राजस्थान के रावतभाटा न्यूक्लियर प्लांट में फ्यूल लोडिंग, कब तक बनेगी बिजली?
Agency:एजेंसियां
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न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड NPCIL ने राजस्थान के रावतभाटा न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट RAPP में शुरुआती फ्यूल लोडिंग शुरू कर दी है. यह 700 मेगावाट का भारत का चौथा परमाणु रिएक्टर है. जो भारत के महत्वाकांक्षी 16 न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट मिशन का हिस्सा है.
राजस्थान के रावतभाटा न्यूक्लियर पावर प्लांट में फ्यूल लोडिंग का काम शुरू कर दिया गया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: pixabay)
राजस्थान के रावतभाटा न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट RAPP में शुरुआती फ्यूल लोडिंग IFL शुरू कर दी गई है. न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड NPCIL के मुताबिक 19 सितंबर को RAPP की यूनिट 8 में फ्यूल लोडिंग की गई. . यह 700 मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता रखने वाला प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर है. NPCIL को उम्मीद है कि इसी साल प्लांट से बिजली उत्पादन शुरू हो जाएगा.
किसी भी परमाणु रिएक्टर में फ्यूल लोडिंग के साथ ही बिजली उत्पादन शुरू नहीं होता. NPCIL के मुताबिक यह इनीशियन फ्यूल लोडिंग है. यानी प्लांट में पहली बार परमाणु ईंधन डाला गया है. अब रिएक्टर को धीरे धीरे ऐसी स्थिति तक लाया जाएगा जहां इसका चेन रिएक्शन शुरू होगा. न्यूक्लियर पावर कारपोरेशन के मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया में 6 से 8 महीने का वक्त लग सकता है. फ्यूल लोडिंग के लिए परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड AERB से पहले ही जरूरी अनुमति ले ली गई थी.
क्या होती है इनीशियल फ्यूल लोडिंग
इनीशियनल फ्यूल लोडिंग का मतलब फ्यूल लोडिंग की शुरुआत से होता है. इससे ये देखा जाता है कि फ्यूल के बाद ईंधन, रिएक्टर या दूसरे सिस्टम ठीक ढंग से काम कर रहे हैं. इसका सबसे बड़ा मकसद सुरक्षा जांच होता है. AERB के मुताबिक किसी भी पावर प्लांट को कमीशन होने यानी की प्रयोग में लाए जाने से पहले IFL को फेस-B का हिस्सा माना जाता है. इसके बाद प्री क्रिटिकल टेस्ट, लोअर पावर टेस्ट भी कमीशन होने से पहले किए जाते हैं. ये टेस्ट देखते हुए कि प्लांट में न्यूक्लियर चेन रिएक्शन कैसे होता है. कमीशन होने के बाद धीरे-धीरे बिजली उत्पादन बढ़ाया जाता है.
कैसे होती है फ्यूल लोडिंग
यह प्रक्रिया बेहद जटिल होती है, सामान्य बिजलीघर में कोयला या गैस डालने से बिलकुल अलग. इसमें प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर में फ्यूल चैनल लगाया जाता है. पहले जरूरी सिस्टम की जांच होती है. AERB के मुताबिक ऐसा करते समय आपात स्थिति के लिए भी तैयार रहा जाता है. अगर रिएक्टर निर्धारित सीमा से ज्यादा रिएक्ट करता है तो उसे सुरक्षित तरीके से बंद कर दिया जाता है.
कैसे कमीशन होता है परमाणु प्लांट?
फ्यूल लोडिंग के बाद ही किसी रिएक्टर के कमीशन की यात्रा शुरू होती है. इसके बाद कंट्रोल और रेगुलेशन सिस्टम की जांच होती है, रिएक्टर प्रोटेक्शन सिस्टम जाना जाता है. इसके ऑटोमैटिक और मैनुअल शटडाउन व्यवस्था देखी जाती है. जब प्लांट FAC यानी फर्स्ट एप्रोच टू क्रिटिकलिटी तक पहुंच जाए तब इसे कमीशन के लिए तैयार माना जाता है. यह वो प्रक्रिया है जिसमें ये देखा जाता है कि प्लांट में न्यूट्रॉन क्या इतने प्रभावी हो चुके हैं जो लगातार चलने वाला चेन रिएक्शन कायम रख सकें.
ऐसे बनती है बिजली
कमीशन की प्रक्रिया के दौरान पावर प्लांट को लॉ पावर पर चलाकर उसके व्यवहार का अध्ययन किया जाता है. वैज्ञानिक और इंजीनियर यह देखते हैं कि रिएक्टर सही से काम कर रहा है या नहीं. अगर प्लांट ठीक से काम करता है तो उसकी पावर बढाई जाती है. जब रिएक्टर में न्यूक्लियर चेन रिएक्शन शुरू होता है तो बहुत ज्यादा मात्रा में गर्मी पैदा होती है. इससे भाप बनाई जाती है. भाप की मदद से बड़े-बड़े टर्बाइन चलती हैं, जिनसे बिजली पैदा होती है. जब ये प्रक्रिया सामान्य हो जाती है तो इसे ग्रिड से जोड़ दिया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया से 8 से 9 माह का समय लग सकता है.
क्यों खास है RAPP-8
RAPP-8 700 मेगावाट का देश में चौथा रिएक्टर है. देश में ऐसे कुल 16 पवर प्लांट तैयार किए जा रहे हैं. इस सीरीज के पहले दो रिएक्टर गुजरात के काकरापार एटॉमिक पावर स्टेशन की यूनिक 3 और 4 में जो 2023-24 से काम कर रहे हैं. RAPP की यूनिट 7 पिछले साल अप्रैल में शुरू हो चुकी है. अब यूनिट-8 की बारी है. इसके बाद यही यूनिट 9 और यूनिट 10 का निर्माण होना है. इसके लिए जियो टेक्निकल जांच शुरू हो गई है. इस जांच में ये देखा जाता है कि मिट्टी पावर प्लांट की संरचना के लिए कितनी मजबूत है.