Dholpur News: राजस्थान की इस इमारत में छिपा है 123 साल पुराना इतिहास, 50 हजार रुपये से ऐसे बदली तस्वीर

Dholpur News: राजस्थान की इस इमारत में छिपा है 123 साल पुराना इतिहास, 50 हजार रुपये से ऐसे बदली तस्वीर


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Government College Dholpur History: धौलपुर में एक ऐसी ऐतिहासिक इमारत है, जहां कभी अंग्रेज अधिकारी रहते थे और आज विद्यार्थी अपने भविष्य की तैयारी करते हैं. करीब 123 साल पहले सफेद बलुआ पत्थरों से तैयार इस भवन में अंग्रेजों के पॉलिटिकल एजेंट का निवास था. इसकी सबसे खास बात कमरों में बने पुराने फायरप्लेस और दूसरी मंजिल के पुस्तकालय का लकड़ी का फर्श है. इतिहासकार अरविंद शर्मा बताते हैं कि रियासतकाल में पुस्तकालय वाले कमरे का इस्तेमाल अंग्रेज अधिकारी मनोरंजन के लिए करते थे. वर्ष 1961 में इसी भवन में सरकारी कॉलेज की स्थापना हुई. शुरुआत के लिए स्थानीय वकील आर.पी. मोदी ने लोगों के सहयोग से 50 हजार रुपये जुटाए थे. गोविंद राम शर्मा इसके पहले प्राचार्य बने. वर्ष 1967 में विज्ञान संकाय और 1980 में विधि महाविद्यालय की शुरुआत हुई. विद्यार्थियों की संख्या बढ़ने पर कभी परीक्षाओं के लिए टेंट लगाने पड़ते थे. आज यह भवन इतिहास और शिक्षा की अनूठी पहचान है.

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धौलपुर. सफेद बलुआ पत्थरों से बनी ऐतिहासिक इमारत… ऊंची छतें, मजबूत दीवारें और कमरों में बने फायरप्लेस. कभी यहां अंग्रेजी हुकूमत के अधिकारी रहा करते थे, लेकिन आज इसी इमारत में विद्यार्थी अपने सुनहरे भविष्य के सपने बुन रहे हैं. यह कहानी धौलपुर के राजकीय महाविद्यालय की है, जिसका इतिहास करीब 123 साल पुराना है. वर्ष 1903 में महाराजा राणा रामसिंह के शासनकाल में निर्मित यह भवन उस समय धौलपुर रियासत में तैनात अंग्रेजों के पॉलिटिकल एजेंट का सरकारी निवास हुआ करता था. वक्त बदला और इस इमारत की पहचान भी बदल गई. अंग्रेज अधिकारियों के निवास से शुरू हुआ इसका सफर आज शिक्षा के प्रमुख केंद्र तक पहुंच चुका है.

इतिहासकार अरविंद शर्मा  बताते हैं कि जिला मुख्यालय स्थित इस भवन की वास्तुकला आज भी ब्रिटिश दौर की याद दिलाती है. कमरों में बने फायरप्लेस इसकी खास पहचान हैं. सर्दियों में इनका इस्तेमाल कमरों को गर्म रखने के लिए किया जाता था. वहीं, दूसरी मंजिल पर स्थित पुस्तकालय का लकड़ी का फर्श आज भी अपने पुराने स्वरूप में मौजूद है. बताया जाता है कि रियासतकाल में इस कमरे का इस्तेमाल अंग्रेज अधिकारी मनोरंजन के लिए करते थे.

50 हजार रुपये जुटाकर शुरू हुआ था कॉलेज

धौलपुर में उच्च शिक्षा की शुरुआत भी इसी ऐतिहासिक भवन से हुई. वर्ष 1961 में यहां पहले सरकारी महाविद्यालय की स्थापना हुई. उस समय नया कॉलेज शुरू करने के लिए 50 हजार रुपये की आवश्यकता थी. ऐसे में धौलपुर के वकील आर.पी. मोदी ने जनसहयोग से 50 हजार रुपये एकत्रित किए और तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया को सौंपे. इसके बाद महाविद्यालय की शुरुआत हुई. गोविंद राम शर्मा कॉलेज के पहले प्राचार्य बने. वर्ष 1967 में यहां विज्ञान संकाय की पढ़ाई भी शुरू हो गई.

44 विद्यार्थियों से शुरू हुआ था सफर

इतिहासकार अरविंद शर्मा बताते हैं कि वह स्वयं वर्ष 1983 में इसी महाविद्यालय के विद्यार्थी रहे हैं. उनके पिता श्याम स्वरूप शर्मा भी यहां प्रोफेसर थे. वर्ष 1980 में इसी ऐतिहासिक परिसर में विधि महाविद्यालय की स्थापना हुई. शुरुआती दौर में यहां महज 44 विद्यार्थी अध्ययन करते थे, लेकिन समय के साथ विद्यार्थियों की संख्या तेजी से बढ़ी. हालात ऐसे हो गए कि परीक्षाओं के दौरान विद्यार्थियों को बैठाने के लिए परिसर में टेंट तक लगाने पड़ते थे.

अंग्रेजों के निवास से शिक्षा के मंदिर तक का तय किया सफर

आज राजकीय महाविद्यालय धौलपुर जिले में नोडल कॉलेज के रूप में उच्च शिक्षा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहा है. करीब 123 साल पुरानी यह इमारत समय के थपेड़ों के बावजूद अपनी ऐतिहासिक पहचान और मजबूती को कायम रखे हुए है. कभी जिस भवन में अंग्रेज अधिकारी धौलपुर रियासत का प्रशासनिक कामकाज देखते और अपना जीवन बिताते थे, आज उसी परिसर में विद्यार्थी अपने भविष्य की नींव रख रहे हैं. यह इमारत केवल पत्थरों से बना भवन नहीं, बल्कि धौलपुर के इतिहास, विरासत और शिक्षा के बदलते सफर की जीवंत कहानी है.



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