Trump Israel Aid Cut : ‘इजरायल को 4 अरब डॉलर की मदद बंद कर देगा अमेरिका’, दोस्त नेतन्याहू को डोनाल्ड ट्रंप का धोखा या कुछ और?

Trump Israel Aid Cut : ‘इजरायल को 4 अरब डॉलर की मदद बंद कर देगा अमेरिका’, दोस्त नेतन्याहू को डोनाल्ड ट्रंप का धोखा या कुछ और?


अमेरिका में मिडटर्म चुनाव के बेहद गर्म माहौल और इजरायल में जारी राजनीतिक हलचलों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसा धमाका किया है, जिसने जियोपॉलिटिकल समीकरणों को हिलाकर रख दिया है. ट्रंप ने ऐलान किया है कि अमेरिका 2026 के अंत तक इजरायल को हर साल दी जाने वाली 4 अरब डॉलर यानी लगभग 33 हजार करोड़ रुपए की नियमित सालाना वित्तीय मदद को पूरी तरह से बंद कर देगा. अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या ट्रंप, अपने खास दोस्त और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और इजरायल को धोखा देने वाले हैं? उन्होंने इसका जवाब भी खुद ही बता दिया है.

डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच क्या हुई डील?

ट्रंप का दावा है कि इस बड़े कदम को लेकर उनकी और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच महीनों पहले ही एक गुप्त डील हो चुकी थी. आसमान छूती जियोपॉलिटिकल उथल-पुथल के बीच ट्रंप के इस नए बयान का आखिर क्या मतलब है?

मंगलवार को ‘फॉक्स न्यूज’ के मशहूर शो ‘फॉक्स एंड फ्रेंड्स’ पर बातचीत करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने इस बात की पुष्टि की. ट्रंप ने कहा कि अमेरिका फिलहाल इजरायल को हर साल 4 अरब डॉलर की मदद देता आ रहा है, लेकिन इस साल के अंत के बाद ये व्यवस्था खत्म कर दी जाएगी.

अपनी बात रखते हुए ट्रंप ने कहा ‘जहां तक इजरायल को भुगतान करने की बात है, तो बीबी और मैंने एक समझौता किया है. हम इजरायल को हर साल 4 अरब डॉलर देते हैं, और महीनों पहले हमने तय कर लिया था कि अब हम इसे रोकने जा रहे हैं. हमने पहले ही सहमति बना ली है कि इस साल के अंत तक हम इजरायल को ये रकम नहीं देंगे. हालांकि, अगर इजरायल को आगे कभी जरूरत पड़ी, तो हम उनकी मदद जरूर करेंगे’.

ट्रंप ने इजरायल की तारीफ करते हुए उसे एक बेहद मजबूत सहयोगी बताया. उन्होंने ये भी संकेत दिया कि इजरायल की अर्थव्यवस्था और रक्षा तंत्र अब इतने ताकतवर हो चुके हैं कि उसे वाशिंगटन से लगातार सालाना खैरात या मदद की जरूरत नहीं है.

क्या वाकई खत्म हो जाएगी इजरायल को अमेरिकी मदद?

ट्रंप के इस बयान के बाद ये सवाल उठना स्वाभाविक था कि क्या अमेरिका इजरायल को उसके हाल पर छोड़ रहा है? लेकिन बयान का बारीक विश्लेषण करें, तो ट्रंप ने नियमित सालाना किश्तों पर रोक लगाने की बात कही है, न कि संकट के समय दी जाने वाली सैन्य मदद से पूरी तरह पीछे हटने की.

  1. हथियार खरीद जारी रहेगी: ट्रंप ने इशारा दिया कि भले ही 4 अरब डॉलर की फ्री सालाना वित्तीय मदद बंद हो जाए, लेकिन इजरायल अमेरिका से आधुनिक हथियार, डिफ़ेंस सिस्टम और सैन्य साजो-सामान खरीदना जारी रख सकता है.
  2. जरूरत पर तुरंत बैकअप: ट्रंप ने साफ किया कि अगर इजरायल पर कोई बड़ा खतरा आता है या उसे तत्काल मदद की जरूरत पड़ती है तो अमेरिकी प्रशासन कदम पीछे नहीं खींचेगा.
  3. सहायता का बदलता ढांचा: इसका सीधा सा मतलब है कि अमेरिका अब इजरायल को एक ‘मुफ्त सहायता पाने वाले देश’ की बजाय एक आत्मनिर्भर रक्षा साझेदार के रूप में देखना चाहता है.

समय का चुनाव: मिडटर्म चुनाव और इजरायल की अंदरूनी राजनीति

  • अमेरिका में मिडटर्म चुनाव: ट्रंप का ये फैसला उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ एजेंडे के बिल्कुल फिट बैठता है. अमेरिकी करदाताओं के पैसों को विदेशों में भेजने के बजाय अपने देश में खर्च करने की बात कहकर ट्रंप अपने कोर वोटर बेस को लुभाना चाहते हैं.
  • इजरायल में संसदीय गतिरोध: इजरायल इस समय खुद राजनीतिक उथल-पुथल और संसदीय गतिरोध से जूझ रहा है. ऐसे में ट्रंप के इस दावे पर इजराइली पीएम नेतन्याहू और उनकी सरकार पर घरेलू दबाव बढ़ सकता है.

ट्रंप के फैसले को अमलीजामा पहनाना कितना मुश्किल?

भले ही ट्रंप नेतन्याहू के साथ महीनों पुरानी ‘डील’ का दावा कर रहे हों, लेकिन इस फैसले को धरातल पर उतारना इतना आसान नहीं होगा.

  • संसदीय प्रक्रिया: अमेरिका में इजरायल को दी जाने वाली सैन्य और वित्तीय सहायता लंबे समय से चले आ रहे समझौतों और अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित कानूनों के तहत तय होती है.
  • विपक्ष और लॉबी का दबाव: अमेरिकी कांग्रेस में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स दोनों ही दलों के कई बड़े नेता इजरायल को बिना शर्त मदद देने के समर्थक रहे हैं. ऐसे में सालाना फंड रोकने के लिए औपचारिक कागजी प्रक्रिया और विधायी मंजूरी की आवश्यकता होगी, जो आसान नहीं रहने वाली.

2026 के अंत तक 4 अरब डॉलर की सालाना मदद को रोकने का ये कदम पश्चिम एशिया के पूरे सुरक्षा समीकरण को नया मोड़ दे सकता है. जहां एक तरफ ट्रंप इसे इजराइल की आत्मनिर्भरता और अमेरिकी पैसों की बचत के रूप में पेश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ये देखना दिलचस्प होगा कि नेतन्याहू सरकार इस पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देती है और अमेरिकी संसद इस फैसले को किस रूप में स्वीकार करती है?



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