D Chowk Uprising : PoK की वो चौक…जहां दबे हैं पाकिस्तान के पापों के सबूत, भारत बॉर्डर से सिर्फ 700KM दूर, यहीं होने वाला है कुछ बड़ा

D Chowk Uprising : PoK की वो चौक…जहां दबे हैं पाकिस्तान के पापों के सबूत, भारत बॉर्डर से सिर्फ 700KM दूर, यहीं होने वाला है कुछ बड़ा


जब किसी हुकूमत के जुल्म और अत्याचार हद से पार हो जाते हैं, तब जनता का खौफ दम तोड़ने लगता है और बगावत की आग भड़क उठती है. आज पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के हालात कुछ ऐसे ही हो चुके हैं. यहां का डी-चौक इस समय सिर्फ एक चौराहा नहीं रह गया है, बल्कि ये पाकिस्तानी फौज के जुल्म, भ्रष्टाचार और उनके काले कारनामों के खिलाफ जनता के विरोध का सबसे बड़ा अखाड़ा बन चुका है. भारत की सीमा से महज 600 से 700 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ये इलाका इस समय सुलग रहा है, और यहां जो कुछ चल रहा है, वह पाकिस्तान के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है.

डी-चौक: यही पर भरभराकर गिरेगा पाकिस्तान का सिस्टम

रावलकोट शहर का डी-चौक कोई आम जगह नहीं है. ये शहर का सेंटर है, जो प्रशासनिक इमारतों और बाजारों को आपस में जोड़ता है. जब यहां हजारों लोग सड़कों पर उतरकर बैठ जाते हैं, तो इस्लामाबाद और मुजफ्फराबाद के हुक्मरानों की नींद उड़ जाती है. इस चौक के इतना अहम होने के पीछे कई ठोस वजहें हैं.

  • प्रशासनिक और रणनीतिक केंद्र: यहां धरना देने से सरकार का पूरा कामकाज ठप हो जाता है और सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच जाता है.
  • अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक: ‘जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी’ (JAAC) ने इसी चौक को अपनी हुंकार का केंद्र बनाया है. आज ये पूरे PoK के नागरिक अधिकारों के संघर्ष का चेहरा बन चुका है.
  • जनसैलाब की ताकत: अपनी भौगोलिक बनावट के कारण यहां आसपास के गांवों, कस्बों और दूर-दराज के इलाकों से लोगों का जुटना बहुत आसान है. मुजफ्फराबाद तक के लोग अपनी 38 सूत्रीय मांगों को लेकर यहीं हुंकार भर रहे हैं.

पाकिस्तानी सेना की बर्बरता और ड्रोन हमलों के खूनी निशान

पाकिस्तान की फौज और उसकी खुफिया एजेंसियां हमेशा से ये झूठ बोलती आई हैं कि वो अपने नागरिकों की रक्षक हैं. लेकिन रावलकोट के डी-चौक ने इस झूठे नकाब को पूरी तरह नोंचकर फेंक दिया है. जब यहां की जनता ने अपनी बुनियादी हक की मांग की, तो पाकिस्तानी हुकूमत ने बातचीत करने के बजाय गोलियों और बंदूकों का सहारा लिया.

निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई गईं. यहां तक कि क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए रिहायशी इलाकों और निजी घरों को निशाना बनाकर ड्रोन से हमले किए गए. इस खूनी खेल में कई बेगुनाह नागरिकों की मौत हो गई और दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल हो गए. लेकिन हैरानी की बात ये है कि इन हमलों और खून-खराबे के बावजूद जनता डी-चौक से टस से मस नहीं हुई. गोलियों का डर अब लोगों के दिलों से पूरी तरह खत्म हो चुका है, और यही बात पाकिस्तानी सेना को सबसे ज्यादा डरा रही है.

मुजफ्फराबाद तक फैली आग और छात्रों का दहाड़

ये बगावत अब सिर्फ रावलकोट तक सीमित नहीं रही है. आग की तरह फैलते हुए इस जन-आंदोलन ने PoK की राजधानी मुजफ्फराबाद को भी अपनी चपेट में ले लिया है. अब इस लड़ाई में यूनिवर्सिटी के छात्र भी कूद पड़े हैं.

चेहला यूनिवर्सिटी और जामिया कश्मीर मुजफ्फराबाद के छात्र सड़कों पर उतर आए हैं. उन्होंने साफ कर दिया है कि वो अपने नागरिकों पर हुए अत्याचार को चुपचाप सहन नहीं करेंगे. छात्रों ने JAAC के साथ मिलकर एक मजबूत मोर्चा बना लिया है और मांग की है कि सेना तुरंत अपनी खूनी कार्रवाई बंद करे और जनता के सभी अधिकारों को बहाल करे. जब किसी देश के छात्र और युवा सड़क पर उतर आते हैं, तो सत्ता का सिंहासन हिलना तय माना जाता है.

क्यों सुलग रहा है PoK? क्या हैं जनता की मांगें?

इस पूरे तूफान के पीछे पाकिस्तानी सरकार की दशकों पुरानी वादाखिलाफी और शोषण है. PoK के लोग बुनियादी आर्थिक अधिकारों, सही राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अपने ही क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों पर हक की मांग कर रहे हैं.

JAAC का 38-सूत्रीय चार्टर उन बुनियादी जरूरतों से जुड़ा है, जिन्हें पाकिस्तान की हुकूमत ने हमेशा छीना है. भारी-भरकम बिजली बिल, सब्सिडी वाले गेहूं की कटौती और महंगाई ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है. जब भी जनता ने अपनी रोजी-रोटी के लिए आवाज उठाई, पाकिस्तान की सेना ने टैंकों और बंदूकों से उन्हें कुचलने की कोशिश की. लेकिन इस बार का गुस्सा अलग है, ये अब थमने वाला नहीं है.

भारत बॉर्डर के पास सुलगता लावा: क्या होने वाला है कुछ बड़ा?

रावलकोट की भौगोलिक स्थिति बहुत संवोदनशील है. ये भारत की सीमा और नियंत्रण रेखा (LoC) के बेहद करीब है, नई दिल्ली से इसकी दूरी महज 600-700 किलोमीटर है. भारत के उत्तर-पश्चिम सीमावर्ती राज्य इसके बिल्कुल पास हैं.

ऐसे में, जब भारत के ठीक बाजू में पाकिस्तान के कब्जे वाले हिस्से में इस तरह का भीषण गृह-युद्ध जैसे हालात बन जाएं, तो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हलचल होना लाजिमी है. पाकिस्तान की फौज अंदर से पूरी तरह खोखली हो चुकी है. देश पहले ही आर्थिक बदहाली और दिवालियापन के दौर से गुजर रहा है, और ऊपर से ये आंतरिक विद्रोह ने शहबाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर की रातों की नींद उड़ा दी है.

रावलकोट में तय होगी पापों की सजा?

रावलकोट का डी-चौक आज इस बात का गवाह बन चुका है कि जुल्म के दम पर ज्यादा दिनों तक हुकूमत नहीं चलाई जा सकती. पाकिस्तान ने जितने पाप PoK की मासूम जनता पर किए हैं, उनके सबूत इस चौक की हर एक ईंट पर दर्ज हो चुके हैं. जिस तरह से छात्र, बुजुर्ग और आम नागरिक गोलियों की परवाह किए बिना सड़कों पर डटे हैं, उससे ये साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में यहां कुछ बहुत बड़ा राजनीतिक या भू-राजनीतिक बदलाव देखने को मिल सकता है. पाकिस्तान का ये अवैध कब्जा अब उसकी अपनी ही कब्र खोद रहा है, और दुनिया खामोशी से इस तमाशे को देख रही है.



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