इजराइल में जैसे-जैसे काउंटिंग आखिरी पड़ाव पर पहुंच रही है, वैसे-वैसे नेतन्याहू की धड़कनें बढ़ती जा रही हैं. अब तक 75 प्रतिशत मतों की गिनती के बाद ये साफ हो गया है कि सरकार बनाने के लिए अरब पार्टियों की जरूरत पड़ेगी. हालांकि ये देखना दिलचस्प होगा कि यहूदी पार्टियां क्या ऐसा करेंगी? हालांकि इस चुनाव में अरब पार्टियों को मिल रही बड़ी जीत को देखते हुए सवाल ये है कि आखिर इजराइल में ये अरब हैं कौन जो इस बार इतनी बड़ी ताकत के तौर पर उभरे हैं.
बेंजामिन नेतन्याहू से इजराइल के पीएम की कुर्सी दूर जाती नजर आ रही है. अब तक वोटों की गिनती में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी के गठबंधन को 54 सीटें मिलते नजर आ रही हैं जो बहुमत के लिए जरूरी 61 से बहुत पीछे हैं, जबकि विपक्षी आइजेनकोट का गठबंधन भी 48 सीटों पर ही समिटता दिख रहा है. ऐसे में सबकी नजर इजराइल के चुनाव में तीसरी सबसे बड़ी शक्ति बनीं अरब पार्टियों पर हैं जो 18 से 19 सीटें जीतती नजर आ रही हैं. यानी सरकार चाहे कोई बनाए इस बार किंगमेकर तो अरब पार्टियां ही रहने वाली हैं.
इजराइल में कौन हैं ये अरब लोग ?
इजराइल में अरबों की संख्या अच्छी खासी है. असल में ये उन लोगों के वंशज हैं जो 1948 में अरब इजराइल युद्ध के बाद यहां रह गए थे. BBC की एक रिपोर्ट के मुताबिक जब इजराइल का गठन ब्रिटिश मैडेट ऑफ फलस्तीन से हुआ था उस समय यहां अरब लोगों की संख्या तकरीबन 12 लाख थी. अमेरिका के काउंसिल ऑनफ फॉरन रिलेशन के मुताबिक उस समय तकरीबन 7 लाख लोगों को देश से निष्कासित कर दिया गया था, जिसे अरब लोगों ने नकबा नाम दिया था. इसके बाद डेढ़ लाख लोग वहां रह गए थे जहां इजराइल बना. इससे से इजराइल के नागरिक बन गए. हालांकि यहूदी नागरिकों के उलट, 1966 तक इन अरब नागरिकों को सैन्य शासन के अधीन रखा गया.
इजराइल में अरब लोगों की आबादी 21 प्रतिशत
इजराइल अखबार येरुशलम पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान में इजराइल में अरबों की संख्या तकरीबन 21 प्रतिशत है, इनमें से 17 प्रतिशत के पास वोट देने का अधिकार हैं. दरअसल 1948 में भले ही इनकी संख्या डेढ़ लाख रह गई थी, लेकिन उसके एक साल बाद ही इजराइल ने पूर्वी येरुशलम तक विस्तार किया और वहां रहने वाले लाखों अरब लोगों को इजराइली नागरिकता की पेशकश की. तमाम ने इसे ठुकरा दिया, लेकिन एक बड़ी संख्या में लोगों ने इसे स्वीकार भी कर लिया. यही फिलिस्तनी क्षेत्र है, जहां रहने वाले अरब लोगों को इजराइल और फिलस्तीन दोनों अपनी जनसंख्या में गिनते हैं.
इजराइल में 20 लाख अरब
इजराइल में वर्तमान में अरबों की आबादी तकरीबन 20 लाख है. इनमें पूर्वी यरुशलम में रहने वाले लोगों को छोड़कर ज्यादातर इजराइल के नागरिक हैं. इनमें बहुसंख्यक सुन्नी मुसलमान हैं. इन लोगों का इतिहास, संस्कृति और पारिवारिक संबंध वेस्ट बैंक, गाजा फिलिस्तीनी अरबों के साथ-साथ जॉर्डन, लेबनान, सीरिया में रह रहे फिलिस्तीनी प्रवासियों से है. इसराइली सरकार के दस्तावेज में इन्हें अरब या इजराइली अरब कहा जाता है.
किन मुद्दों को लेकर मैदान में हैं अरब पार्टियां
अरब पार्टियां हमेशा वेस्ट बैंक और गाजा में सैन्य कब्जे का विरोध करती हैं. वे फिलिस्तीन के लिए टू स्टेट सॉल्यूशन की मांग का समर्थन करती हैं. इसके अलावा इजराइल के भीतर अरब नागरिकों के साथ होने वाले भेदभाव को दूर करने, नागरिक समानता और अल्पसंख्यक अधिकारों के खिलाफ बढ़ते अपराध को लेकर चुनाव मैदान में उतरी हैं.
क्या राष्ट्रवादी पार्टियां लेंगी अरब दलों का सहयोग
इजराइल की प्रमुख पार्टियां राष्ट्रवादी विचारधारा को मानती हैं. नेतन्याहू ने पहले ही अब पार्टियां के साथ सरकार बनाने से इनकार किया है. आइज़ेनकोट और विपक्ष के कई अन्य सहयोगियों ने भी चुनाव प्रचार के दौरान ऐसी व्यवस्था का विरोध किया था. हालांकि अब आइजेनकोट ने कुछ शर्तों के साथ समर्थन लेने के संकेत दिए हैं. हालांकि, इसके लिए चुनाव प्रचार के दौरान किए गए दूसरे बड़े वादों और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं में बदलाव करना पड़ सकता है. अगर गठबंधन को लेकर बातचीत पूरी तरह विफल हो जाती है, तो एक और चुनाव कराने की संभावना भी बनी रहेगी.
कैसे किंगमेकर बन सकती हैं अरब पार्टियां
अब तक वोटों की गिनती के बाद साफ हो चुका है कि अरब पार्टियां के बिना इस बार सरकार बनाना मुमकिन नहीं. ऐसे में मंसूर अब्बास की लीड वाली अब पार्टी राअम विपक्षी दल को सपोर्ट कर सरकार बनवा सकती है. 2021 में राअम नेफ्टाली बेनेट के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल हुई थी. इस गठबंधन ने शुरुआत में नेतन्याहू को सत्ता से हटाया था. हालांकि, चैनल 12 के अनुमान के मुताबिक, यहूदी विपक्ष की 52 सीटों और राअम की सात सीटों को मिलाकर कुल 59 सीटें ही होंगी. यानी राअम अकेले 61 सीटों का बहुमत दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं होगी. इसके लिए अन्य दलों का समर्थन या संसद में किसी दूसरे तरह की व्यवस्था जरूरी होगी.
अगर अरब पार्टी सरकार में शामिल न होना चाहिए तो वह बाहर से समर्थन देकर भी सरकार बना सकती है. दरअसल आइजेनकोट गठबंधन ने इस बात के संकेत दिए हैं कि वो बातचीत के आधार पर अरब पार्टी से समर्थन ले सकती है. हालांकि यह बातचीत और शर्तों पर निर्भर करेगा.