पश्चिम एशिया में ईरान-समर्थित उग्रवादी गुटों से दोनों देशों को सुरक्षा संबंधी चिंताएं रहती हैं. यूएई जानता है कि क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए इजरायल के साथ पर्दे के पीछे संवाद बनाए रखना कितना जरूरी है.

नेतन्याहू का सात मोर्चों वाला युद्ध और अमेरिका का साथ

अपने 40 मिनट के आक्रामक भाषण में नेतन्याहू ने इजरायल को ‘सात मोर्चों पर जंग लड़ने वाला योद्धा’ बताया. उन्होंने हमास, हिजबुल्लाह, हूथी, ईरान, और इराक-सीरिया के मिलिशिया गुटों का जिक्र करते हुए कहा कि इजरायल अपनी जमीन और अस्तित्व की रक्षा कर रहा है.

उन्होंने अमेरिका और राष्ट्रपति ट्रंप के साथ साझेदारी की तारीफ की और ईरान के परमाणु ठिकानों पर की गई सैन्य कार्रवाइयों को जायज ठहराया. नेतन्याहू ने न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी से लेकर यूरोपीय नेताओं तक पर जमकर भड़ास निकाली और उन पर ‘यहुदी-विरोधी’ मानसिकता को बढ़ावा देने का आरोप लगाया.

अरब जगत में दो फाड़ का संदेश

संयुक्त राष्ट्र का ये नजारा मध्य पूर्व की बदलती और उलझी हुई जियोपॉलिटिक्स का एक जीता-जागता सबूत है.

एक तरफ सऊदी अरब, ईरान और तुर्की जैसे देश हैं, जो जनभावनाओं और धार्मिक-सांस्कृतिक एकजुटता को देखते हुए सख्त और आक्रामक रुख अपना रहे हैं. दूसरी तरफ यूएई और बहरीन जैसे देश हैं, जो अब्राहम एकॉर्ड्स के तहत व्यावहारिक कूटनीति, व्यापार और खुले संवाद के रास्ते पर चलना ज्यादा बेहतर समझते हैं.

नेतन्याहू के सामने हुआ ये वॉक आउट भले ही एक सिंबॉलिक विरोध था, लेकिन इसने ये साबित कर दिया कि इजरायल भले ही अपनी सैन्य ताकत से जंग लड़ रहा हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मोर्चे पर उसकी राह आज भी बेहद कठिन और चुनौतीभरी है.



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