कम जमीन पर बसाइए खेती और गांव की दुनिया, कृषि पर्यटन से डेयरी तक कमाई के कई रास्ते, एमएससी छात्रा मृदुल शर्मा ने समझाया मॉडल

कम जमीन पर बसाइए खेती और गांव की दुनिया, कृषि पर्यटन से डेयरी तक कमाई के कई रास्ते, एमएससी छात्रा मृदुल शर्मा ने समझाया मॉडल


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जम्मू कश्मीर के रहनेवाले मृदुल शर्मा ने सबसे पहले एग्री टूरिज्म यानी कृषि पर्यटन के बारे में बताया. उन्होंने समझाया कि शहरों में रहने वाले बहुत से लोग गांव के प्राकृतिक वातावरण, पारंपरिक रहन-सहन और ग्रामीण जीवन को याद करते हैं. ऐसे लोगों के लिए कृषि पर्यटन आकर्षण का केंद्र बन सकता है. छोटे भूखंड पर भी योजनाबद्ध तरीके से फार्म हाउस, पारंपरिक ग्रामीण परिवेश, पशुधन और डेयरी से जुड़ी गतिविधियों को शामिल किया जा सकता है.इसके साथ बांस की खेती, ग्रीन हाउस, तालाब और अन्य कृषि गतिविधियों के लिए भी जगह निर्धारित की जा सकती है.

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अगर आपके पास खेती के लिए बहुत कम जमीन है और आप सोचते हैं कि उस पर कुछ बड़ा नहीं किया जा सकता, तो यह मॉडल आपके लिए उपयोगी साबित हो सकता है. छोटी सी जमीन पर भी कृषि पर्यटन, सुरक्षित खेती, कृषि वानिकी, फार्म हाउस, ग्रीन हाउस, तालाब, पशुपालन और स्थानीय बाजार जैसी सुविधाओं की योजना तैयार की जा सकती है. इसकी जानकारी डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय में एमएससी की पढ़ाई कर रहीं जम्मू-कश्मीर की छात्रा मृदुल शर्मा ने लोकल 18 से खास बातचीत में दी. उन्होंने एक मॉडल के माध्यम से समझाया कि सीमित जमीन का बेहतर इस्तेमाल कर खेती को केवल फसल उत्पादन तक सीमित रखने के बजाय उससे जुड़ी कई गतिविधियों को विकसित किया जा सकता है. इस तरह किसान अपनी जरूरतों, उपलब्ध संसाधनों और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर जमीन का नियोजन कर सकते हैं.

गांव की यादों से कृषि पर्यटन तक, एक ही परिसर में मिल सकती हैं कई सुविधाएं

जम्मू कश्मीर के रहनेवाले मृदुल शर्मा ने सबसे पहले एग्री टूरिज्म यानी कृषि पर्यटन के बारे में बताया. उन्होंने समझाया कि शहरों में रहने वाले बहुत से लोग गांव के प्राकृतिक वातावरण, पारंपरिक रहन-सहन और ग्रामीण जीवन को याद करते हैं. ऐसे लोगों के लिए कृषि पर्यटन आकर्षण का केंद्र बन सकता है. छोटे भूखंड पर भी योजनाबद्ध तरीके से फार्म हाउस, पारंपरिक ग्रामीण परिवेश, पशुधन और डेयरी से जुड़ी गतिविधियों को शामिल किया जा सकता है.इसके साथ बांस की खेती, ग्रीन हाउस, तालाब और अन्य कृषि गतिविधियों के लिए भी जगह निर्धारित की जा सकती है. मॉडल का उद्देश्य यह दिखाना है कि जमीन कम होने का मतलब संभावनाओं का कम होना नहीं है. उपलब्ध क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग गतिविधियों को व्यवस्थित करके खेती, ग्रामीण अनुभव और कृषि आधारित आजीविका को एक साथ जोड़ा जा सकता है. हालांकि, इसके लिए जमीन की स्थिति, पानी की उपलब्धता, निवेश और स्थानीय मांग के अनुसार योजना बनाना जरूरी है.

पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप से किसानों तक तकनीक पहुंचाने पर चर्चा

छात्रा ने दूसरे मॉडल के रूप में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप यानी सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की साझेदारी की अवधारणा समझाई. इसके तहत कृषि प्रसार, शिक्षा, उन्नत खेती, नवाचार और किसानों तक नई तकनीक पहुंचाने जैसे कार्यों को बढ़ावा दिया जा सकता है. उन्होंने बताया कि कई बड़ी कंपनियां किसानों के साथ मिलकर कृषि क्षेत्र में विभिन्न गतिविधियां करती हैं= इसी तरह की साझेदारी के माध्यम से किसानों को नई तकनीकों, जरूरी जानकारियों और उनकी खेती से जुड़ी समस्याओं के समाधान तक पहुंचाने की दिशा में काम किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि केवल तकनीक विकसित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि वह किसानों तक आसानी से पहुंचे और उनकी वास्तविक जरूरतों के अनुरूप हो. किसानों को कहां कमी के कारण नुकसान हो रहा है, उनकी समस्याओं का समाधान कैसे निकले और उन्हें सही जानकारी कैसे मिले, इन पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है.



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