Success story, T K Radha Biography: गांव में बिजली तक नहीं थी, गणित में किया टॉप, फिर अमेरिका से आया बुलावा, कौन थीं टीके राधा?

Success story, T K Radha Biography: गांव में बिजली तक नहीं थी, गणित में किया टॉप, फिर अमेरिका से आया बुलावा, कौन थीं टीके राधा?


T K Radha Success Story: आज के दौर में जब किसी छात्र को देश के बड़े संस्थान या विदेश की किसी मशहूर यूनिवर्सिटी से बुलावा आता है तो उसकी उपलब्धि चर्चा का विषय बन जाती है लेकिन सोचिए करीब 60 साल पहले केरल के एक छोटे से गांव की लड़की को दुनिया के महान वैज्ञानिक जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने खुद पत्र लिखकर अमेरिका बुलाया था. यह कहानी है भारतीय वैज्ञानिक थय्यूर के. राधा (Thayyoor K. Radha) की, जिन्हें टी. के. राधा के नाम से जाना जाता है.

उनका जन्म 1938 में केरल के ऐसे गांव में हुआ था जहां बिजली जैसी बुनियादी सुविधा भी उपलब्ध नहीं थी. उस दौर में लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा हासिल करना आसान नहीं था. राधा ने गणित में सबसे ज्यादा अंक हासिल किए, लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए फिजिक्स को चुना. उन्होंने पार्टिकल फिजिक्स और क्वांटम थ्योरी जैसे कठिन विषयों पर रिसर्च की. उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर ओपेनहाइमर ने 1965 में उन्हें प्रिंसटन के प्रतिष्ठित इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडी में आने का निमंत्रण दिया. इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद उनकी कहानी लंबे समय तक गुमनाम रही.

1938 में केरल के एक छोटे से गांव में हुआ जन्म

टी. के. राधा का जन्म साल 1938 में केरल के थय्यूर गांव में हुआ था. उस समय देश में शिक्षा की सुविधाएं आज जैसी नहीं थीं. खासकर छोटे गांवों में रहने वाली लड़कियों के लिए स्कूल से आगे की पढ़ाई करना आसान नहीं था.राधा जिस गांव में पली-बढ़ीं, वहां बिजली की सुविधा भी नहीं थी. ऐसे माहौल में पढ़ाई करना और आगे चलकर वैज्ञानिक बनने का सपना देखना अपने आप में बड़ी चुनौती थी,लेकिन बचपन से ही राधा को पढ़ने-लिखने में दिलचस्पी थी.उनकी खास रुचि गणित और विज्ञान में थी. वह पढ़ाई में काफी तेज थीं और कठिन विषयों को समझने की क्षमता रखती थीं.परिवार और उस समय की सामाजिक परिस्थितियों के बीच उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी.आगे चलकर यही लगन उन्हें भारत से अमेरिका के बड़े वैज्ञानिक संस्थानों तक ले गई.

गणित में सबसे ज्यादा अंक आए, लेकिन फिजिक्स चुना

टाइम्‍स ऑफ इंडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक राधा पढ़ाई में शुरू से ही होशियार थीं. गणित उनका पसंदीदा विषय था और उन्होंने इसमें अपनी कक्षा में सबसे ज्यादा अंक हासिल किए थे.ऐसे में उनके सामने गणित में आगे बढ़ने का रास्ता खुला था लेकिन उन्होंने गणित के बजाय फिजिक्स में अपना करियर बनाने का फैसला किया.उनकी रुचि केवल किताबों में दिए गए सवाल हल करने तक सीमित नहीं थी. वह यह समझना चाहती थीं कि प्रकृति के नियम कैसे काम करते हैं और पदार्थ के सबसे छोटे कणों का व्यवहार किस तरह तय होता है.इसी दिलचस्पी ने उन्हें थ्योरिटिकल फिजिक्स यानी सैद्धांतिक भौतिकी की ओर आकर्षित किया.यह फिजिक्स की वह शाखा है जिसमें गणितीय सिद्धांतों की मदद से प्रकृति और ब्रह्मांड के नियमों को समझने की कोशिश की जाती है.राधा का यही फैसला आगे चलकर उनके वैज्ञानिक करियर की पहचान बना.

प्रेसिडेंसी कॉलेज में मिला गोल्ड मेडल

उच्च शिक्षा के लिए राधा केरल से मद्रास पहुंचीं जिसे आज चेन्नई के नाम से जाना जाता है.यहां उन्होंने देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शामिल प्रेसिडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया.उस दौर में विज्ञान के कठिन विषयों में महिलाओं की भागीदारी काफी कम थी.इसके बावजूद राधा ने अपनी पढ़ाई में शानदार प्रदर्शन किया.उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए उन्हें गोल्ड मेडल मिला.इस सफलता ने साबित कर दिया कि केरल के छोटे से गांव से निकली यह छात्रा विज्ञान की दुनिया में बड़ी उपलब्धियां हासिल करने की क्षमता रखती है.प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढ़ाई के बाद उन्होंने रिसर्च की दिशा में कदम बढ़ाया.

पार्टिकल फिजिक्स पर लिखे 14 रिसर्च पेपर

राधा ने आगे चलकर थ्योरिटिकल फिजिक्स के क्षेत्र में गंभीर रिसर्च की.उन्होंने पार्टिकल फिजिक्स, फाइनमैन प्रोपेगेटर्स और कणों के बीच होने वाली परस्पर क्रियाओं जैसे विषयों पर काम किया.पार्टिकल फिजिक्स में पदार्थ के बेहद छोटे कणों और उनके व्यवहार का अध्ययन किया जाता है.वहीं फाइनमैन प्रोपेगेटर्स क्वांटम फिजिक्स की गणनाओं में इस्तेमाल होने वाली एक महत्वपूर्ण अवधारणा है.राधा ने इन विषयों से जुड़े कुल 14 रिसर्च पेपर प्रकाशित किए. उनका यही शोध उनकी डॉक्टरेट थीसिस का भी आधार बना.इन शोधपत्रों के जरिए उन्होंने वैज्ञानिक समुदाय में अपनी पहचान बनानी शुरू की.उनकी रिसर्च केवल भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी वैज्ञानिकों का ध्यान उनकी ओर गया.

1963 में अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी पहुंचीं

राधा की प्रतिभा ने उन्हें अमेरिका में रिसर्च करने का अवसर दिलाया.साल 1963 में उन्हें स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में पोस्टडॉक्टोरल फेलोशिप मिली.पोस्टडॉक्टोरल फेलोशिप उन शोधकर्ताओं को दी जाती है जो डॉक्टरेट के बाद किसी विशेष विषय पर आगे रिसर्च करना चाहते हैं.स्टैनफोर्ड में राधा ने जाने-माने भौतिक विज्ञानी लियोनार्ड आई. शिफ (Leonard I. Schiff) के साथ काम किया.यह उनके वैज्ञानिक करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव था. अमेरिका में रिसर्च करने और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों के साथ काम करने से उनके अनुभव और पहचान का दायरा बढ़ा.इसी दौरान उनकी प्रतिभा और शोध कार्य ने दुनिया के प्रसिद्ध वैज्ञानिक जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर का ध्यान आकर्षित किया.

ओपेनहाइमर ने जून 1965 में खुद भेजा निमंत्रण

राधा के वैज्ञानिक जीवन की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक साल 1965 में हुई.जून 1965 में उन्हें जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर का एक पत्र मिला.उस समय ओपेनहाइमर अमेरिका के प्रिंसटन स्थित इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडी (Institute for Advanced Study) के निदेशक थे.उन्होंने राधा को इस प्रतिष्ठित संस्थान में आने का निमंत्रण दिया.निमंत्रण के मुताबिक राधा को सितंबर 1965 से अप्रैल 1966 तक संस्थान से जुड़ने के लिए बुलाया गया था.यह किसी भी युवा वैज्ञानिक के लिए बड़ी उपलब्धि थी.खासकर उस दौर में भारत की एक महिला वैज्ञानिक को ओपेनहाइमर जैसे वैज्ञानिक से व्यक्तिगत निमंत्रण मिलना उनकी रिसर्च और प्रतिभा की पहचान थी.

कौन थे जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर?

जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर दुनिया के प्रसिद्ध सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी थे.उन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका के मैनहट्टन प्रोजेक्ट में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए जाना जाता है. इसी परियोजना के तहत परमाणु बम विकसित किया गया था.ओपेनहाइमर को अक्सर परमाणु बम का जनक भी कहा जाता है हालांकि उनकी पहचान केवल परमाणु बम तक सीमित नहीं थी.वह थ्योरिटिकल फिजिक्स के बड़े वैज्ञानिक थे और विज्ञान की दुनिया में उनका काफी सम्मान था.उन्होंने प्रिंसटन के इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडी का नेतृत्व भी किया.इस संस्थान से अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक भी जुड़े रहे थे.ऐसे संस्थान में राधा को आमंत्रित किया जाना उनके वैज्ञानिक जीवन की बड़ी उपलब्धि थी.

दुनिया के बड़े वैज्ञानिकों के साथ काम करने का मौका

ओपेनहाइमर के निमंत्रण पर राधा अमेरिका के प्रिंसटन पहुंचीं.यहां उन्हें उस समय के कई प्रमुख वैज्ञानिकों के साथ बातचीत करने और उनके विचारों को समझने का अवसर मिला.इनमें फ्रीमैन डायसन (Freeman Dyson), अब्राहम पाइस (Abraham Pais) और सर्जियो पिएरो फुबिनी (Sergio Piero Fubini) जैसे वैज्ञानिक शामिल थे.ये सभी सैद्धांतिक भौतिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम कर रहे थे.प्रिंसटन में रहने के दौरान राधा की ओपेनहाइमर से व्यक्तिगत बातचीत भी हुई.इन मुलाकातों से जुड़े कुछ अनुभव उन्होंने वर्षों बाद एक इंटरव्यू में साझा किए.

ओपेनहाइमर ने राधा से भगवद्गीता के बारे में पूछा

प्रिंसटन में ओपेनहाइमर से हुई एक बातचीत राधा के लिए यादगार रही.ओपेनहाइमर की भारतीय दर्शन और विशेष रूप से भगवद्गीता में गहरी रुचि थी.उन्होंने भगवद्गीता को संस्कृत में पढ़ा था.एक मुलाकात के दौरान ओपेनहाइमर ने राधा से पूछा कि क्या वह भगवद्गीता के बारे में जानती हैं.राधा को यह देखकर हैरानी हुई कि अमेरिका के इतने बड़े वैज्ञानिक को भारतीय धार्मिक ग्रंथ की इतनी अच्छी जानकारी थी.उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने भगवद्गीता का इतना गहराई से अध्ययन नहीं किया था कि उस पर ओपेनहाइमर के साथ विस्तार से चर्चा कर सकें.यह मुलाकात उनके लिए एक खास अनुभव बन गई.

जब यात्रा के पैसे नहीं मिले तो ओपेनहाइमर ने तुरंत मदद की

राधा ने ओपेनहाइमर से जुड़ा एक और अनुभव साझा किया था.प्रिंसटन यात्रा के दौरान उन्हें आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ा.उनकी यात्रा के लिए जरूरी धनराशि समय पर नहीं पहुंची थी.इस समस्या को लेकर उन्होंने ओपेनहाइमर की सचिव से संपर्क किया.जब यह बात ओपेनहाइमर तक पहुंची तो उन्होंने बिना देरी किए पैसे भेजने की व्यवस्था कराई.धनराशि तुरंत ट्रांसफर कराने का निर्देश दिया गया.यह उनके लिए एक ऐसा अनुभव था, जिसमें उन्होंने ओपेनहाइमर का सहयोगी व्यवहार देखा.

1966 में शादी हुई और कनाडा चली गईं

प्रिंसटन में काम करने के बाद राधा का जीवन एक नए मोड़ पर पहुंचा. साल 1966 में उन्होंने वेम्बु गौरीशंकर (Vembu Gourishankar) से शादी की. गौरीशंकर कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बर्टा में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर थे.शादी के बाद राधा उनके साथ कनाडा के एडमंटन शहर चली गईं.इस समय तक राधा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिसर्च कर चुकी थीं.उन्होंने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में काम किया था और प्रिंसटन के प्रतिष्ठित संस्थान से भी जुड़ चुकी थीं.उनके सामने वैज्ञानिक करियर में आगे बढ़ने की संभावनाएं थीं लेकिन शादी के बाद परिस्थितियां बदलने लगीं.

असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी मिली

कनाडा पहुंचने के बाद यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बर्टा ने राधा को असिस्टेंट प्रोफेसर के पद का प्रस्ताव दिया. यह उनके लिए रिसर्च और पढ़ाने के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अच्छा अवसर था लेकिन इसी दौरान वह गर्भवती हो गईं.उस समय बच्चों की देखभाल के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं.इस कारण उनके लिए नौकरी और परिवार की जिम्मेदारियों को एक साथ संभालना मुश्किल हो गया.इसके बाद उनकी एक और गर्भावस्था कठिन रही.इन परिस्थितियों ने उनके वैज्ञानिक करियर में वापसी को और मुश्किल बना दिया.धीरे-धीरे वह नियमित रिसर्च से दूर होती चली गईं.

रिसर्च में लौटना चाहा तो बदल चुकी थी दुनिया

राधा ने बाद में इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडी को दिए एक इंटरव्यू में अपने करियर से जुड़ी इन मुश्किलों के बारे में बताया. उनके मुताबिक जब उन्होंने दोबारा रिसर्च की दुनिया में लौटने की कोशिश की, तब तक उनके विषय में काफी बदलाव हो चुके थे. फिजिक्स में नए शोध और सिद्धांत सामने आ रहे थे. उन्हें महसूस हुआ कि वह अपने क्षेत्र में हो रहे नए विकास से कई साल पीछे रह गई हैं. इस दौरान यूनिवर्सिटी की परिस्थितियों के कारण भी उनके लिए उपयुक्त पद हासिल करना मुश्किल हो गया. इस तरह जिस वैज्ञानिक ने कभी ओपेनहाइमर के निमंत्रण पर प्रिंसटन में काम किया था, उसके लिए दोबारा नियमित रिसर्च करियर शुरू करना आसान नहीं रहा लेकिन राधा ने पढ़ाई और सीखना नहीं छोड़ा.

1973 में फिर बनीं स्टूडेंट, कंप्यूटिंग की पढ़ाई शुरू की

वैज्ञानिक रिसर्च से दूरी बनने के बाद भी राधा ने नई चीजें सीखने का फैसला किया.साल 1973 में उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बर्टा में कंप्यूटिंग से जुड़े कोर्स में दाखिला लिया.उस समय कंप्यूटर और प्रोग्रामिंग का क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहा था.राधा के पास पहले से गणित और फिजिक्स की मजबूत समझ थी इसलिए उन्होंने कंप्यूटिंग को नए अवसर के रूप में देखा. दिलचस्प बात यह रही कि इस बार भी उन्होंने पढ़ाई में शानदार प्रदर्शन किया.वह एक बार फिर अपनी कक्षा में टॉप पर रहीं.इससे साबित हुआ कि कई साल के करियर ब्रेक के बाद भी उनकी सीखने की क्षमता और विषयों को समझने की योग्यता कम नहीं हुई थी.

1976 से 1992 तक कंप्यूटर प्रोग्रामर के रूप में किया काम

कंप्यूटिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद राधा को अपनी नई विशेषज्ञता का इस्तेमाल करने का अवसर मिला. उनके पास फिजिक्स और कंप्यूटर प्रोग्रामिंग दोनों की जानकारी थी.यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बर्टा के फिजिक्स विभाग को ऐसे लोगों की जरूरत थी जो कठिन वैज्ञानिक गणनाओं और न्यूमेरिकल एनालिसिस में मदद कर सकें.न्यूमेरिकल एनालिसिस में गणितीय तरीकों और कंप्यूटर की मदद से जटिल समस्याओं का समाधान किया जाता है.राधा की विशेषज्ञता इस काम के लिए उपयोगी साबित हुई.साल 1976 से 1992 तक उन्होंने कंप्यूटर प्रोग्रामर के रूप में काम किया.इस दौरान वह वैज्ञानिकों को रिसर्च से जुड़ी गणनाओं और कंप्यूटेशनल काम में सहयोग देती रहीं.

प्रोग्रामिंग के साथ रिसर्च में भी देती रहीं योगदान

कंप्यूटर प्रोग्रामर के रूप में काम करते हुए राधा केवल तकनीकी गणनाओं तक सीमित नहीं रहीं.वह फिजिक्स के शोधकर्ताओं के साथ काम करती थीं.अपने वैज्ञानिक अनुभव के आधार पर वह रिसर्च से जुड़े विचार भी साझा करती थीं.उनके कुछ योगदान इतने महत्वपूर्ण थे कि वैज्ञानिक शोधपत्रों में उन्हें सह-लेखक के रूप में भी शामिल किया गया.इस तरह नियमित थ्योरिटिकल फिजिक्स रिसर्च से दूर होने के बावजूद उनका विज्ञान से रिश्ता बना रहा.
उन्होंने अपने ज्ञान को एक नए तरीके से इस्तेमाल किया.



Source link