Opinion: न एंटी रोमियो, न पिंक फोर्स… रेप रोकना है तो माइंडसेट बदलना जरूरी
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जमुई की घटना ने महिला सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. दिल्ली में भी नाबालिग से गैंगरेप का मामला सामने आया है. सरकार और पुलिस अपने स्तर पर कदम उठा रही हैं. दिल्ली में पिंक फोर्स बनाने की तैयारी है. एंटी रोमियो स्क्वायड जैसी पहल पहले से मौजूद है. लेकिन क्या सिर्फ पुलिस और कानून से महिलाओं के खिलाफ हिंसा रुक सकती है? असली सवाल समाज की सोच का है. बेटियों पर पाबंदी लगाने की जगह बेटों को महिलाओं का सम्मान करना सिखाना होगा. सहमति और ना का मतलब समझाना होगा. कानून का डर जरूरी है लेकिन सोच में बदलाव भी उतना ही जरूरी है. महिला सुरक्षा की असली लड़ाई माइंडसेट बदलने से शुरू होगी.
जमुई और दिल्ली की घटनाओं के बीच महिला सुरक्षा पर बड़ा सवाल. (फोटो AI)
बिहार की जमुई में घटी घटना ने एक बार फिर लोगों के भीतर गुस्सा भर दिया है. जमुई की घटना महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ होने वाली हिंसा की वीभत्स घटनाओं में से एक है. एक नाबालिग के साथ छेड़छाड़ और रेप करने की कोशिश का वीडियो लोगों को अंदर तक हिला गया. आम बातचीत से लेकर चौक-चौराहों तक. ऑफिस और सोशल मीडिया तक इसी घटना का जिक्र है. हर तरफ लोग इस समय इसी बात पर बहस कर रहे हैं कि घटना में गलती किसकी थी. कुछ लोगों को महिला सुरक्षा को लेकर सच में चिंता हो रही है तो कुछ लोग इस घटना के बहाने सरकार पर सवाल उठा रहे हैं. इस घटना के बहाने कई सवाल हमारे सामने हैं. क्या इस तरह की घटनाओं को रोकने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की होती है? क्या यह समाज की विफलता नहीं है? क्या इस तरह की घटना हमें सोचने को मजबूर नहीं करती कि बतौर समाज हम सारी नैतिकता का ठेका लड़कियों को दे देते हैं? बेटियों की मोरल पुलिसिंग की जगह हम बेटों को अगर महिलाओं का सम्मान करना सिखाते तो शायद इस तरह की घटनाएं कम हो जातीं. सरकार ने तो इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए एंटी रोमियो स्क्वायड से लेकर पिंक फोर्स तक बनाई हैं. लेकिन बतौर समाज और नागरिक हमने क्या किया है? हमने अपने बेटों के दिमाग में महिलाओं के प्रति सम्मान क्यों नहीं उतार पाए? रेप जैसी घटनाओं को रोकने के लिए माइंडसेट बदलने की जरूरत है.
दिल्ली में भी महिला सुरक्षा को लेकर एक ऐसी ही बहस सामने है. दक्षिण दिल्ली के कालकाजी मंदिर के पास आस्था कुंज पार्क में 17 साल की नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप का मामला सामने आया है. पुलिस ने मुख्य अभियुक्त को मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया है. पुलिस के मुताबिक आरोपी ने घेराबंदी के दौरान गोली चलाई. जवाबी कार्रवाई में उसके पैर में गोली लगी और उसे इलाज के लिए एम्स ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया. दूसरी तरफ दिल्ली में महिला सुरक्षा मजबूत करने के लिए पिंक फोर्स बनाने की तैयारी है. यानी व्यवस्था अपने स्तर पर कदम उठा रही है. लेकिन सवाल यही है कि क्या सिर्फ पुलिस की मौजूदगी से सोच बदलेगी?
पिंक फोर्स जरूरी है लेकिन क्या इतना काफी है?
दिल्ली के उपराज्यपाल सदार टीएस संधू ने पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक में गोवा पुलिस की तर्ज पर प्रशिक्षित महिला पुलिसकर्मियों की समर्पित महिला-केंद्रित गश्ती यूनिट बनाने का निर्देश दिया है. यह फोर्स स्कूलों, कॉलेजों, मेट्रो स्टेशनों और संवेदनशील जगहों पर तैनात की जाएगी. मकसद साफ है. सार्वजनिक जगहों पर पुलिस की मौजूदगी बढ़े और जरूरत पड़ने पर तेजी से कार्रवाई हो. यह जरूरी कदम है. लेकिन अपराध होने से पहले अपराधी की सोच पर पुलिस का पहरा नहीं लगाया जा सकता.
जमुई का वीडियो सिर्फ एक घटना नहीं
जमुई में 10वीं की छात्रा के साथ सड़क पर बदसलूकी का मामला इसी सवाल को और बड़ा करता है. छात्रा कोचिंग के बाद अपने क्लासमेट के साथ स्कूटी से मड़वा पहाड़ गई थी. लौटते समय कुछ लड़कों ने दोनों को रोका. छात्रा के साथ अश्लील हरकतें की गईं. घटना का वीडियो भी बनाया गया. पुलिस ने मुख्य आरोपी सहित अन्य आरोपियों को भी पकड़ा है. पुलिस ने यह भी कहा है कि वीडियो को सोशल मीडिया पर फैलाने वालों के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई होगी.
सवाल लड़कियों से ज्यादा बेटों से पूछना होगा
हमारे समाज में अक्सर ऐसी घटनाओं के बाद लड़की के कपड़े पूछे जाते हैं. उसके बाहर जाने का समय पूछा जाता है. वह किसके साथ थी यह पूछा जाता है. लेकिन असली सवाल यह होना चाहिए कि लड़कों ने किसी लड़की को अपनी इच्छा के अनुसार कुछ भी करने की चीज समझने की हिम्मत कैसे की? बेटे को यह सिखाना जरूरी है कि किसी लड़की की सहमति के बिना उसे छूना भी गलत है. किसी लड़की को सड़क पर रोकना भी गलत है. उसके साथ अश्लील व्यवहार करना तो अपराध है ही.
कानून का डर और संस्कार दोनों जरूरी
एंटी रोमियो स्क्वायड हो या पिंक फोर्स. पुलिस की सख्ती जरूरी है. कानून का डर भी जरूरी है. लेकिन इसके साथ घर और स्कूल में होने वाली परवरिश पर भी बात करनी होगी. सम्मान किताब के किसी एक चैप्टर से नहीं आता है यह रोजमर्रा के व्यवहार से बनता है. अगर बेटों को बचपन से यह समझाया जाए कि महिलाओं की आजादी और सम्मान उतना ही जरूरी है जितना उनका अपना तो बदलाव की शुरुआत हो सकती है.
समाज को अपनी जिम्मेदारी भी देखनी होगी
हर घटना के बाद सरकार से जवाब मांगना आसान है. सरकार से सवाल होने भी चाहिए. पुलिस की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए. लेकिन समाज खुद को सवालों से बाहर नहीं रख सकता. जमुई जैसी घटना हो या दिल्ली का मामला. दोनों हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि सिर्फ सुरक्षा बल बढ़ाने से समस्या खत्म नहीं होगी. पिंक फोर्स सड़कों पर सुरक्षा दे सकती है. एंटी रोमियो स्क्वायड कार्रवाई कर सकता है. लेकिन महिलाओं को इंसान और बराबर का नागरिक समझने वाली सोच घर से ही बनानी होगी. असली लड़ाई इसी माइंडसेट की है.