बनारस को पीएम मोदी देने जा रहे ऐसा तोहफा, जो बनारसी दशकों तक नहीं भूल पाएंगे, मह‍िलाओं की बदलेगी क‍िस्‍मत

बनारस को पीएम मोदी देने जा रहे ऐसा तोहफा, जो बनारसी दशकों तक नहीं भूल पाएंगे, मह‍िलाओं की बदलेगी क‍िस्‍मत


Varanasi Garment Factory: बनारस का नाम आते ही बनारसी साड़ी, रेशमी कपड़े और हथकरघा याद आते हैं. लेकिन अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसा तोहफा देने जा रहे हैं क‍ि बनारसी दशकों तक नहीं भूलेंगे. इतना ही नहीं, यह मह‍िलाओं की क‍िस्‍मत बदलने वाला भी है. अब यहां सिर्फ पारंपरिक साड़ियां ही नहीं, बल्कि स्पोर्ट्सवियर और अंडरगारमेंट जैसे बड़े बाजार वाले कपड़े भी आधुनिक फैक्ट्री में तैयार किए जाएंगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25 अक्टूबर को वाराणसी में अरविंद लिमिटेड की नई गारमेंट मैन्युफैक्चरिंग यूनिट का उद्घाटन करने वाले हैं. इस परियोजना में करीब 100 करोड़ रुपये खर्च होंगे और 1000 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलने की उम्मीद है. खास बात इस यूनिट में महिलाओं को बड़े मौके म‍िलने वाले हैं.

यह यूनिट वाराणसी के मिर्जामुराद इलाके में खोचवां-भदेहरा गांव के पास, रूपापुर चौराहे के नजदीक स्थापित की गई है. यह सात एकड़ से ज्यादा जमीन पर बनी है. इस यूनिट में करीब 300 मशीनें लगाई गई हैं. लगभग 300 महिलाएं यहां काम करने के लिए प्रशिक्षण ले रही हैं. यह आंकड़ा इसलिए खास है क्योंकि कपड़ा बनाने की इंडस्ट्री में रोजगार सिर्फ मशीन चलाने वाले ऑपरेटर तक सीमित नहीं रहता. उत्पादन बढ़ने के साथ गुणवत्ता जांच, पैकिंग, स्टोर मैनेजमेंट, माल की आवाजाही, मशीनों की देखरेख और प्रशासन जैसे कामों की जरूरत भी पैदा हो सकती है. हालांकि, इन सभी भूमिकाओं में कितनी नौकरियां बनेंगी, इसका अलग-अलग आधिकारिक आंकड़ा अभी उपलब्ध नहीं है.

बनारस की फैक्ट्री में क्या बनेगा?

इस यूनिट में स्पोर्ट्सवियर और अंडरगारमेंट का प्रोडक्‍शन किया जाएगा.बनारसी साड़ी और पारंपरिक कपड़ों का बाजार अपनी जगह है, लेकिन स्पोर्ट्सवियर और अंडरगारमेंट रोजमर्रा के इस्तेमाल से जुड़े बड़े उत्पाद बाजार हैं. इनकी मांग फैशन के किसी एक सीजन तक सीमित नहीं रहती. स्पोर्ट्सवियर में टी-शर्ट, ट्रैक पैंट और दूसरी तरह के एक्टिववियर जैसे उत्पादों की मांग खेल, फिटनेस और रोजमर्रा के आरामदायक कपड़ों के बाजार से जुड़ती है. अंडरगारमेंट भी नियमित खपत वाला उत्पाद है. इन श्रेणियों में खरीदारों को लगातार सप्लाई, तय गुणवत्ता, सही आकार, समय पर डिलीवरी और लागत पर नियंत्रण चाहिए. आधुनिक फैक्ट्री का फायदा यही है कि वह उत्पादन की प्रक्रिया को मानकीकृत करने और बड़े ऑर्डर पूरे करने की क्षमता विकसित कर सकती है. लेकिन यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि यूनिट खुलते ही बनारस इन उत्पादों का बड़ा निर्यात केंद्र बन जाएगा. असली नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि फैक्ट्री कितनी क्षमता से चलती है, उसे कितने ऑर्डर मिलते हैं और उत्पादन का कितना हिस्सा देश के बाजारों या विदेशों में जाता है.

गेम चेंजर क्यों बन सकती है यह गारमेंट फैसिलिटी?

  1. पहला कारण: स्थानीय रोजगार के लिए नया रास्ता. कपड़ा उद्योग की खासियत है कि इसमें कई तरह के कामों के लिए अलग-अलग शैक्षणिक डिग्री की जरूरत नहीं होती. प्रशिक्षण के जरिए लोग सिलाई, मशीन संचालन, फिनिशिंग, गुणवत्ता जांच और पैकिंग जैसे काम सीख सकते हैं. अगर कंपनी की घोषित रोजगार योजना के मुताबिक भर्तियां होती हैं, तो स्थानीय लोगों को नौकरी के लिए दूसरे औद्योगिक शहरों की ओर जाने की जरूरत कुछ हद तक कम हो सकती है. इसका लाभ खासकर उन परिवारों को मिल सकता है जिनके पास रोजगार के सीमित विकल्प हैं.
  2. दूसरा कारण: महिलाओं की बड़ी भागीदारी. इस परियोजना में महिलाओं को प्रमुखता दिए जाने की बात कही गई है. रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 300 महिलाएं यूनिट में प्रशिक्षण ले रही हैं. यह सिर्फ रोजगार की संख्या का मामला नहीं है. नियमित नौकरी से महिलाओं की अपनी कमाई, परिवार के आर्थिक फैसलों में भागीदारी और काम से जुड़ा कौशल बढ़ सकता है. हालांकि, इसका वास्तविक असर वेतन, काम के घंटे, सुरक्षा, आने-जाने की सुविधा और नौकरी की निरंतरता पर निर्भर करेगा. अगर इन पहलुओं पर भी ध्यान दिया जाता है, तो यह मॉडल महिलाओं के लिए फैक्ट्री आधारित रोजगार का व्यावहारिक रास्ता बन सकता है.
  3. तीसरा कारण: बनारस की पहचान का विस्तार. बनारस का पारंपरिक कपड़ा कारोबार अपनी अलग पहचान रखता है. लेकिन आधुनिक गारमेंट फैक्ट्री का काम पारंपरिक बुनाई से अलग है. यहां लक्ष्य बड़े पैमाने पर ऐसे कपड़े तैयार करना है जिनकी बनावट, आकार, गुणवत्ता और डिलीवरी तय मानकों के अनुसार हो. इस तरह शहर की कपड़ा अर्थव्यवस्था में एक नया हिस्सा जुड़ सकता है—एक तरफ हथकरघा और पारंपरिक वस्त्र, दूसरी तरफ मशीन आधारित रेडीमेड कपड़े. इसका मतलब यह नहीं कि नई फैक्ट्री सीधे बुनकरों की आमदनी बढ़ा देगी. उसके लिए स्थानीय बुनकरों और कारोबारियों को कच्चे माल, सिलाई, पैकेजिंग या दूसरी सेवाओं की सप्लाई चेन से जोड़ना होगा. यह जुड़ाव कितना होगा, इस पर आगे नजर रखनी होगी.
  4. चौथा कारण: बड़े बाजार तक पहुंच की संभावना. यह यूनिट आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रियाओं पर काम करेगी और इसके उत्पाद वैश्विक ग्राहकों तक पहुंच सकते हैं. बड़ी कंपनियों के साथ काम करने का मतलब है कि उत्पादन को खरीदारों की गुणवत्ता और डिलीवरी संबंधी जरूरतों के अनुरूप रखना होगा. अगर वाराणसी की यूनिट इन मानकों पर खरी उतरती है, तो भविष्य में बड़े ऑर्डर हासिल करने की संभावना बन सकती है. लेकिन वैश्विक ग्राहक होने का दावा और वास्तविक निर्यात आंकड़े अलग चीजें हैं. अभी उपलब्ध जानकारी में यूनिट की उत्पादन क्षमता, सालाना कारोबार, निर्यात का लक्ष्य या देशों के हिसाब से ऑर्डर का ब्योरा नहीं दिया गया है. इसलिए इसे संभावित अवसर के रूप में देखना ज्यादा सही होगा.

बाहर भी सैकड़ों लोगों को म‍िलेगा रोजगार

किसी औद्योगिक यूनिट का आर्थिक प्रभाव सिर्फ उसके कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहता. अगर उत्पादन नियमित और बड़े पैमाने पर होता है, तो उसे पैकिंग सामग्री, परिवहन, मशीनों की मरम्मत, सफाई, भोजन और दूसरी सहायक सेवाओं की जरूरत पड़ सकती है. इससे आसपास के छोटे कारोबारों के लिए अवसर बन सकते हैं. मगर यहां भी एक शर्त है. इन सेवाओं की खरीद स्थानीय कारोबारियों से होनी चाहिए. अगर ज्यादातर सामान और सेवाएं बाहर से आती हैं, तो स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलने वाला लाभ सीमित रह सकता है. इसलिए आगे यह देखना जरूरी होगा कि फैक्ट्री के आसपास कितने छोटे सप्लायर और सेवा प्रदाता जुड़ते हैं.

अगर महिलाएं और युवा यहां आधुनिक मशीनों पर काम करना सीखते हैं, तो उनके पास भविष्य में दूसरी गारमेंट इकाइयों में भी काम करने लायक अनुभव हो सकता है. इससे पूर्वांचल में कपड़ा उद्योग से जुड़े प्रशिक्षित श्रमिकों का आधार तैयार हो सकता है. लेकिन इसके लिए प्रशिक्षण की गुणवत्ता और सीखे गए कौशल की दूसरी कंपनियों में उपयोगिता भी अहम होगी.



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