Xi Jinping US Visit: क्या मजबूरी होगी? दुश्मन की मेजबानी को तैयार हैं ट्रंप पर जिनपिंग को चुभ जाएगी ठहाकों की ये तस्वीर

Xi Jinping US Visit: क्या मजबूरी होगी? दुश्मन की मेजबानी को तैयार हैं ट्रंप पर जिनपिंग को चुभ जाएगी ठहाकों की ये तस्वीर


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क्या मजबूरी होगी? दुश्मन की मेजबानी को तैयार ट्रंप, पर शी को चुभेगी ये तस्वीर

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Xi Jinping US Visit: चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मेजबानी अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप करने वाले हैं. ये यात्रा अपने आपमें खास है क्योंकि किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि ट्रंप जिसे खुले मंच से दुश्मन कह चुके हैं, उसका न सिर्फ रेड कार्पेट वेलकम करेंगे बल्कि प्रोटोकॉल तोड़कर एयरपोर्ट लेने भी जाएंगे. हालांकि इस मिठास में खटास डालने वाली है अमेरिकी राष्ट्रपति और जापान के पीएम की इससे ठीक पहले हुई मीटिंग.

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चीन के स्वागत में तैयार है अमेरिका.

दुनिया में सर्वाइव करने का एक ही नियम है- यहां कोई हमेशा के लिए न दुश्मन होता है और न ही दोस्त. इसका सबसे बड़ा उदाहरण इस वक्त अमेरिका और चीन के बदलते समीकरण हैं. एक वक्त था, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान चीन को सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया था, लेकिन आज वही ट्रंप चीन के राष्ट्रपति की तारीफ करते नहीं थकते.  चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अमेरिका के ऑफिशियल विजिट पर पहुंचने जा रहे हैं और ट्रंप ने स्वागत का पारंपरिक प्रोटोकॉल तोड़ते हुए एयरपोर्ट पर खुद उनका वेलकम करने का फैसला किया है. आप समझ सकते हैं कि वे क्या मैसेज देना चाहते हैं.

यह यात्रा न केवल चीन-अमेरिका संबंधों बल्कि वैश्विक राजनीति के लिए भी बेहद अहम मानी जा रही है, सवाल यह है कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से चली आ रही प्रतिद्वंद्विता के बावजूद शी जिनपिंग ट्रंप के मेहमान बनने को क्यों तैयार हुए?  इसके पीछे निश्चित तौर पर वजह कूटनीतिक है लेकिन ट्रंप यहां पर भी अपनी चाल चल रहे हैं. 24 सितंबर को चीनी राष्ट्रपति पहुंचने जा रहे हैं, पर उन्होंने इससे ठीक पहले जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के साथ न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पर मुलाकात की. निश्चित तौर पर ये चीन को संदेश है कि वे किसी के पाले में नहीं हैं.

जापान की राष्ट्रपति से मुलाकात क्यों महत्वपूर्ण?

ट्रंप और ताकाइची ने जापान-अमेरिका गठबंधन की मजबूती और एशिया में बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों पर जोर दिया. ताकाइची ने एआई, सेमीकंडक्टर और क्रिटिकल मिनरल्स में द्विपक्षीय आर्थिक सुरक्षा सहयोग की प्रगति का उल्लेख किया. यह बैठक रीजनल पावर बैलेंस को दिखाने वाली है. शी की अमेरिका यात्रा और उसके बाद यूएनजीए में संभावित चीन-जापान संवाद वैश्विक कूटनीति की जटिलताओं को दिखाते हैं. व्यापार और तकनीक में समझौते की गुंजाइश है, लेकिन ताइवान और क्षेत्रीय विवादों पर मतभेद बने रह सकते हैं. ये मुलाकातें पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की स्थिरता को प्रभावित करने वाली हैं.

चीन-अमेरिका के बीच किन-किन मुद्दों पर बात?

रिपोर्टों के मुताबिक 24 सितंबर से शुरू होने वाली इस शिखर बैठक में तीन प्रमुख मुद्दों पर बात होने वाली है. जिन्हें – व्यापार, तकनीक और ताइवान के रूप में देखा जा सकता है. हालांकि, किसी बड़े और ऐतिहासिक समझौते की संभावना कम ही दिख रही है क्योंकि इन मुद्दों पर पिछली मई 2026 की बैठक में भी बात हो चुकी है. दोनों देश ईरान के मुद्दे पर बात जरूर करेंगे क्योंकि चीन-अमेरिका के बीच इस पर भी मतभेद रहा है-

  1. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: एआई में हो रहे तेज बदलावों के कारण तकनीक का मुद्दा और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है. व्यापार इसमें सबसे अहम एजेंडा है. करीब एक साल पहले दक्षिण कोरिया के बुसान में दोनों नेताओं के बीच हुए समझौते के तहत अमेरिका ने उच्च तकनीक उत्पादों पर कुछ निर्यात नियंत्रण हटाने और चीनी सामानों पर भारी शुल्क कम करने की सहमति दी थी. बदले में चीन ने दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति सीमित न करने का वादा किया था. अब इस समझौते के नवीनीकरण का समय आ गया है.
  2. व्यापार पर बात: दोनों पक्ष मौजूदा व्यवस्था को छोटे बदलावों के साथ जारी रखना चाहेंगे. बोर्ड ऑफ ट्रेड और बोर्ड ऑफ इन्वेस्टमेंट जैसे प्रस्ताव भी चर्चा में हैं, हालांकि इनके स्वरूप पर अभी स्पष्टता नहीं है. चीन इस बैठक में प्रमुख कंपनियों के सीईओ को शामिल करने का प्रस्ताव दे सकता है, जैसा ट्रंप की बीजिंग यात्रा में एनवीडिया और टेस्ला के प्रमुख शामिल हुए थे.
  3. ताइवान का मुद्दा: ताइवान का मुद्दा सबसे संवेदनशील है. ट्रंप ने चीन के हमले की स्थिति में ताइवान की रक्षा की स्पष्ट प्रतिबद्धता से दूरी बनाए रखी है और रणनीतिक अस्पष्टता की पुरानी नीति दोहराई है. शी जिनपिंग इस यात्रा में 1982 के संयुक्त बयान का हवाला देते हुए अमेरिका पर ताइवान को हथियारों की बिक्री रोकने का दबाव डाल सकते हैं. चीन ताइवान को अपना अभिन्न अंग मानता है और नियमित रूप से हथियार बिक्री बंद करने की मांग करता रहा है. अमेरिका कानूनन ताइवान को आत्मरक्षा के साधन उपलब्ध कराने के लिए बाध्य है.

दोनों देशों के बीच कई पुराने और नए मुद्दे चर्चा का विषय बन सकते हैं. इनमें पूर्वी चीन सागर में सेनकाकू द्वीपों को लेकर क्षेत्रीय विवाद, ताइवान का मुद्दा, ऐतिहासिक विवाद और आर्थिक सुरक्षा प्रमुख हैं. जापान अमेरिका के साथ गठबंधन को मजबूत कर रहा है, जबकि चीन क्षेत्र में अपने प्रभाव का विस्तार चाहता है. एआई, सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों संभव हैं. ऐसे में चीन को अमेरिका के साथ उसका सहयोग पसंद बिल्कुल नहीं आएगा.



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