इन दिनों जहां देखों फिल्म ‘हनुमान अंश’ की चर्चा हो रही है. जितना प्यार लोग इस फिल्म को दे रहे हैं, उतना ही पसंद फिल्म के गानों को किया जा रहा है. इसी फिल्म का एक गाना है, ‘जब जिद पर आ गई पार्वती, समझाने आए सप्तऋषि, क्यों जिद कर रहीं, काय कू मर रईं…’ गाने की धुन और बोल ऐसे हैं कि हर किसी की जुबान पर चढ़ गए हैं. पर क्या आपको पता है इस गाने में जिन सप्तऋषियों का जिक्र किया गया है, वो कौन हैं? क्या है इन सप्तऋषियों की कहानी.
सप्तऋषि (सप्त + ऋषि) का अर्थ है “सात ऋषि”. सप्त ऋषि हिंदू परंपरा के सात महान ऋषि माने जाते हैं, जिन्हें वैदिक ज्ञान, तप, धर्म और मानव-समाज के मार्गदर्शन का प्रतीक माना गया है. उनकी सूची सभी ग्रंथों में एक जैसी नहीं है, क्योंकि अलग-अलग मन्वंतर (सृष्टि-काल) के लिए अलग सप्तर्षि बताए गए हैं. इनका उल्लेख वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों, महाभारत और विभिन्न पुराणों में मिलता है. इन्हें कई परंपराओं में प्रमुख गोत्रों का प्रवर्तक भी माना जाता है.
सप्तऋषि कौन हैं?
- महर्षि वशिष्ठ – ऋषि वशिष्ठ राजा दशरथ के कुलगुरु थे। उनके द्वारा ही राजा दशरथ के चारों पुत्रों- राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न ने शिक्षा प्राप्त की थी. कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध हुआ, जिसमें महर्षि वशिष्ठ विजयी हुए थे.
- महर्षि कश्यप – ऋषि कश्यप ब्रह्माजी के मानस-पुत्र मरीची के विद्वान पुत्र थे. हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, कश्यप ऋषि के वंशज ही सृष्टि के प्रसार में सहायक हुए. कश्यप ऋषि की 17 पत्नियां थी. इनकी अदिति नाम की पत्नी से सभी देवता और दिति नाम की पत्नी से दैत्यों की उत्पत्ति मानी गई है.
- महर्षि अत्रि – ऋषि अत्रि, ब्रह्मा के सतयुग के 10 पुत्रों में से एक माने जाते हैं. अनुसूया उनकी पत्नी थी। हमारे देश में कृषि विकास के लिए ऋषि अत्रि का योगदान सबसे अहम माना जाता है.
- महर्षि जमदग्नि – भगवान परशुराम ऋषि जमदग्नि के ही पुत्र थे. इनके आश्रम में इच्छित फलों को प्रदान करनी वाली गाय थी, जिसे कार्तवीर्य छीनकर अपने साथ ले गया था.
- महर्षि गौतम – गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या थीं. पति से श्राप पाकर ही अहिल्या पत्थर की बन गई थी और भगवान श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान पुन: मानवरूप दिया था. गौतम ऋषि अपने तपबल पर ब्रह्मगिरी के पर्वत पर मां गंगा को लेकर आए थे.
- महर्षि विश्वामित्र – विश्वामित्र ऋषि होने के साथ-साथ एक राजा भी थे. वे ऋषि विश्वामित्र ही थे जिन्होनें गायत्री मन्त्र की रचना की थी. ऋषि विश्वामित्र की तपस्या और अप्सरा मेनका द्वारा उस तपस्या को भंग किए जाने का प्रसंग बहुत प्रसिद्ध है.
- महर्षि भारद्वाज – सप्तऋषियों में भारद्वाज ऋषियों को सबसे ऊंचा स्थान मिला हुआ है. ऋषि भारद्वाज ने आयुर्वेद सहित कई ग्रंथों की रचना की थी. इनके पुत्र द्रोणाचार्य थे.
सबसे पहले किस ग्रंथ में उल्लेख मिलता है?
सप्तऋषियों की अवधारणा का आधार वैदिक साहित्य है. ऋग्वेद में कई ऋषि कुलों का उल्लेख मिलता है. सप्तऋषियों की सबसे प्राचीन स्पष्ट सूची जैमिनीय ब्राह्मण में मिलती है. इसके बाद शतपथ ब्राह्मण और बृहदारण्यक उपनिषद में भी सप्तऋषियों का वर्णन मिलता है. यानी सप्तऋषि केवल पुराणों की कथा नहीं हैं, बल्कि उनकी जड़ें वैदिक परंपरा में हैं. ऋग्वेद में ऋषियों को मंत्रों के ‘द्रष्टा’ अर्थात ज्ञान या मंत्र का अनुभव करने वाले महर्षि माना गया है. सप्तर्षियों की धारणा का वैदिक आधार यहीं से जुड़ता है.
सप्तऋषियों की उत्पत्ति
पुराणों में बताया गया है कि ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना के लिए अपने मन से कुछ पुत्र उत्पन्न किए, जिन्हें मानस पुत्र कहा गया. यही मानस पुत्र सप्तऋषि कहलाए हैं. इन्हें मानव सभ्यता के प्रथम गुरु और गोत्रों के प्रवर्तक भी माना जाता है. ब्रह्मा के मस्तिष्क से जन्मे इन मानस पुत्रों को ज्ञान, विज्ञान, धर्म-ज्योतिष और योग में सर्वोपरि माना जाता है.
क्यों पार्वती को समझाने आए थे सप्तऋषि?
फिल्म ‘हनुमान अंश’ का ये गाना ‘जब जिद पे आ गईं पार्वती’ महज एक रचा गया गाना नहीं है. बल्कि इसमें शिव पुराण की उस कथा को बुंदेली भाषा में खूबसूरती से उतारा गया है. जब पार्वती, कैलाश के महायोगी और भूतों के बीच विराजने वाले शिव से ब्याह रचाने के लिए हठ करने लगीं तब सच में सप्तऋषि उन्हें समझाने आए थे. शिव पुराण और रामचरितमानस में इस कथा का उल्लेख आता है. माता पार्वती भगवान शिव को वर के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या कर रही थीं. ऐसे में भगवान शिव ने माता पार्वती की अटूट भक्ति और दृढ़ संकल्प की परीक्षा लेने के लिए सप्तऋषियों को उनके पास भेजा था. तब सप्तऋषियों ने जाकर माता पार्वती को शिव के रूप, वेशभूषा और कुल-हीन होने का भय दिखाया और अपनी कठोर तपस्या छोड़ने का सुझाव दिया था. सप्तऋषिय महाज्ञानी थे पर उनकी बातों को सुनने के बाद भी माता पार्वती ने अपनी तपस्या नहीं छोड़ी. सिर्फ सप्तऋषि ही नहीं, स्वयं भगवान शिव एक ब्रह्मचारी का वेष धर माता पार्वती के पास आए और शिव की आलोचना की. लेकिन पार्वती जी ने कुछ भी सुनने से इंकार कर दिया. मां पार्वती के इस दृढ़ निश्चय को देखने के बाद भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया.