प्रयागराज: पातालपुरी मंदिर और अक्षयवट का पौराणिक रहस्य, जहां श्रीराम ने किया था राजा दशरथ का पहला पिंडदान

प्रयागराज: पातालपुरी मंदिर और अक्षयवट का पौराणिक रहस्य, जहां श्रीराम ने किया था राजा दशरथ का पहला पिंडदान


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प्रयागराज: पातालपुरी-अक्षयवट का रहस्य, जहां श्रीराम ने किया पहला पिंडदान

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Prayagraj News: प्रयागराज के ऐतिहासिक किले की दीवारों के भीतर एक ऐसा आध्यात्मिक रहस्य समाया है, जिसका अस्तित्व चारों युगों की गाथा कहता है. पातालपुरी मंदिर और अमर ‘अक्षयवट’ केवल आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति के उस अटूट विश्वास का प्रमाण हैं, जहां मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने स्वयं अपने पिता का पहला पिंडदान किया था. मार्कंडेय पुराण के आख्यानों से लेकर सातवीं सदी में आए चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांत तक, यह पावन धरा मोक्ष और अमरता की साक्षी रही है. आइए जानते हैं इस अलौकिक वटवृक्ष और भूमिगत पातालपुरी मंदिर का वह गौरवशाली इतिहास, जो आज भी लाखों श्रद्धालुओं के हृदय में श्रद्धा का दीप जलाए हुए है.

Prayagraj News: प्रयागराज के किले के भीतर स्थित पातालपुरी मंदिर और अक्षयवट का धार्मिक महत्व सदियों पुराना माना जाता है. यहां दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं के लिए अक्षयवट केवल एक बरगद का पेड़ नहीं, बल्कि आस्था और पौराणिक मान्यताओं का प्रतीक है. मान्यता है कि इस स्थान का संबंध सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग से है. मंदिर के पुजारियों के अनुसार, भगवान राम ने इसी अक्षयवट के नीचे अपने पिता राजा दशरथ का पहला पिंडदान किया था.

ह्वेनसांग का यात्रा वृत्तांत और देव आंगन की प्राचीन व्यवस्था
पातालपुरी मंदिर के उपप्रधान पुजारी मुकेश राज गोस्वामी बताते हैं कि इस मंदिर में चारों युगों से पूजा की परंपरा चली आ रही है. उन्होंने बताया कि प्राचीन समय में मंदिर का देव आंगन खुला हुआ था. चीनी यात्री ह्वेनसांग ने सातवीं शताब्दी में भारत यात्रा के दौरान इस स्थान का वर्णन किया था. उनके यात्रा विवरण में अक्षयवट और यहां से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं का उल्लेख मिलता है.

मोक्ष की कामना, कुएं का इतिहास और पातालपुरी नामकरण
मुकेश राज गोस्वामी के अनुसार, प्राचीन समय में कुछ लोग अक्षयवट और मंदिर परिसर से जुड़े स्थानों पर मोक्ष की कामना से अपनी जान दे देते थे. बाद में मुगल शासक अकबर के समय मंदिर परिसर में बदलाव किए गए. मान्यता के अनुसार, आंगन में स्थित कुएं को बंद कराया गया और खुले परिसर के ऊपर छत बनवाई गई. इसके बाद मंदिर को पातालपुरी के नाम से भी जाना जाने लगा.

अमर वटवृक्ष, भगवान विष्णु का वास और मनोकामना परिक्रमा
पुजारी वरुण गोस्वामी बताते हैं कि अक्षय का अर्थ है जिसका कभी क्षय या नाश न हो और वट का अर्थ बरगद होता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस वृक्ष पर भगवान विष्णु का वास है. उन्होंने बताया कि इसकी जड़ों और शाखाओं को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं. यहां आने वाले श्रद्धालु वृक्ष की परिक्रमा करते हैं और अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं.

मार्कंडेय पुराण की कथा और बाल रूप में श्रीहरि के दर्शन
वरुण गोस्वामी के अनुसार, अक्षयवट का संबंध भगवान राम, राजा दशरथ और पिंडदान की परंपरा से भी है. मान्यता है कि भगवान राम ने प्रयागराज में अपने पिता का पहला पिंडदान किया था. इसके बाद काशी और गया में पिंडदान किया गया. अक्षयवट के पत्ते पर भगवान विष्णु के बाल रूप में दर्शन देने की कथा भी प्रचलित है. इसका उल्लेख मार्कंडेय पुराण से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में किया जाता है.

माघ मेला और महाकुंभ में उमड़ता आस्था का जनसैलाब
पुजारी हरिशंकर गोस्वामी बताते हैं कि यहां आने वाले श्रद्धालु पूरी श्रद्धा के साथ दर्शन करते हैं और भगवान अक्षयवटनाथ से अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की प्रार्थना करते हैं. उनका कहना है कि श्रद्धालु अपनी आस्था के साथ यहां आते हैं और भगवान का आशीर्वाद लेकर जाते हैं. माघ मेला और कुंभ के दौरान यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है.

सनातन संस्कृति और ऐतिहासिक धरोहर का संगम
पातालपुरी मंदिर और अक्षयवट प्रयागराज की धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. यहां की मान्यताएं, प्राचीन कथाएं और पूजा की परंपराएं आज भी लोगों को इस स्थान से जोड़ती हैं. यही वजह है कि दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु यहां दर्शन कर इसकी धार्मिक महत्ता को महसूस करते हैं.



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