मिर्जापुर: उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले में स्थित नार घाट अति प्राचीन गंगा घाट है. नार घाट का इतिहास सिर्फ गंगा घाट की वजह से नहीं, बल्कि यहां से होने वाले व्यवसाय की वजह से जाना जाता था. नार घाट से बड़े स्तर पर व्यवसाय होता था, जहां माल की सप्लाई अलग-अलग प्रांतों में हुआ करती थी. समय में बदलाव के साथ ही भले नार घाट की उपयोगिता कम हो गई, लेकिन आज भी गंगा घाट के रूप में यह घाट बेहद खास है. यहां पर कई ऐसे मंदिर हैं और कई ऐसे देवस्थान हैं, जहाँ पर काफ़ी संख्या में भक्त दर्शन-पूजन करने के लिए आते हैं. गंगा घाट का इतिहास यहां पर मौजूद शिलालेख में दर्ज कराया गया है.
पीतल के बर्तन व खाद्यान होता था सप्लाई
मिर्जापुर के नारघाट से प्राचीन समय में बड़े-बड़े नावों की मदद से कारोबार होता था, यहां पर 30 से 50 ऐसी नावें चलती थीं, जिस पर माल लदकर कोलकाता, वाराणसी, पटना सहित अन्य स्थानों पर जाया करते थे, इसमें पीतल के बर्तन, खाद्यान्न सामग्री सहित अन्य सामान हुआ करते थे. यहां से सामान अलग-अलग जगहों पर जाने के बाद बाजार में बिक्री की जाती थी. समय में बदलाव के साथ ही भले ही नारघाट की उपयोगिता कम हो गई, लेकिन यहां पर मौजूद शिलालेख में नारघाट के प्राचीन इतिहास, यहां के व्यवसायिक गतिविधियों को दर्शाया गया है. यहां के लोग बताते हैं कि यह घाट अतिप्राचीन है और इसे कारोबार के लिए बनाया गया था. इसका उपयोग बंदरगाह के रूप में किया जाता था.
30 नाव से वाराणसी से होता था कारोबार
गंगा घाट पर मौजूद नाविक मुन्नू ने बताया कि यह घाट प्राचीन समय से ही बेहद खास रहा है. पूर्वज बताते थे कि यहां पर गंगा के माध्यम से कारोबार होता था. करीब 20 से 30 नाव की मदद से यहां से माल की सप्लाई की जाती थी, सबसे ज्यादा पीतल और यहां से मोटा अनाज, जोधरी इत्यादि की सप्लाई की जाती थी. वाराणसी सहित अन्य बाजारों में इसे भेजा जाता था. समय के साथ ही यहां पर घाट की उपयोगिता भले कम हो गई लेकिन यहां का इतिहास आज भी जीवंत है.
माल सप्लाई बंद होने से प्रभावित हुई आजीविका
मुन्नू ने बताया कि यहाँ पर जो नावें चलती थीं, वो विशाल हुआ करती थीं, काफी लंबी नावें हुआ करती थीं, जोकि गंगा में उठने वाली लहरों के बीच में से भी जाने में सक्षम थीं. उस नाव को चलाने के लिए करीब चार नाविक का मदद लेना पड़ता था. नाव पर सामान लदने के बाद वाराणसी जाते थे, यहां करीब पांच से छह घंटों के अंदर वाराणसी पहुंच जाते थे. वाराणसी के बाद यह माल अलग-अलग जगहों पर जाता था. हालांकि, धीरे-धीरे जब ट्रांसपोर्ट की सुविधाएं बढ़ गईं तो गंगा मार्ग का प्रयोग कम हो गया. यहां पर कई लोगों की आजीविका भी चलती थी, यहां से माल की सप्लाई बंद होने के बाद उनकी आजीविका भी पूरी तरीके से प्रभावित हो गई.