बांग्लादेश की फैक्ट्रियों पर ताले, क्या भारत की कपड़ा इंडस्ट्री की लग गई लॉटरी

बांग्लादेश की फैक्ट्रियों पर ताले, क्या भारत की कपड़ा इंडस्ट्री की लग गई लॉटरी


बांग्लादेश में कपड़े बनाने वाली फैक्ट्रियों पर ताले लग रहे हैं. मजदूर सड़कों पर हैं. फैक्ट्रियों में काम रुक रहा है. इसका असर सिर्फ बांग्लादेश तक सीमित नहीं रहने वाला. अमेरिका और यूरोप के जिन बड़े ब्रांडों को समय पर कपड़े चाहिए, वे अब दूसरे देशों की तरफ देख सकते हैं. भारत भी इनमें से एक है.

2 नवंबर को मजदूरों के प्रदर्शन के चलते बांग्लादेश की करीब 679 से 690 फैक्ट्रियों में उत्पादन रुकने की खबर आई. इन फैक्ट्रियों में 40 लाख से ज्‍यादा कर्मचारी काम करते हैं. मजदूरों की ड‍िमांड है कि उनकी सैलरी 12500 टका से बढ़ाकर 30000 टका की जाए. सरकार ने वेतन बोर्ड बनाने का फैसला किया है, लेकिन विरोध अभी पूरी तरह थमा नहीं है.

बांग्‍लादेश सबसे सस्‍ता गारमेंट एक्‍सपोर्ट करने वाले देशों में से एक है. (Reuters)

बांग्लादेश की परेशानी भारत के लिए मौका कैसे?

मान लीजिए अमेरिका की किसी कंपनी ने बांग्लादेश की एक फैक्ट्री को 5 लाख टी-शर्ट बनाने का ऑर्डर दिया. कंपनी को ये टी-शर्ट एक तय तारीख तक चाहिए. लेकिन मजदूरों के प्रदर्शन के कारण फैक्ट्री में काम रुक गया. अब खरीदार के सामने परेशानी है. उसे तय समय पर माल चाहिए. वह महीनों इंतजार नहीं कर सकता. ऐसे में वह दूसरे देश की फैक्ट्री से संपर्क करेगा. भारत, वियतनाम, पाकिस्तान और कंबोडिया उसके विकल्प हो सकते हैं.

यहीं भारत के लिए मौका बनता है.भारत में पहले से कपड़ा बनाने वाली हजारों फैक्ट्रियां हैं. यहां कपास से धागा, धागे से कपड़ा और कपड़े से तैयार शर्ट, टी-शर्ट और पैंट बनाने तक का पूरा इंतजाम है. बांग्लादेश के गारमेंट उद्योग की एक और चिंता है. वहां पिछले तीन साल में 402 से ज्यादा फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं. संसद में सितंबर 2026 में दी गई जानकारी के मुताबिक, जुलाई 2023 से जून 2026 के बीच 282 BGMEA और 120 BKMEA सदस्य फैक्ट्रियां बंद हुईं. यानी परेशानी केवल दो-चार दिन के मजदूर आंदोलन की नहीं है. महंगी बिजली, गैस, बैंक का ब्याज, ऑर्डर की कमी और राजनीतिक अस्थिरता ने भी वहां के कारोबार को कमजोर किया है.

नोएडा से त‍िरुपुर को फायदा

तिरुपुर: टी-शर्ट और निटवेयर का हब

भारत में अगर किसी शहर को बांग्लादेश की परेशानी से सबसे ज्यादा फायदा मिलने की उम्मीद है तो उसमें तमिलनाडु का तिरुपुर है. तिरुपुर को भारत का बड़ा टी-शर्ट और निटवेयर केंद्र कहा जाता है. यहां निटवेयर का मतलब ऐसे कपड़ों से है, जिन्हें धागों को बुनकर बनाया जाता है. टी-शर्ट, बनियान और बच्चों के कई कपड़े इसी तरीके से बनते हैं.

  • इस शहर की खासियत यह है कि यहां केवल सिलाई का काम नहीं होता. कपास से धागा बनाने, कपड़ा तैयार करने, रंगाई, सिलाई और पैकिंग तक का पूरा नेटवर्क है. कपड़ा मंत्रालय के मुताबिक, तिरुपुर जिले से 2025-26 में टेक्सटाइल, रेडीमेड गारमेंट और हस्तशिल्प का संयुक्त निर्यात 38,677 करोड़ रुपये रहा.
  • इसका मतलब है कि विदेशी खरीदारों के साथ यहां के कारोबारियों का पहले से संपर्क है. उन्हें शून्य से शुरुआत नहीं करनी पड़ेगी. सितंबर 2024 में भी बांग्लादेश की राजनीतिक परेशानी के दौरान तिरुपुर के कारोबारियों को अतिरिक्त विदेशी ऑर्डर मिले थे. यानी पहले भी ऐसा हो चुका है.

नोएडा: विदेशी ब्रांडों के लिए दूसरा बड़ा ठिकाना

उत्तर प्रदेश का नोएडा भी इस मौके को भुना सकता है. यहां कई ऐसी फैक्ट्रियां हैं, जो विदेशी कंपनियों के लिए कपड़े बनाती हैं. शर्ट, पैंट, महिलाओं के कपड़े और बच्चों के परिधान यहां तैयार होते हैं. कई कंपनियां अंतरराष्ट्रीय फैशन ब्रांडों के लिए काम करती हैं.

  • कपड़ा मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, गौतम बुद्ध नगर जिले से 2025-26 में टेक्सटाइल, रेडीमेड गारमेंट और हस्तशिल्प का संयुक्त निर्यात 21,095 करोड़ रुपये रहा. लेकिन नोएडा के सामने एक चुनौती भी है.
  • एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका से ऑर्डर घटने के कारण वहां चालू अपैरल यूनिटों की संख्या छह महीने में 2,400 से घटकर 1,800 रह गई. अब अगर बांग्लादेश के खरीदार नोएडा पहुंचते हैं तो यहां की फैक्ट्रियों को नए ऑर्डर मिल सकते हैं. लेकिन उन्हें कीमत और समय पर डिलीवरी की शर्त पूरी करनी होगी.

सूरत और लुधियाना को भी मिलेगा मौका

गुजरात का सूरत कपड़ा बनाने के लिए मशहूर है. यहां पॉलिएस्टर और दूसरे सिंथेटिक कपड़े बड़े पैमाने पर तैयार होते हैं. बांग्लादेश की फैक्ट्रियों में केवल सूती कपड़े नहीं बनते. वहां सिंथेटिक और मिक्स फैब्रिक से भी कपड़े तैयार किए जाते हैं. ऐसे में सूरत के कारोबारियों के लिए भी अवसर है.

  • सूरत की ताकत कपड़ा और फैब्रिक बनाने में ज्यादा है. बड़े विदेशी गारमेंट ऑर्डर लेने के लिए उसे सिलाई और तैयार कपड़ों की सप्लाई का नेटवर्क भी मजबूत करना होगा.
  • दूसरी तरफ पंजाब का लुधियाना होजरी और स्वेटर के लिए जाना जाता है. यहां ऊनी कपड़े, ट्रैकसूट और निटवेयर बनाए जाते हैं. सर्दियों के कपड़ों के ऑर्डर में इस शहर को फायदा मिल सकता है.

बेंगलुरु भी क्यों है दौड़ में?

बेंगलुरु केवल आईटी कंपनियों का शहर नहीं है. यहां गारमेंट बनाने और निर्यात करने वाली बड़ी कंपनियां भी हैं. महिलाओं के कपड़े, शर्ट, पैंट और फैशन से जुड़े दूसरे परिधान यहां तैयार होते हैं. कपड़ा मंत्रालय के मुताबिक, बेंगलुरु अर्बन जिले से 2025-26 में टेक्सटाइल, रेडीमेड गारमेंट और हस्तशिल्प का संयुक्त निर्यात 16,205 करोड़ रुपये रहा. इसलिए अगर विदेशी ब्रांड बांग्लादेश के बजाय दूसरे देशों में ऑर्डर बांटते हैं तो बेंगलुरु भी उनके लिए एक विकल्प बन सकता है.

भारत को कॉटन के कारोबार में भी फायदा या नुकसान?

एक और बात. भारत बांग्लादेश को केवल तैयार कपड़ों के कारोबार में चुनौती नहीं देता. भारत वहां कपास, धागा और कपड़ा भी भेजता है. बांग्लादेश की फैक्ट्रियों को कपड़े बनाने के लिए कच्चे माल की जरूरत होती है. भारत इस जरूरत को पूरा करने वाले प्रमुख सप्लायरों में है.

  • अब अगर बांग्लादेश की फैक्ट्रियों में उत्पादन घटता है तो वहां भारतीय कपास और धागे की मांग भी घट सकती है. इससे भारत के उन कारोबारियों को नुकसान हो सकता है, जो बांग्लादेश को कच्चा माल बेचते हैं. लेकिन दूसरी तरफ भारत में ही तैयार कपड़ों के ऑर्डर बढ़ते हैं तो यहां कपास, धागे और फैब्रिक की मांग बढ़ सकती है.

असली मुकाबला अमेरिका और यूरोप में होगा

भारत और बांग्लादेश की असली लड़ाई अमेरिका और यूरोप के बाजारों में है. भारत के अपैरल एक्‍स्‍पोर्ट में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 30.52 फीसदी और यूरोपीय यूनियन की हिस्सेदारी 29.47 फीसदी है. ब्रिटेन भी भारत के लिए बड़ा बाजार है. अब इन बाजारों में बांग्लादेश की फैक्ट्रियों से माल मिलने में देरी होती है तो भारतीय कंपनियों को फायदा हो सकता है.

विदेशी कंपनियां केवल इसलिए भारत को ऑर्डर नहीं देंगी कि बांग्लादेश में हड़ताल हो रही है. वे यह भी देखेंगी कि भारत में कपड़ा कितने रुपये में बन रहा है और कितने दिन में तैयार होकर उनके पास पहुंचेगा. अगर भारत में कपड़ा महंगा बनता है या डिलीवरी में देरी होती है तो खरीदार वियतनाम, कंबोडिया और दूसरे देशों का रुख कर सकते हैं.



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