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Camel Conservation Rajasthan: राजस्थान में ऊंटों की घटती संख्या को रोकने और ऊंटनी के दूध के कारोबार को बढ़ावा देने के लिए कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर और राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र, बीकानेर के बीच समझौता ज्ञापन हुआ है.
जोधपुर: राजस्थान के राज्य पशु ऊंट की लगातार घटती संख्या को रोकने और पशुपालकों के लिए इसे आय का बेहतर साधन बनाने की दिशा में कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र, बीकानेर ने महत्वपूर्ण पहल की है। दोनों संस्थानों के बीच हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) के तहत ऊंट संरक्षण, स्वास्थ्य प्रबंधन, नस्ल सुधार और कृषि-पशुपालन आधारित अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाएगा. पश्चिमी राजस्थान में ऊंट केवल परिवहन या पशुधन का साधन नहीं, बल्कि रेगिस्तानी जीवनशैली, संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का भी अहम हिस्सा है ऐसे में ऊंटों की घटती संख्या पशुपालकों के साथ पर्यावरण और पारंपरिक पशुपालन व्यवस्था के लिए भी चिंता का विषय है। इस साझेदारी का उद्देश्य वैज्ञानिक अनुसंधान और संस्थागत सहयोग के जरिए ऊंटों के संरक्षण के लिए प्रभावी कदम उठाना है.
इस एमओयू का एक महत्वपूर्ण पहलू ऊंटनी के दूध और उससे बनने वाले मूल्य संवर्धित उत्पादों को बढ़ावा देना है. राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. ए.के. पूनिया ने ऊंटनी के दूध को ‘चलती-फिरती फार्मेसी’ बताते हुए इसके महत्व, व्यावसायिक उपयोग और विपणन को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता जताई.ऊंटनी के दूध को बाजार से बेहतर तरीके से जोड़ने, उससे उपयोगी उत्पाद विकसित करने और उनकी बिक्री की संभावनाएं तलाशने से पशुपालकों के लिए आय के नए रास्ते बन सकते हैं। फिलहाल इस क्षेत्र में पशुपालकों को उत्पादन के साथ-साथ प्रसंस्करण, उचित बाजार और उपभोक्ताओं तक पहुंच जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। दोनों संस्थानों का साझा प्रयास इन संभावनाओं पर शोध और तकनीकी सहयोग को आगे बढ़ाने में मददगार होगा। इससे ऊंट पालन को आर्थिक रूप से उपयोगी बनाने और पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े परिवारों को प्रोत्साहन देने की उम्मीद है.
वैज्ञानिक शोध से विद्यार्थियों और पशुपालकों को मिलेगा लाभ
कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर के कुलगुरु प्रो. वीरेंद्र सिंह जैतावत ने कहा कि ऊंटों की घटती संख्या गंभीर चिंता का विषय है और उनके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक स्तर पर ठोस प्रयास जरूरी हैं। उन्होंने बताया कि कृषि और पशुधन का रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र से गहरा संबंध है। ऐसे में दोनों संस्थानों के बीच सहयोग से विद्यार्थियों, शोधार्थियों और पशुपालकों को लाभ मिल सकता है। संयुक्त अनुसंधान के माध्यम से ऊंटों के स्वास्थ्य, बेहतर नस्ल, पालन-पोषण और उत्पादन क्षमता से जुड़े विषयों पर काम करने की संभावनाएं मजबूत होंगी। वहीं, आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक जानकारी को पशुपालकों तक पहुंचाने से उन्हें पशुधन प्रबंधन में मदद मिल सकती है। यह पहल ऊंट पालन से जुड़ी पारंपरिक जानकारी को वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ जोड़ने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है.
‘ऊंट बचाओ अभियान’ को मजबूत करने पर जोर
एमओयू के अवसर पर काजरी, जोधपुर के निदेशक डॉ. एच.एस. जाट ने ऊंट संरक्षण के लिए एकजुट होकर काम करने और ‘ऊंट बचाओ अभियान’ को मजबूती देने की जरूरत बताई। उन्होंने संरक्षण के प्रयासों को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाने पर जोर दिया। कार्यक्रम में कृषि विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. वीरेंद्र सिंह जैतावत और राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. ए.के. पूनिया ने समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर दस्तावेजों का आदान-प्रदान किया.वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. प्रदीप पगारिया ने एमओयू के उद्देश्यों और संयुक्त कार्ययोजना की जानकारी दी, जबकि प्रधान वैज्ञानिक डॉ. राकेश रंजन ने राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र की अनुसंधान गतिविधियों और आधुनिक तकनीकों से अवगत कराया.