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Balaghat Unique Durga Puja: आपको बता दें कि बीते 63 सालों से यहां पर माता दुर्गा की प्रतिमा नवरात्रि की पंचमी पर मां दुर्गा की महिषासुर मर्दिनी स्वरूप की प्रतिमा स्थापित की जाती है. इसमें खास बात ये है कि मां के श्रृंगार का सामान आज भी बंगाल से आता है.
Balaghat Unique Durga Puja: एमपी का बालाघाट अजब है. वैसे तो नवरात्रि का उत्सव पूरे देश में मनाया जाता है. लेकिन बालाघाट में भी कई ऐसे दुर्गा पंडाल है, जो भक्तों का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं. हर पंडाल की अपनी एक विशेषता है. लेकिन ऐसा पंडाल है, जहां पर बंगाली पैटर्न में दुर्गा पुजा होती है. दरअसल, बालाघाट के काली पुतली चौक के पास पीएमश्री स्कूल के प्रांगण में बंगाली समुदाय के लोग 63 सालों से दुर्गा पूजा की परंपरा भी निभा रहा है. ऐसे में शारदीय नवरात्रि में यह पंडाल खास ध्यान का विषय रहता है.
आपको बता दें कि बीते 63 सालों से यहां पर माता दुर्गा की प्रतिमा नवरात्रि की पंचमी पर मां दुर्गा की महिषासुर मर्दिनी स्वरूप की प्रतिमा स्थापित की जाती है. इसमें खास बात ये है कि मां के श्रृंगार का सामान आज भी बंगाल से आता है.
जानिए कब और कैसे शुरु हुई थी ये परंपरा
बंगाली दुर्गा उत्सव समिति के कार्यकारी अध्यक्ष मनोज चक्रवर्ती ने बताया कि जब बालाघाट में यह परंपरा शुरू हुई थी. तब उनकी उम्र महज पांच साल की थी. उन्होंने बताया कि बालाघाट में बंगाली समुदाय के बहुत ही कम लोग थे. ऐसे में वह बंगाली की दुर्गा पूजा में शामिल नहीं हो पाते थे. ऐसे में उन्होंने बालाघाट में यह पूजा भी शुरू की थी. उन्होंने बताया कि अब यहां पर 40 से 45 बंगाली परिवार के लोग इस आयोजन में शामिल होते हैं. बालाघाट में विराजित माता के श्रृंगार का सामान आज भी बंगाल से ही आता है. इसमें माता का मुकुट और हार शामिल है.
खास पूजा के साथ शाम को धुनाची नृत्य
मनोज चक्रवर्ती बताते हैं कि माता की स्थापना बंगाली रीति रिवाज के मुताबिक नवरात्रि की पंचमी में शुरू होती है. इसमें सुबह से लेकर रात तक बंगाली परंपरा के मुताबिक पूजा पाठ होती है. वहीं, शाम के के समय धुनाची नृत्य होता है. इसमें मिट्टी के विशेष पात्र में सूखे नारियल के छिलके, कोयला और धुना रखकर आग जलाई जाती है. खास तौर से सप्तमी, अष्टमी और नवमी की शाम को यह नृत्य होता है. यह नृत्य की थाप पर पुरुष और महिलाएं हाथों में और सिर पर रखकर थिरकते हैं. इसे माता की आरती के तौर पर देखा जाता है. यह नजारा देखने के लिए बालाघाट के लोग बड़ी उत्सुकता के साथ जाते हैं.
सिर्फ बंगाली ही नहीं बालाघाट वासियों की भी गहरी आस्था
बालाघाट में विराजित माता के आयोजन में न सिर्फ बंगाली समुदाय के लोग ही बढ़चढ़ कर हिस्सा नहीं लेते हैं. बल्कि बालाघाट के हर समुदाय के लोग इसमें न सिर्फ हिस्सा लेते हैं बल्कि इस आयोजन में चंदा भी देते हैं. यहां पर इसके बाद षष्ठी को षष्ठी माता, सप्तमी को महामाया और अष्टमी को संधि पूजा की जाती है. नवमी पर हवन होता है. पूजा का समापन विजयदशमी पर सिंदूर खेला के साथ होता है.