दुर्गा अष्टमी पर मां हिंगलाज के दर्शन, बलूचिस्तान से आईं शक्तिपीठ की खास तस्वीरें!

दुर्गा अष्टमी पर मां हिंगलाज के दर्शन, बलूचिस्तान से आईं शक्तिपीठ की खास तस्वीरें!


बलूचिस्तान: नवरात्रि में मां दुर्गा की आराधना के बीच बलूचिस्तान से हमारे विशेष सूत्रों के जरिए मां हिंगलाज के धाम की तस्वीरें सामने आई हैं. ये तस्वीरें भक्तों को उस प्राचीन धार्मिक स्थल की याद दिलाती हैं, जिसे हिंदू परंपरा में विशेष महत्व प्राप्त है. पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित मां हिंगलाज का मंदिर हिंदुओं के प्रमुख तीर्थस्थलों में गिना जाता है. इसे 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है. भारत से दूर होने के बावजूद इस धाम का भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से गहरा संबंध है.

नवरात्रि के इस पावन अवसर पर मां हिंगलाज का स्मरण उस आस्था से जुड़ने का अवसर है, जो भौगोलिक सीमाओं से परे सदियों से चली आ रही है. बलूचिस्तान से मिली ये तस्वीरें इसी प्राचीन विरासत की ओर ध्यान खींचती हैं.

कहां स्थित है मां हिंगलाज का मंदिर?
मां हिंगलाज का प्रसिद्ध मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के लसबेला जिले में, हिंगोल नेशनल पार्क के भीतर स्थित है. यह मंदिर हिंगोल नदी के किनारे पहाड़ी क्षेत्र में बनी एक प्राकृतिक गुफा में है. अरब सागर के मकरान तट के निकट स्थित यह धाम कराची से लगभग 190 किलोमीटर पश्चिम में है. पाकिस्तान के पुरातत्व विभाग और यूनेस्को की टेंटेटिव वर्ल्ड हेरिटेज सूची में भी हिंगलाज मंदिर और इसके आसपास के सांस्कृतिक क्षेत्र का उल्लेख मिलता है.

Jai Hinglaj Mata, Balochistan, News 18

यहां माता की पूजा प्राकृतिक गुफा में स्थित पवित्र स्थल पर की जाती है. मंदिर की विशेषता इसकी प्राकृतिक भौगोलिक स्थिति और सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा है. यह कोई नया धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि लंबे समय से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है.

51 शक्तिपीठों में शामिल है मां हिंगलाज धाम
हिंदू धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां हिंगलाज 51 शक्तिपीठों में से एक हैं. शक्तिपीठों की परंपरा माता सती और भगवान शिव से जुड़ी पौराणिक कथा पर आधारित है. मान्यता है कि राजा दक्ष के यज्ञ में अपमानित होने के बाद माता सती ने अपने प्राण त्याग दिए थे. भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर विचरण करने लगे. इसके बाद भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंग अलग-अलग स्थानों पर गिरे और उन स्थानों को शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाने लगा.

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हिंगलाज धाम के बारे में प्रचलित धार्मिक मान्यता है कि यहां माता सती के सिर का ऊपरी हिस्सा गिरा था. हालांकि, शक्तिपीठों की संख्या और उनसे जुड़ी अलग-अलग कथाओं का विवरण विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में अलग-अलग मिलता है. मां हिंगलाज को हिंगलाज देवी, हिंगुला देवी और हिंगलाज माता जैसे नामों से भी जाना जाता है. स्थानीय स्तर पर यह धाम ‘नानी मंदिर’ के नाम से भी प्रसिद्ध है.

हिंदुओं के साथ स्थानीय समुदाय की भी आस्था
मां हिंगलाज मंदिर की एक खास बात यह भी है कि स्थानीय बलूच समुदाय के लोग भी इस स्थल का बड़ी श्रद्धा से देखभाल करते हैं. पाकिस्तान के पुरातत्व विभाग के विवरण में इसका उल्लेख मिलता है. स्थानीय तौर पर इसे नानी मंदिर कहा जाता है और गुफा मंदिर की देखरेख में स्थानीय समुदाय की भूमिका भी रही है.

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यह पहलू इस धाम को केवल एक धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं रखता, बल्कि इसे क्षेत्र की साझा सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा भी बनाता है. सदियों से चली आ रही स्थानीय परंपराएं और श्रद्धालुओं की आस्था इस स्थान को विशिष्ट पहचान देती हैं.

हर साल होती है मां हिंगलाज की तीर्थयात्रा
मां हिंगलाज के दर्शन के लिए पाकिस्तान और अन्य स्थानों से श्रद्धालु पहुंचते हैं. यहां हर साल हिंगलाज यात्रा और धार्मिक उत्सव का आयोजन होता है. यह यात्रा आमतौर पर चैत्र महीने में होती है, जो मार्च-अप्रैल के आसपास पड़ता है. इस दौरान श्रद्धालु कठिन भौगोलिक परिस्थितियों से गुजरते हुए माता के धाम पहुंचते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं.

यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि हिंगलाज की वार्षिक यात्रा और शारदीय नवरात्रि अलग-अलग धार्मिक अवसर हैं. शारदीय नवरात्रि के दौरान मां हिंगलाज का स्मरण किया जा सकता है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि मंदिर का वार्षिक उत्सव भी इसी समय होता है.

इस नवरात्रि मां हिंगलाज का कीजिए स्मरण
नवरात्रि मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की उपासना का पर्व है. मां हिंगलाज को भी देवी शक्ति की उपासना की परंपरा में विशेष स्थान प्राप्त है. बलूचिस्तान से मिली इन तस्वीरों के जरिए श्रद्धालु उस प्राचीन धाम को याद कर सकते हैं, जो आज भारत की सीमाओं से बाहर स्थित होने के बावजूद हिंदू धार्मिक परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है.

मां हिंगलाज का धाम हमें यह भी याद दिलाता है कि धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्व केवल किसी स्थान की भौगोलिक सीमा से तय नहीं होता. नवरात्रि के इस अवसर पर मां हिंगलाज का स्मरण, देवी शक्ति के प्रति श्रद्धा और सदियों पुरानी परंपरा से जुड़ने का एक माध्यम है.

जय मां हिंगलाज!



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