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राजस्थान निकाय चुनाव 2026 : राजस्थान निकाय चुनाव के फाइनल चरण में कांग्रेस बीजेपी से बुरी तरह से पिछड़ गई. महज एक फीसदी से कम वोट शेयर के अंतराल से हारी कांग्रेस निकाय प्रमुखों के चुनाव में बीजेपी के फ्लोर मैनेजमेंट के सामने बेहद कमजोर साबित हुई. कांग्रेस निर्दलीयों को तो साध नहीं पाई और कई जगह अपने पार्षदों को भी पूरी तरह से नहीं संभाल पाई. इसका नतीजा यह हुआ के सूबे के 309 निकायों में से दो तिहाई में बीजेपी ने अपने बोर्ड बना लिए. जानें क्या रहे इसके पीछे कारण.
कांग्रेस नेताओें का आरोप है कि बीजेपी ने सत्ता का दुुरुपयोग कर जनादेश का अपमान किया है.
जयपुर. राजस्थान में कांग्रेस ने निकाय और पंचायत चुनाव से पहले ग्रासरूट पर पार्टी को मजबूत करने के लिए ‘संगठन सृजन’ अभियान चलाया था. इसमें संगठन में बॉटम टू टॉप मजबूत करने के दावे किए गए थे. लेकिन निकाय प्रमुख चुनाव में इसका कोई असर नजर नहीं आया. हालात यह रहे कि कांग्रेस नौ जिलों में अपना खाता तक नहीं खोल पाई और 6 जिलों में उसके हाथ केवल एक-एक निकाय आया. निकाय चुनाव के तहत पहले पार्षदों के चुनाव तक मजबूत दिख रही कांग्रेस निकाय प्रमुख का चुनाव आते-आते बिखरी-बिखरी हुई सी नजर आने लग गई. राजनीतिक विश्लेषक इसके एक नहीं बल्कि कई कारण गिना रहे हैं.
कांग्रेस को आधा दर्जन जिलों में एक-एक निकाय मिला
इन नौ जिले के अलावा आधा दर्जन जिले ऐसे हैं जिनमें उसे आंशिक सफलता ही मिल पाई. इनमें अजमेर, बांसवाड़ा, जैसलमेर, जालोर, प्रतापगढ़ और सिरोही शामिल है. इन 6 जिलों में कांग्रेस केवल एक-एक बोर्ड पर सिमट कर रह गई. कांग्रेस भी निकाय प्रमुखों के चुनाव के आए नतीजों से हैरान है. कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी ने सत्ता का दुरुपयोग कर निकाय छीने है. बीजेपी ने जनादेश का अपमान किया है. राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, नेता प्रतिपक्ष टीकराम जूली और पूर्व सीएम अशोक गहलोत समेत कांग्रेस के तमाम नेता बीजेपी और भजनलाल सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने जनमत का अपमान किया है.
संगठनात्मक गुटबाजी और असंतोष
दूसरी तरफ राजनीतिक विश्लेषकों का मनाना है कि कांग्रेस की इस हार के पीछे एक नहीं बल्कि कई कारण है. सबसे बड़ा कारण तो कांग्रेस का कमजोर फ्लोर मैनेजमेंट रहा. वह सटीक रणनीति बनाने से चूक गया. इसके कारण वह निर्दलीयों को साध नहीं पाया और अपने खुद के पार्षदों को टूट से नहीं बचा सका. इसके कारण उसे कई जगह मात खानी पड़ी. वहीं कांग्रेस संगठन में टिकट वितरण को लेकर उपजा दबा हुआ असंतोष निकाय प्रमुखों के चुनाव में उभर कर सतह पर आ गया. बगावत कर निकाय चुनाव जीते कई कार्यकर्ताओं ने कई कार्यकताओं ने ही स्थानीय नेताओं को सबक सिखाने के लिए पार्टी की नींव खोद डाली.
कमजोर फ्लोर मैनेजमेंट और बाड़ेबंदी
वहीं बीजपी की बाड़ाबंदी की रणनीति फुलफ्रूप रही. उसमें कहीं सेंधमारी नहीं हो सकी. बीजेपी ने ज्यादा से ज्यादा निकायों में अपना बोर्ड बनाने के लिए अपने तमाम बड़े नेताओं को उसमें झौंक दिया. जबकि कांग्रेस इस मामले में पीछे रही. पार्टी की गुटबाजी के चलते सभी नेता मन से एक साथ एक जाजम पर नहीं आ पाए. इससे संगठन सृजन का भी कोई बड़ा इम्पेक्ट सामने नहीं आया. इसका परिणाम पहले पार्षदों के चुनाव में ग्राउंड पर और बाद में निकाय चुनावों में फ्लोर मैनेजमेंट में सामने आया और कांग्रेस पूरी तरह से सफल नहीं हो पाई. वहीं बीजेपी सरकार की योजनाओं को भुनाने में काफी हद सफल रही और उसने इसका राजनीतिक फायदा भी उठाया.