IFS Gautam Padibhar Success Story: मां की मेहनत और त्याग की कहानियां अक्सर लोगों को प्रेरित करती हैं, लेकिन कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो सीधे दिल को छू जाती हैं. महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव से शुरू हुई गौतम पडीभर की कहानी भी ऐसी ही है. दरअसल, उनके घर में बहुत गरीबी थी. वहीं पिता का साया भी जल्दी उठ गया और मां ने कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा थे. इसके बावजूद उन्होंने एक सपना देखा – अपने बच्चों को पढ़ाने का. यही सपना उनके बेटे को IIT मद्रास और फिर भारतीय वन सेवा (IFS) तक ले गया.
सकड़ों पर करचा बीनकर जारी रखी बच्चों की पढ़ाई
दरअसल, गौतम पडीभर की मां सखुबाई पडीभर कभी स्कूल नहीं जा सकी थीं. वहीं, जब पति का निधन हुआ, तो पूरे परिवार की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर आ गई. ऐसे में घर चलाने के लिए उन्होंने शुरुआत में गांव में दिहाड़ी मजदूरी की और बाद में रोजी-रोटी की तलाश में मुंबई पहुंचीं. वहां एक झुग्गी बस्ती में रहकर उन्होंने कई साल तक कचरा बीनने का काम किया.
घर के आर्थिक हालत इतने खराब थे कि कई बार खाने को दो वक्त की रोटी भी नहीं होती थी. मुश्किल हालात, बीमारी और एक गंभीर हादसे के बाद भी सखुबाई ने काम करना नहीं छोड़ा. उनका सिर्फ एक मकसद था कि उनके बच्चों की पढ़ाई किसी भी कीमत पर ना रुके.
झुग्गी से निकलकर IIT मद्रास तक का सफर
वहीं, गौतम ने अपनी शुरुआती पढ़ाई महाराष्ट्र के जवाहर नवोदय विद्यालय, जालना से की. पढ़ाई में उनका प्रदर्शन अच्छा रहा और उन्होंने बिना किसी महंगी कोचिंग के JEE परीक्षा भी पास कर ली. इसके बाद उन्हें देश के प्रतिष्ठित संस्थान IIT मद्रास में B.Tech में एडमिशन मिल गया.
गौतम ने बताया कि उनकी सफलता के पीछे सबसे बड़ा योगदान उनकी मां का है. संसाधनों की कमी थी, लेकिन मां ने कभी उन्हें यह महसूस नहीं होने दिया कि गरीबी उनके सपनों की राह रोक सकती है.
UPSC में हासिल की AIR 139, बने भारतीय वन सेवा अधिकारी
इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद गौतम ने सिविल सेवा की राह चुनी. उन्होंने UPSC Indian Forest Service Examination 2022 में ऑल इंडिया रैंक 139 हासिल की. इसके बाद उनका सेलेक्शन 2023 बैच के भारतीय वन सेवा (IFS) में हुआ और उन्हें छत्तीसगढ़ कैडर मिला. फिलहाल गौतम छत्तीसगढ़ के जगदलपुर स्थित कांगेर वैली नेशनल पार्क में निदेशक के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं.
जब मां पहली बार बेटे की अफसर वाली कुर्सी पर बैठीं
गौतम की जिंदगी का सबसे भावुक पल तब आया, जब उनकी मां पहली बार उनके ऑफिस पहुंचीं. उन्होंने अपनी मां को अपनी सरकारी कुर्सी पर बैठाया और उस पल की तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा की. गौतम ने लिखा कि यह कुर्सी सिर्फ उनकी नौकरी की पहचान नहीं है, बल्कि उन सालों की मेहनत और संघर्ष की निशानी है, जब उनकी मां मजदूरी और कचरा बीनकर बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाती थीं. उनके अनुसार, इस सफलता पर सबसे पहला हक उनकी मां का है.
मां की सीख ने बदल दी पूरे परिवार की किस्मत
दरअसल, गौतम पडीभर की कहानी सिर्फ एक प्रतियोगी परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है. यह उस मां की कहानी है जिसने खुद शिक्षा नहीं पाई, लेकिन अपने बच्चों को पढ़ाई की ताकत समझाई. उनके त्याग और भरोसे ने एक ऐसे परिवार की तस्वीर बदल दी, जो कभी गरीबी और संघर्ष से जूझ रहा था. आज सखुबाई पडीभर की कहानी इस बात का उदाहरण है कि अगर परिवार में शिक्षा को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाए, तो कठिन से कठिन परिस्थितियां भी सफलता की राह नहीं रोक पातीं.