Indian Army in Jammu Kashmir History: यह बात साल 1947 में देश के आजाद होने के दो महीने बाद की है. देश वैसे ही बंटवारे का दंश झेल रहा था. भारत से अलग होकर पाकिस्तान अलग मुल्क बन चुका था. उधर जम्मू कश्मीर के हिस्से में अलग ही चुनौती खड़ी हो गई थी. यह हिस्सा अभी तक किसी के पास नहीं गया था. अचानक पाकिस्तान की तरफ से कबायलियों ने हमला कर दिया. भारतीय फौज की बंदूकें तैयार थीं लेकिन उनके सामने लक्ष्मण रेखा खिंची हुई थी. ऐसे नाजुक समय में महाराजा हरि सिंह को आनन-फानन में एक महत्वपूर्ण फैसला लेना पड़ा. इसके बाद कश्मीर की वादियों में इंडियन आर्मी उतर गई. दुश्मन को खदेड़ दिया गया. आज 27 अक्टूबर की ही वो तारीख थी, जब भारत के जवान श्रीनगर में पहुंचे थे.
1947 में अक्टूबर का तीसरा हफ्ता जम्मू-कश्मीर के लिए खौफनाक और ऐतिहासिक हफ्ता साबित हुआ था. दरअसल 15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान दो अलग देश बन चुके थे, लेकिन जम्मू-कश्मीर का नक्शा अब भी तय नहीं था. रियासत के अंतिम शासक महाराजा हरि सिंह स्वतंत्र रहने या फैसले को टालने के पक्ष में थे. उन्होंने भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के साथ समझौता करने का प्रस्ताव रखा था. पाकिस्तान ने इस पर सहमति जताई लेकिन उसकी निगाहें पूरे कश्मीर पर थीं. इसके बाद के कुछ हफ्तों में जो परिस्थितियां बनीं, उन्होंने भारत का इतिहास और भूगोल हमेशा के लिए बदलकर रख दिया.
पाकिस्तान की साजिश और ‘ऑपरेशन गुलमर्ग’
अक्टूबर 1947 के शुरुआती हफ्तों में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर की नाकेबंदी शुरू कर दी. राज्य को मिलने वाले जरूरी राशन, पेट्रोल और नमक को रोक दिया गया. जब इस आर्थिक दबाव से भी महाराजा नहीं झुके, तो पाकिस्तान की सेना और हुकूमत ने ‘ऑपरेशन गुलमर्ग’ की नींव रखी. 22 अक्टूबर 1947 को हजारों की संख्या में पाकिस्तानी सेना की तरफ से समर्थित कबाइली पश्तून हमलावर मुजफ्फराबाद की सीमा पार करते हुए कश्मीर में दाखिल हो गए.
बारामूला का कत्लेआम और श्रीनगर पर खतरा
कबाइली हमलावरों ने मुजफ्फराबाद और डोमेल पर कब्जा जमा लिया. महाराजा हरि सिंह की डोगरा सेना संख्या में काफी कम थी और कई मोर्चों पर बिखरी हुई थी. हमलावर तेजी से आगे बढ़ते हुए बारामूला पहुंच गए. बारामूला में कबाइलियों ने भयंकर तबाही मचाई. लूटपाट, आगजनी और निर्दोष नागरिकों का नरसंहार किया गया. बारामूला पावर हाउस को तबाह कर दिया गया, जिससे पूरे श्रीनगर शहर में अंधेरा छा गया. अगर हमलावर बारामूला में लूटपाट के कारण 2-3 दिनों तक ना रुकते तो वे सीधे श्रीनगर एयरपोर्ट पर कब्जा कर लेते.
महाराजा की भारत से मदद की गुहार
श्रीनगर पर कब्जा बिल्कुल तय दिख रहा था. 25 अक्टूबर 1947 को भारत सरकार के गृह मंत्रालय के सीनियर अधिकारी वी. पी. मेनन स्थिति का जायजा लेने स्पेशल फ्लाइट से श्रीनगर पहुंचे. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए महाराजा हरि सिंह ने श्रीनगर छोड़ दिया और जम्मू चले गए. महाराजा ने भारत से तत्काल सैन्य सहायता भेजने की गुहार लगाई.
महाराजा ने क्यों मंजूर किया भारत में विलय?
भारतीय गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन और सुरक्षा समिति का क्लिअर स्टैंड था कि अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के तहत भारत तब तक अपनी सेना किसी विदेशी या स्वतंत्र रियासत में नहीं भेज सकता, जब तक वह आधिकारिक रूप से भारत का हिस्सा ना बन जाए. इसी मजबूरी और राज्य को बचाने की अंतिम उम्मीद के तहत अस्तित्व की रक्षा का फैसला लिया गया.
महाराजा समझ चुके थे कि पाकिस्तान उनकी रियासत को जोर-जबर्दस्ती से हड़पना चाहता है. और उनके पास इससे निपटने के लिए पर्याप्त सैन्य बल नहीं है. बारामूला में हुए नरसंहार के बाद श्रीनगर और पूरे राज्य के नागरिकों को बचाने का एकमात्र जरिया भारतीय सेना ही थी. विलय पत्र पर साइन हुआ. 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने ऐतिहासिक ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ (Instrument of Accession) यानी भारत में विलय के कानूनी दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए. 27 अक्टूबर को लॉर्ड माउंटबेटन ने इसे मंजूर भी कर लिया.
भारतीय सेना श्रीनगर क्यों और कैसे पहुंची?
जैसे ही विलय पत्र स्वीकार हुआ, जम्मू-कश्मीर कानूनी तौर पर भारत का अभिन्न अंग बन गया. 27 अक्टूबर 1947 की सुबह ऑपरेशन श्रीनगर शुरू हुआ. भारतीय वायुसेना के डकोटा विमानों के जरिए सिख रेजीमेंट की पहली बटालियन के जवानों को लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय की अगुवाई में श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतारा गया. यहां भारतीय सेना का पहला मिशन श्रीनगर एयरपोर्ट पर कब्जा बरकरार रखना था, ताकि भारत से और सैनिक, हथियार आसानी से उतारे जा सकें.
कर्नल दीवान रंजीत राय ने बारामूला की तरफ बढ़कर दुश्मन को रोक कर रखा और इस दौरान वे देश के लिए शहीद हो गए. मरणोपरांत उनको महावीर चक्र से सम्मानित किया गया. शेलतेंग की जंग हुई. 7 नवंबर 1947 को भारतीय सेना और मेजर सोमनाथ शर्मा जैसे जांबाज योद्धाओं की शहादत और वीरता के बल पर कबाइलियों को श्रीनगर के मुहाने पर खदेड़ दिया गया. बारामूला-उरी को उनके कब्जे से आजाद कराया गया. भारतीय सेना के टाइमली ऐक्शन ने श्रीनगर और कश्मीर घाटी को दुश्मनों के कब्जे में जाने से बचा लिया.