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IIT Campus Caste System: आईआईटी मद्रास के पूर्व छात्र रमेश श्रीवत्स ने 1980 के दशक के अपने कैंपस अनुभव साझा किए हैं. उन्होंने कहा कि छात्रों के बीच एक तरह की ‘कास्ट’ व्यवस्था थी, लेकिन इसका आधार जन्म या परिवार नहीं था. दरअसल, JEE रैंक, ब्रांच, GPA और करियर के साथ छात्रों की सामाजिक स्थिति बदलती रहती थी.
IIT Campus Caste System: इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) जैसे संस्थानों में पढ़ाई के साथ-साथ छात्रों के बीच कॉम्पिटिशन और रैंक को लेकर एक अलग तरह की दुनिया देखने को मिलती है. ऐसे ही अपने अनुभव को IIT मद्रास के पूर्व छात्र और ब्रांड स्ट्रैटेजिस्ट रमेश श्रीवत्स ने हाल ही में साझा किया. 1980 के दशक के अपने कॉलेज के दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वहां भी एक तरह का ‘कास्ट सिस्टम’ था, लेकिन इसका संबंध किसी की जाति या परिवार से नहीं था. बल्कि हर साल सफलता के पैमाने बदलते रहते थे.
पहले JEE रैंक तय करती थी ‘कास्ट’
रमेश श्रीवत्स के मुताबिक, जब उन्होंने IIT Madras में एडमिशन लिया, तब छात्रों के बीच पहला बड़ा फर्क उनकी JEE रैंक से किया जाता था. जिस छात्र की रैंक जितनी अच्छी होती, उसे उतना ही ज्यादा महत्व मिलता था. लेकिन कुछ ही महीनों बाद यह तस्वीर बदल जाती थी और JEE रैंक की जगह ब्रांच छात्रों की पहचान का बड़ा पैमाना बन जाती थी.
उन्होंने बताया कि उस समय कंप्यूटर साइंस (Computer Science) को सबसे बेस्ट माना जाता था. इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक्स (Electronics), इलेक्ट्रिकल (Electrical), मैकेनिकल (Mechanical) और दूसरी ब्रांचों का नंबर आता था. यानी कॉलेज में एडमिशन के कुछ समय बाद ही छात्रों के बीच तुलना का आधार बदल गया था.
ब्रांच के बाद GPA बन गया नया पैमाना
श्रीवत्स ने बताया कि दूसरे और तीसरे साल तक आते-आते ब्रांच को लेकर बनी यह सोच भी कमजोर पड़ जाती थी. छात्र ज्यादातर अपनी-अपनी ब्रांच के दोस्तों के साथ रहने लगते थे. इसके बाद छात्रों के बीच एक नया पैमाना सामने आया और वह था GPA यानी ग्रेड प्वाइंट एवरेज.
I was in IIT Madras in the 80s, and it was very caste-conscious.
However, your caste changed every year.
From JEE to Branch to GPA to Future.
But never about your birth.
Watch. pic.twitter.com/BC8PXEbB3X