नवजात का अंत‍िम संस्‍कार देख श्‍मशान घाट के कर्मचारी की आंखों में आ गए आंसू… पर 150 मीटर दूर प‍िता देखता रहा, आख‍िर क्‍यों?

नवजात का अंत‍िम संस्‍कार देख श्‍मशान घाट के कर्मचारी की आंखों में आ गए आंसू… पर 150 मीटर दूर प‍िता देखता रहा, आख‍िर क्‍यों?


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श्‍मशान कर्मचारी की आंखों में आ गए आंसू… बाप 150 मीटर की दूरी से देखता रहा

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Newborn Last Rites News: महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में जन्म के अगले दिन नवजात की मौत हो गई. नवरात्रि की धार्मिक मान्यता का हवाला देकर माता-पिता ने नवजात के शव को छूने से इनकार कर द‍िया. इसके बाद श्मशान घाट के कर्मचारियों ने नवजात का अंत‍िम संस्‍कार क‍िया. इस दौरान श्‍मशान घाट के कर्मचार‍ियों की आंख में आंसू थे पर नवजात का प‍िता 150 म‍ीटर दूर खड़े होकर यह सबकुछ देख रहा था.

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महाराष्‍ट्र के संभाजीनगर में नवजात की मौत के बाद मां-बाप ने उसके पार्थ‍िव शरीर को हाथ लगाने से इनकार कर द‍िया (फोटो:AI)

मुंबई. महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर से एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. जन्म के अगले ही दिन एक नवजात की मौत हो गई लेकिन बच्चे के अंतिम संस्कार के दौरान उसके माता-पिता और रिश्तेदारों ने उससे दूर रहे. श्मशान घाट के कर्मचारियों ने ही बच्चे के शव को उठाया और अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाई. इस दौरान बच्‍चे का अंत‍िम संस्‍कार करने वाले श्‍मशान घाट के कर्मचार‍ियों की आंखों में आंसू थे लेक‍िन उसके पर‍िवार ने उससे दूरी बना रखी थी. इस दौरान नवजात बच्‍चे के प‍िता 150 मीटर दूरी पर खड़े होकर यह सबकुछ देख रहे थे. बताया गया कि परिवार ने नवरात्रि में अपनी धार्मिक मान्यताओं का हवाला देते हुए बच्चे को छूने और अंतिम संस्कार में शामिल होने से इनकार कर दिया.

सोमवार रात को हुआ जन्म, अगली सुबह नवजात की मौत
यह घटना महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में गजानन महाराज मंदिर के पास स्थित एक निजी अस्पताल की है. न्‍यूज 18 मराठी की रिपोर्ट के मुताबिक, महिला ने सोमवार रात बच्चे को जन्म दिया था. प्रसव के दौरान आई कुछ द‍िक्‍कतें बढ़ गईं और अगली सुबह नवजात की मौत हो गई. यह दंपती मूल रूप से जलगांव जिले का रहने वाला बताया गया है. काम के सिलसिले में वह पिछले करीब एक साल से छत्रपति संभाजीनगर में रह रहा था. बच्चे की मौत के बाद परिवार को अस्पताल से शव लेकर जाना था और अंतिम संस्कार की व्यवस्था करनी थी. लेकिन परिवार ने नवरात्रि में चली आ रही अपनी परंपरा का हवाला देते हुए बच्चे के शव को छूने से इनकार कर दिया.

पिता ने श्मशान घाट के कर्मचारियों को फोन किया
बच्चे के पिता ने सेंट्रल नाका श्मशान घाट के कर्मचारियों से संपर्क किया और उनसे नवजात के शव को ले जाने के लिए कहा. इसके बाद श्मशान घाट में काम करने वाले देवराज गायकवाड़ और रामेश्वर साबले बच्चे को लेने पहुंचे.

बताया गया कि उस समय परिवार के पांच से छह रिश्तेदार भी मौजूद थे, लेकिन कोई भी बच्चे के शव को लेकर जाने के लिए तैयार नहीं हुआ. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, रिश्तेदार वहां से चले गए और बच्चे को ले जाने की जिम्मेदारी श्मशान घाट के कर्मचारियों ने संभाली।.

100 से 150 मीटर दूर खड़ा रहा पिता
इस घटना का सबसे भावुक कर देने वाला पहलू बच्चे के अंतिम संस्कार के दौरान सामने आया. पिता कर्मचारियों के साथ उसी वाहन में जाने के बजाय अलग ऑटो से श्मशान घाट पहुंचा लेकिन वहां भी वह बच्चे के शव के पास जाने के लिए तैयार नहीं हुआ. बताया गया कि वह अंतिम संस्कार की जगह से करीब 100 से 150 मीटर दूर खड़ा रहा. श्मशान घाट के कर्मचारियों ने उससे पास आकर बच्चे को आखिरी बार देखने और अंतिम संस्कार में शामिल होने का आग्रह किया, लेकिन उसने मना कर दिया. कर्मचारियों के मुताबिक, पिता ने उनसे ही सारी प्रक्रिया पूरी करने को कहा. उसने कथित तौर पर अगले दिन बच्चे के दस्तावेज लेने से भी इनकार कर दिया. जरूरी कागजात पर हस्ताक्षर करने के बाद वह वहां से चला गया.

श्मशान घाट के कर्मचारियों ने किया अंतिम संस्कार
इसके बाद देवराज गायकवाड़ और रामेश्वर साबले ने नवजात के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाई और बच्चे को दफनाया गया. इस दौरान परिवार की ओर से कोई भी व्यक्ति अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल नहीं हुआ. बताया गया कि अंतिम संस्कार पूरा होने के बाद पिता ने बच्चे की कब्र के ऊपर थोड़ा दूध डाला और वहां से चला गया. इस घटना को देखकर श्मशान घाट के कर्मचारी भावुक हो गए. वे रोजाना अंतिम संस्कार से जुड़े काम करते हैं, लेकिन एक दिन के नवजात के साथ हुई इस घटना ने उन्हें भी विचलित कर दिया।.

आखिर क्यों नहीं छूना चाहते थे माता-पिता?
न्‍यूज 18 मराठी की र‍िपोर्ट के अनुसार, परिवार ने नवरात्रि के दौरान अपनी धार्मिक परंपरा का हवाला दिया था. उनका कहना था कि इस अवधि में उनके यहां नवजात बच्चे और प्रसूता को छूने की मनाही है और ऐसी स्थिति में अंतिम संस्कार के धार्मिक काम भी नहीं किए जाते.

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