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सभी तरह की फसलों के उत्पादन के लिए अलग-अलग वातावरण की जरूरत होती है. इसे ऐसे समझ सकते हैं कि पहाड़ी इलाके के फल, फूल और सब्जी का उत्पादन आप मैदानी इलाकों में नहीं कर सकते हैं और मैदानी इलाके के फल-फूल और सब्जियों को आप पहाड़ी इलाकों में नहीं तैयार कर सकते हैं. इसी तरह चावल के उत्पादन के लिए कुछ ऐसे इलाके हैं जहां वातावरण धान की फसल के अनुकूल होता है. ऐसा ही है बिहार का रोहतास. इस इलाके को चावल का कटोरा कहते हैं.
रोहतास: बिहार का रोहतास जिला धान उत्पादन के लिए देशभर में अपनी अलग पहचान रखता है. यहां की जलवायु और कृषि परिस्थितियां धान की खेती के लिए अनुकूल मानी जाती हैं. हालांकि, बेहतर उत्पादन के लिए सही किस्म का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण होता है. धान की ऐसी किस्मों का चयन जो कम समय में तैयार हो, रोगों के प्रति सहनशील हो और अच्छी पैदावार दे वो किसानों की आमदनी बढ़ाने में मददगार हो सकता है. रोहतास स्थित धान अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. प्रकाश सिंह ने लोकल 18 से बातचीत के दौरान जिले की जलवायु के अनुकूल धान की पांच किस्मों की विशेषताओं, पकने की अवधि और उत्पादन क्षमता की जानकारी दी है. इनमें सबौर मंसूरी, सबौर प्रताप, सबौर नरेंद्र, सबौर कुँवर, सबौर विजय और सुगंधित धान की किस्म सबौर सोना शामिल है.
वैज्ञानिक डॉ. प्रकाश सिंह के मुताबिक, सबौर मंसूरी रोहतास की जलवायु के अनुकूल अच्छी उपज देने वाली किस्मों में शामिल है. इसकी खासियत यह है कि यह गलमिज रोग के प्रति प्रतिरोधी है जबकि मधुआ कीट का प्रकोप इसमें मध्यम स्तर का रहता है. ब्लास्ट और झुलसा रोग के प्रति भी इसमें सहनशीलता बताई गई है. इसका तना मजबूत होता है जिससे फसल के गिरने की आशंका कम रहती है. इस किस्म की औसत उपज 70 से 80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है जबकि अनुकूल परिस्थितियों में अधिकतम उत्पादन 120 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकता है.
सबौर प्रताप को सांभा कतरनी के विकल्प के तौर पर विकसित किया गया है. यह किस्म लगभग 130 से 140 दिनों में तैयार होती है. इसकी औसत उपज 60 से 65 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और अधिकतम उपज करीब 105 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. वहीं कम अवधि में धान की फसल तैयार करने वाले किसानों के लिए सबौर नरेंद्र और सबौर कुंवर विकल्प हो सकते हैं. इन किस्मों की फसल लगभग 120 से 125 दिनों में तैयार हो जाती है. इनकी औसत उपज 50 से 55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है जबकि अधिकतम उपज 90 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है. वैज्ञानिक के अनुसार ये किस्में झुलसा सहित कई प्रकार के रोगों के प्रति प्रतिरोधी हैं.
धान की एक अन्य किस्म सबौर विजय है जो नाटी मंसूरी से काफी मिलती-जुलती है. इसकी फसल तैयार होने में लगभग 135 से 140 दिन लगते हैं. इसकी औसत उपज 70 से 75 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और अधिकतम उपज करीब 98 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. सुगंधित धान की खेती करने वाले किसानों के लिए सबौर सोना एक विकल्प है. इसकी औसत उपज 55 से 60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और अधिकतम उपज 88 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक है. इसके चावल को मुलायम और कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाला बताया जाता है. कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले खाद्य पदार्थ रक्त में ग्लूकोज का स्तर अपेक्षाकृत धीरे बढ़ाते हैं.
डॉक्टर सिंह ने बताया कि किसानों के लिए धान की किस्म चुनते समय केवल अधिकतम उपज के आंकड़ों पर निर्भर रहना उचित नहीं है. खेत की मिट्टी, सिंचाई की सुविधा, बुआई का समय, रोगों का प्रकोप और कटाई के बाद अगली फसल लगाने की योजना को भी ध्यान में रखना चाहिए. वैज्ञानिक के अनुसार, बेहतर उत्पादन के लिए उन्नत किस्म के प्रमाणित बीज के साथ संतुलित खाद प्रबंधन, समय पर सिंचाई और कीट-रोग नियंत्रण भी जरूरी है.