सीरिया के शिक्षा मंत्रालय का एक नया नियम इन दिनों चर्चा का विषय बना है. दरअसल मंत्रालय ने नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस साइंसेज और सीरियन यूनिवर्सिटी फॉर सिक्योरिटी साइंसेज में दाखिले को लेकर नए नियमों का ऐलान किया है. इनमें यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस साइंसेज के कुछ कोर्सों में सिर्फ पुरुषों को ही एडमिशन देना तय किया है, जबकि दूसरी यूनिवर्सिटी के सभी कोर्स पुरुषों के लिए ही हैं. सीरिया में महिलाएं इस नए नियम का विरोध कर रही हैं.
दरअसल सीरिया में नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस साइसेंज में दाखिले के लिए सीरिया की सेना में सेवा देना अनिवार्य है. वहीं यूनिवर्सिटी फोर सिक्योरिटी साइसेंज से ग्रेजुएशन करने वाले छात्रों को सुरक्षा बलों में 20 साल तक सेवा देने की प्रतिबद्धता जतानी पड़ती है. सीरिया शिक्षा मंत्रालय ने जो नियम जारी किए हैं, उनकी पीछे भी यही वजह मानी जा रही है. हालांकि महिलाओं का आरोप है कि ये नियम पूरी तरह से भेदभावपूर्ण है. उनके मुताबिक सिर्फ यही नहीं, सीरिया में ऐसे और भी फैसले लिए गए हैं जो ये दर्शाते हैं कि नई सरकार महिलाओं के अधिकारों का दमन कर रही है.
अन्य संस्थानों में प्रवेश पर भी भेदभाव के आरोप
DW की एक रिपोर्ट के मुताबिक मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने सरकार के इस फैसले की आलोचना की है. संगठन के मुताबिक ये नियम भेदभावपूर्ण है जो अंतरराष्ट्रीय कानूनी दायित्वों का उल्लंघन करता है. संगठन के मुताबिक सैन्य कॉलेजों में महिलाओं पर लगाई गई पाबंदी के अलावा, दाखिले के नए नियमों में भी चिंताजनक पहलू सामने आए हैं.
अलेप्पो के एक रेलवे संस्थान, रमेलान, होम्स, देर अल-जोर और बनियास में तेल एवं गैस प्रशिक्षण संस्थानों तथा इदलिब में रेडियो और टेलीविजन से जुड़े एक पाठ्यक्रम में भी महिला छात्रों पर प्रतिबंध लगाया गया है. ये फैसले ऐसे समय में आए हैं, जब महिलाओं पर अन्य प्रतिबंधों और सरकारी अधिकारियों की चिंताजनक टिप्पणियों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.
किताबों से हटा दिए गए खुले बाल वाली महिलाओं के चित्र
सीरिया में शिक्षा क्षेत्र में महिलाओं से भेदभाव के आरोप यूं ही नहीं लग रहे. दरअसल इसकी शुरुआत नए सत्र की किताबों से शुरू हुई थी. शिक्षा मंत्रालय ने पहले ही घोष्ज्ञणा की थी कि पूर्व तानाशाह बशर अल असद के कार्यकाल से जुड़े चित्रों और प्रतीकों को किताबों से हटाया जाएगा.
जब नए बदलाव वाली किताबें आईं तो पता चला कि उनमें खुले बालों वाली महिलाओं के चित्रों को हटा दिया गया या उनमें बदलाव करके महिलाओं को हिजाब पहने हुए दिखाया गया. एक किताब में बिना कपड़ों की एक प्रतिमा को टीशर्ट पहने हुए दिखाया गया है. जिस तस्वीरों में लड़के नाचते नजर आ रहे थे उसे भी हटा दिया गया है.
मिडिल ईस्ट के देशों में भेदभाव का सामना कर रहीं महिलाएं
मिडिल ईस्ट के कई देशों में महिलाओं को इसी तरह भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है. वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट की 2024 की एक स्टडी के मुताबिक मिडिल ईस्ट के कई देश ऐसे हैं जहां सैन्य कॉलेजों में महिलाओं को पढ़ने और सेना में सेवा देने की छूट है, लेकिन महिलाओं की भूमिकाएं अक्सर गैर लड़ाकू या प्रतीकात्म्क जिम्मेदारियों तक ही सीमित रहती है. सीरियन सेंटर फॉर डिफेंस एंड सिक्योरिटी स्टडीज के मुताबिक सीरिया में भी महिलाएं ऐतिहासिक रूप से सुरक्षा सेवा का हिस्सा रही हैं, लेकिन उनकी भूमिका सीमित ही रही है.
मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट की ओर से किए गए रिसर्च की प्रमुख दीना अराकजी के मुताबिक महिलाओं को सेना में शामिल होने की अनुमति देने से समाज में महिलाओं की उन भूमिकाओं के प्रति नजरिया बदल सकता है, जिन्हें पारंपरिक रूप से पुरुषों से जोड़कर देखा जाता रहा है. सीरियाई कार्यकर्ता राना अल-अश ने पेरिस स्थित संगठन सीरियन वुमेन्स पॉलिटिकल मूवमेंट के लिए लिखे एक लेख में कहा कि दाखिले पर प्रतिबंध युवा सीरियाई महिलाओं को यह संदेश देता है कि वे क्या कर सकती हैं और क्या नहीं.
अफगानिस्तान छोड़िए, ईरान-सऊदी भी पीछे नहीं
द डेली स्टार की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में अफगानिस्तान सबसे आगे हैं, जहां तालिबान की वापसी के बाद से महिलाओं की उच्च शिक्षा और काम करने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है. मगर सऊदी अरब और ईरान भी उससे पीछे नहीं हैं. ईरान में इस्लामी क्रांति के बाद से महिलाओं की सैन्य भूमिका बेहद सीमित है.
वे सेना में प्रशासनिक, चिकित्सा और सहायक भूमिकाओं में तो आ सकती हैं, लेकिन मुख्य सैन्य अकादमियों में अधिकारियों के रूप में प्रशिक्षण लेने या फ्रंटलाइन कॉम्बैट भूमिकाओं का हिस्सा बनने पर प्रतिबंध है. इसी तरह सऊदी अरब में महिलाएं सेना में एंट्री तो ले सकती हैं, मगर उन्हें गैर लड़ाकू गतिविधियों तक ही सीमित रखा गया है. अब के कई देशों में यही नियम है.