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Pakistani PM on Terrorists: पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने जो बयान दिया है, वो उनके देश के उस सच को उजागर कर दिया है, जो भारत काफी सालों से कहता रहा है. खुद शहबाज ने माना है कि पाकिस्तान के खास इलाके में आतंकियों का डेरा है, हालांकि वो इसके लिए खुद को जिम्मेदार नहीं मान रहे हैं.
शहबाज शरीफ.
पाकिस्तान लंबे समय से आतंकवाद और आतंकी संगठनों को पनाह देने के आरोपों का सामना करता रहा है. अब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के एक बयान ने इस मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है. उन्होंने खुद स्वीकार किया है कि 2019 और 2020 के दौरान अफगानिस्तान से आतंकियों को वापस लाकर पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में बसाया गया था. शहबाज के इस बयान से पाकिस्तान की आतंकवाद विरोधी नीति और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.
हालांकि प्रधानमंत्री ने इस फैसले की जिम्मेदारी पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की सरकार पर डाल दी है. उनका कहना है कि आतंकियों की वापसी और उन्हें दोबारा बसाने के बाद पाकिस्तान में आतंकवादी गतिविधियां फिर बढ़ने लगीं. इससे देश को जान-माल का भारी नुकसान उठाना पड़ा. इस बयान का सबसे अहम पहलू यह है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री खुद अपने देश में आतंकियों की वापसी और उनके पुनर्वास की बात स्वीकार कर रहे हैं. हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि कितने आतंकियों को वापस लाया गया था, उन्हें किसकी मंजूरी मिली थी और इस पूरी प्रक्रिया में सेना या खुफिया एजेंसियों की क्या भूमिका थी.
आतंकियों को वापस लाकर बसाने की बात क्यों कही?
शहबाज शरीफ ने 31 अक्टूबर को पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) के खैबर पख्तूनख्वा के सांसदों और पार्टी पदाधिकारियों की बैठक को संबोधित करते हुए यह बयान दिया. उन्होंने कहा कि नवाज शरीफ के शासनकाल में सामूहिक प्रयासों से आतंकवाद पर काफी हद तक काबू पा लिया गया था. साल 2017-18 तक देश की सुरक्षा स्थिति में सुधार हुआ था, लेकिन 2019 और 2020 में अफगानिस्तान से आतंकियों को वापस लाकर बसाने के बाद हालात फिर बिगड़ने लगे.
खैबर पख्तूनख्वा में आतंकियों का अड्डा. (सांकेतिक तस्वीर)
इमरान खान की सरकार पर फोड़ा ठीकरा
शहबाज शरीफ ने आतंकियों की वापसी के लिए इमरान खान की तत्कालीन सरकार को जिम्मेदार ठहराया. उनका आरोप है कि पिछली सरकार के फैसले के कारण आतंकवाद को दोबारा पैर जमाने का मौका मिला लेकिन इस मामले में कई सवाल अब भी वैसे ही हैं. अगर आतंकियों की वापसी का फैसला लिया गया था तो क्या सुरक्षा एजेंसियों को इसकी जानकारी थी? क्या सेना और खुफिया तंत्र की सहमति भी इसमें शामिल थी? पाकिस्तान की राजनीति में सेना का प्रभाव काफी अहम माना जाता है. ऐसे में आतंकियों की वापसी जैसे संवेदनशील मामले में केवल तत्कालीन निर्वाचित सरकार को जिम्मेदार ठहराना भी कई सवाल खड़े करता है.
800 अरब रुपये फूंककर भी सुरक्षा व्यवस्था कमजोर?
शहबाज शरीफ ने खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवाद से निपटने के लिए खर्च किए गए पैसों पर भी सवाल उठाए. उन्होंने बताया कि 2010 के राष्ट्रीय वित्त आयोग (NFC) पुरस्कार के तहत प्रांत को अतिरिक्त एक प्रतिशत वित्तीय हिस्सा दिया गया था. उनके मुताबिक, इस व्यवस्था के तहत अब तक करीब 800 अरब पाकिस्तानी रुपये दिए जा चुके हैं. उन्होंने सवाल किया कि इतनी बड़ी रकम मिलने के बावजूद कितने सेफ सिटी प्रोजेक्ट शुरू हुए? आतंकवाद निरोधक विभाग (CTD) को कितना मजबूत किया गया? पुलिस को आधुनिक हथियार और बेहतर प्रशिक्षण देने के लिए क्या कदम उठाए गए? शहबाज ने पुलिस में हजारों पद खाली रहने पर भी नाराजगी जताई.
शहबाज शरीफ ने खोल दी पाकिस्तान की पोल.
पाकिस्तान ने आतंकवाद की कीमत जान देकर चुकाई
शहबाज शरीफ ने कहा कि पाकिस्तान ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में करीब 80 हजार लोगों को खोया है. इसके अलावा देश को 150 से 200 अरब डॉलर तक का आर्थिक नुकसान हुआ है. उन्होंने पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुए हमले का जिक्र करते हुए इसे देश के इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक बताया. उन्होंने खैबर पख्तूनख्वा के आम नागरिकों, पुलिसकर्मियों और सेना के जवानों के बलिदान को भी याद किया. उनका कहना था कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई पूरे देश की सामूहिक जिम्मेदारी है.
इमरान खान की पार्टी ने किया पलटवार
शहबाज के आरोपों पर पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने जवाब दिया है. पार्टी के केंद्रीय सूचना सचिव शेख वकास अकरम ने कहा कि प्रधानमंत्री को उनकी पार्टी के पास लोकतंत्र और शासन व्यवस्था पर उपदेश देने का नैतिक अधिकार नहीं है. पीटीआई ने दावा किया कि इमरान खान के शासनकाल में खैबर पख्तूनख्वा में शांति और स्थिरता बेहतर थी. पार्टी ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि उसने आतंकवाद से निपटने के लिए प्रांतीय प्रशासन को जरूरी संसाधन और उपकरण उपलब्ध नहीं कराए.