अब तक आपने महिलाओं को घर संभालते, परिवार की जिम्मेदारी निभाते और खेतों में काम करते देखा होगा, लेकिन खंडवा जिले की ग्रामीण महिलाएं खेती को ही अपनी कमाई का जरिया बनाकर आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही हैं। यहां पंधाना विकासखंड के ग्राम जलकुआं से जुड़ी कृषिनमामि आजीविका फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड से 400 से 500 से अधिक ग्रामीण महिलाएं जुड़ी हुई हैं। इन महिलाओं ने पारंपरिक खेती के साथ औषधीय और व्यावसायिक फसलों की खेती को अपनाया है.
आज ये महिलाएं अश्वगंधा, शतावरी, सफेद मूसली, तुलसी, सिंदूर और मोरिंगा जैसी फसलें उगा रही हैं। खास बात यह है कि महिलाएं केवल खेती तक सीमित नहीं हैं, बल्कि फसल के उत्पादन, संग्रहण और बिक्री से जुड़ी गतिविधियों में भी भागीदारी निभा रही हैं। समूह के जरिए महिलाएं अपनी उपज को बाजार तक पहुंचाने की दिशा में काम कर रही हैं। इनकी मेहनत देखकर आसपास के दूसरे किसान भी नई फसलों की खेती करने के लिए प्रेरित हो रहे हैं.
400 से 500 महिलाओं ने मिलकर खड़ी की अपनी कंपनी
खंडवा जिले के पंधाना विकासखंड के ग्राम जलकुआं में शुरू हुई कृषिनमामि आजीविका एफपीओ ग्रामीण महिलाओं के लिए एक बड़ा मंच बनकर उभरी है. एफपीओ यानी फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन के माध्यम से किसान मिलकर खेती और उससे जुड़े कारोबार को आगे बढ़ा सकते हैं। इस कंपनी से जुड़ी महिलाएं सामूहिक रूप से खेती, औषधीय फसलों के उत्पादन और वन उपज के संग्रहण जैसे काम कर रही हैं. समूह के साथ जुड़ने से महिलाओं को नई फसलों की जानकारी हासिल करने, खेती के तरीकों को समझने और अपनी उपज की बिक्री के लिए सामूहिक प्रयास करने का मौका मिला है. इस पहल की खास बात यह है कि महिलाएं केवल मजदूरी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कंपनी की सदस्य और हिस्सेदार बनकर कृषि व्यवसाय में अपनी भूमिका निभा रही हैं.
अश्वगंधा से लेकर सफेद मूसली तक, उगा रहीं कई तरह की फसलें
Local18 से बातचीत में कंपनी की संचालक कला बामने बताती हैं कि समूह की महिलाएं कई तरह की फसलों की खेती करती हैं। इनमें अश्वगंधा, शतावरी, सफेद मूसली, मीठी तुलसी, कुसुम, कौंच बीज, मोरिंगा और सिंदूर जैसी फसलें शामिल हैं। इसके अलावा महिलाएं नीम के बीज और बहेड़ा जैसी वन उपज के संग्रहण से भी जुड़ी हुई हैं। इन फसलों को अपनाने के पीछे उद्देश्य खेती के नए विकल्प तलाशना और पारंपरिक फसलों के साथ आमदनी के दूसरे रास्ते तैयार करना है। हालांकि, हर फसल की खेती के लिए अलग तरह की जलवायु, मिट्टी, समय और देखभाल की जरूरत होती है। इसलिए महिलाएं अपने अनुभव और उपलब्ध जानकारी के आधार पर खेती का काम आगे बढ़ा रही हैं.
सिंदूर की खेती बनी समूह की खास पहचान
कृषिनमामि आजीविका एफपीओ की एक खास पहचान समूह के स्तर पर सिंदूर की खेती करना भी है। औषधीय और व्यावसायिक फसलों के साथ इस तरह की फसल को अपनाकर महिलाएं खेती में नए प्रयोग कर रही हैं। कला बामने के मुताबिक, समूह की महिलाएं अलग-अलग प्रकार की खेती कर रही हैं और दूसरी महिलाओं को भी इसके तरीके समझा रही हैं। उनका कहना है कि अब आसपास के कई पुरुष किसान भी महिलाओं को देखकर इन फसलों की खेती करने लगे हैं। इससे महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ा है और खेती में उनकी भूमिका को लेकर लोगों की सोच में भी बदलाव आ रहा है। हालांकि, किसी भी नई फसल को लगाने से पहले उसकी बाजार मांग, लागत और खरीदारों की उपलब्धता की जानकारी लेना जरूरी है.
कंपनी के जरिए फसल की खरीद और बिक्री पर जोर
इस एफपीओ की एक अहम विशेषता यह है कि समूह की महिलाएं उत्पादन के साथ-साथ उपज की बिक्री को भी व्यवस्थित करने की दिशा में काम कर रही हैं। कंपनी से जुड़ी जानकारी के अनुसार, महिलाओं की उगाई गई फसलों को कंपनी के माध्यम से खरीदने और उनकी पैकेजिंग व ब्रांडिंग करके बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था पर काम किया जाता है। समूह का उद्देश्य मध्य प्रदेश के अलावा दूसरे राज्यों के बाजारों तक भी उत्पाद पहुंचाना है। कुछ उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने की संभावनाओं पर भी काम किया जा रहा है। इस तरह सामूहिक प्रयास से महिलाओं को अपनी उपज की बिक्री के लिए बेहतर व्यवस्था तैयार करने का अवसर मिलता है। हालांकि, हर फसल की खरीद, बिक्री और बाजार उपलब्धता अलग-अलग हो सकती है.
कला बामने और दूसरी संचालक महिलाएं संभाल रहीं जिम्मेदारी
कंपनी को आगे बढ़ाने में संचालक मंडल की महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। कला बामने के साथ सुनीता पवार, पुष्पा कोंगे, पूजा पटेल और कल्पना कोचले कंपनी के संचालन से जुड़ी हैं। वहीं कंपनी के सीईओ सुनील पंडोले के मार्गदर्शन में उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन से जुड़ी गतिविधियों को आगे बढ़ाया जा रहा है। महिलाओं के लिए सामूहिक रूप से काम करने का यह मॉडल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें खेती की जानकारी साझा करने और कृषि व्यवसाय को व्यवस्थित करने का मौका मिलता है। समूह के माध्यम से महिलाएं नई फसलों को समझ रही हैं और अपने अनुभव के आधार पर दूसरे किसानों को भी प्रेरित कर रही हैं.
रासायनिक मुक्त खेती को भी दे रही हैं बढ़ावा
कला बामने बताती हैं कि समूह की महिलाएं रासायनिक मुक्त खेती करने की दिशा में भी काम कर रही हैं। उनका कहना है कि वे दूसरी महिलाओं को अलग-अलग फसलों की खेती के बारे में जानकारी देती हैं और कई किसान उनके काम को देखकर प्रेरित हुए हैं। खेती में लागत कम करने और मिट्टी की सेहत बनाए रखने के लिए प्राकृतिक और जैविक तरीकों को अपनाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, रासायनिक मुक्त खेती में भी फसल के अनुसार पोषण, कीट नियंत्रण और मिट्टी की देखभाल की जरूरत होती है। सही तरीका अपनाने और बाजार तक पहुंच.
लखपति दीदी बनने की दिशा में बढ़ रहीं महिलाएं
कृषिनमामि आजीविका एफपीओ से जुड़ी महिलाओं की कहानी बताती है कि जब ग्रामीण महिलाएं मिलकर काम करती हैं, तो खेती में नए अवसर तलाश सकती हैं। औषधीय फसलों की खेती, वन उपज का संग्रहण और सामूहिक विपणन के जरिए महिलाएं अपनी आमदनी बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। इस पहल से उन्हें कृषि व्यवसाय में भागीदारी निभाने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिला है। समूह से जुड़ी महिलाओं का प्रयास दूसरी ग्रामीण महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन रहा है। खंडवा की इन महिलाओं ने दिखाया है कि खेती को सिर्फ पारंपरिक फसलों तक सीमित रखने के बजाय नई फसलों और सामूहिक प्रयासों के जरिए आगे बढ़ने के रास्ते तलाशे जा सकते हैं। यही वजह है कि कृषिनमामि आजीविका एफपीओ की यह पहल ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण की एक प्रेरक कहानी बन रही है.