नई दिल्ली: अंतरिक्ष में फोरनेक्स नाम का एक तारामंडल है, जिसके एक हिस्से को खगोलविद कई दशकों से दुनिया का सबसे शांत इलाका मान रहे थे. हबल टेलीस्कोप ने इसी हिस्से को करीब 270 घंटे लगातार देखकर डीप फील्ड की ऐतिहासिक तस्वीर बनाई थी, जिसमें दस हजार से ज्यादा गैलेक्सियां दर्ज हुई थीं. जब जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप लॉन्च हुआ, तो वैज्ञानिकों ने उसके इन्फ्रारेड कैमरों को उसी पुराने इलाके की तरफ मोड़ा. किसी को उम्मीद नहीं थी कि इस जाने-पहचाने हिस्से में कोई नया अजूबा मिलेगा. लेकिन जेम्स वेब ने वहां से एक बेहद अजीब और अकेला सिग्नल पकड़ लिया. यह रोशनी ठीक उस जगह से निकली है, जहां पुराने डेटा में पूरी तरह सन्नाटा था. वैज्ञानिक अब इस पहेली को सुलझाने में लगे हैं कि खाली स्पेस में यह रोशनी कहां से आई.
आखिर हबल अल्ट्रा डीप फील्ड के उस शांत कोने में जेम्स वेब ने ऐसा क्या देख लिया?
अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में हबल अल्ट्रा डीप फील्ड को सबसे ज्यादा अध्ययन किए गए इलाकों में गिना जाता है. हबल ने आसमान के इस छोटे से टुकड़े को देखने में सैकड़ों घंटे बिताए थे. उस जगह पर अरबों प्रकाश वर्ष दूर फैली लगभग दस हजार गैलेक्सियां मौजूद हैं. सामान्य नजर से देखने पर वह इलाका पूरी तरह शांत और वीरान लगता है.
जब जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने अपने सोने के शीशों को उस दिशा में घुमाया, तो वैज्ञानिकों का मकसद केवल छूटी हुई चीजों को तलाशना था. जेम्स वेब के पास बेहद संवेदनशील इन्फ्रारेड उपकरण हैं, जो बहुत कमजोर रोशनी को भी आसानी से पकड़ सकते हैं. इस निगरानी के दौरान जेम्स वेब ने उस इलाके के एक बेहद छोटे कोने में एक अनोखा सिग्नल दर्ज किया.
यह कोई साधारण रोशनी नहीं थी, बल्कि एक खास वेवलेंथ पर निकलने वाली चमक थी. सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि जिस पॉइंट से यह सिग्नल आया, वहां हबल और जेम्स वेब की पुरानी तस्वीरों में कुछ भी दिखाई नहीं दिया था. पुराने सभी रिकॉर्ड के मुताबिक वह जगह पूरी तरह खाली थी. खाली स्पेस से इस तरह का सिग्नल आना वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी पहेली बन गया है.
वैज्ञानिकों ने पुरानी तकनीक छोड़कर इस बार अंतरिक्ष में कौन सा नया तरीका आजमाया था?
इस घटना को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि वैज्ञानिक ब्रह्मांड का अध्ययन कैसे करते हैं. जब हम किसी टेलीस्कोप से देखते हैं, तो हमें कई अलग-अलग फिल्टर से ली गई तस्वीरों का मेल दिखाई देता है. कुछ आधुनिक टेलीस्कोप रोशनी को उसके अलग-अलग रंगों और वेवलेंथ में तोड़ सकते हैं. यह बिल्कुल वैसा ही काम है, जैसे कोई प्रिज्म सफेद रोशनी को सात रंगों में बांट देता है.
जब रोशनी को इस तरह फैलाया जाता है, तो उसमें खास चमकदार रेखाएं दिखाई देती हैं. इन चमकदार रेखाओं को वैज्ञानिक भाषा में एमिशन लाइन्स कहा जाता है. आमतौर पर खगोलविद पहले से खोजी गई गैलेक्सियों की तरफ टेलीस्कोप का मुंह करते हैं. इसके लिए उपकरण के छोटे शटर को ऐसे सेट किया जाता है कि सिर्फ उसी टारगेट की रोशनी अंदर आए.
मिनिसोटा यूनिवर्सिटी के खगोलविद मेसन ह्यूबर्टी और उनकी टीम ने इस बार उलटा प्रयोग करने का फैसला किया. उन्होंने जेम्स वेब के नियर-इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोग्राफ के लगभग सभी शटर खोल दिए. उन्होंने केवल उन शटरों को बंद रखा जो सामने मौजूद पुरानी पहचानी गई चीजों को ढकते थे.
इस नई तकनीक को मल्टीऑब्जेक्ट कोरोनोग्राफी फॉर स्लिटलेस स्पेक्ट्रोस्कोपी नाम दिया गया है. इसका मकसद उन अनजान और बेहद धुंधली चीजों को खोजना था, जो सामान्य तरीकों से छूट जाती हैं.
डार्क नेबुला ‘बर्नार्ड 68’ धूल का एक घना बादल है, जो अपने पीछे मौजूद तारों की रोशनी को रोक देता है, जिससे अंतरिक्ष में एक छेद जैसा दिखाई देता है. यह केवल एक उदाहरण के तौर पर दी गई तस्वीर है, न कि उस जगह की जहां JWST ने कोई रहस्यमय चीज खोजी है. (Photo Courtesy : ESO)
क्या यह टेलीस्कोप के सेंसर की कोई तकनीकी गड़बड़ी थी या सच में कोई बड़ी हलचल हुई?
- वैज्ञानिकों ने इस नए तरीके की टेस्टिंग के लिए हबल अल्ट्रा डीप फील्ड को चुना. यह इलाका पहले से इतना ज्यादा परखा हुआ था कि नए नतीजों की तुलना पुराने रिकॉर्ड से आसानी से की जा सकती थी. टीम ने अगस्त 2023 और नवंबर 2023 के दौरान करीब 88 दिनों के अंतराल पर दो बार उस जगह को देखा.
- दोनों बार टेलीस्कोप का एंगल भी जानबूझकर अलग रखा गया था. ऐसा इसलिए किया गया ताकि कैमरे या सेंसर में आने वाली किसी खराबी को पूरी तरह खारिज किया जा सके. जब डेटा का एनालिसिस किया गया, तो छह सिग्नल बिल्कुल सही पाए गए. वे सभी छह सिग्नल पहले से मौजूद दूर की गैलेक्सियों से पूरी तरह मेल खा रहे थे.
- लेकिन सातवां डिटेक्शन वैज्ञानिकों को चकरा देने वाला साबित हुआ. दोनों बार के ऑब्जर्वेशन में लगभग 1.6 माइक्रोमीटर पर एक बेहद चमकदार अकेली लाइन दिखाई दी. यह सिग्नल चारों संयुक्त एक्सपोजर में मजबूती से दर्ज हुआ था. इसका सीधा मतलब यह निकला कि यह कैमरे का कोई फॉल्ट या तकनीकी ग्लिच नहीं था. अंतरिक्ष के उस हिस्से में सचमुच कोई ऐसी घटना घटी थी, जिसने यह रोशनी पैदा की.
अक्टूबर 2022 के डेटा में कुछ नहीं था तो फिर 2023 में अचानक यह रोशनी कैसे चमकी?
इस पूरी घटना में सबसे बड़ा सवाल समय को लेकर खड़ा हो गया है. 1.6 माइक्रोमीटर पर दिखने वाली यह एमिशन लाइन इतनी ज्यादा चमकदार थी कि इसे पहले के डेटा में दिख जाना चाहिए था. जेम्स वेब ने अक्टूबर 2022 में उसी इलाके का एक बहुत बड़ा सर्वे किया था, जिसे जेड्स सर्वे कहा जाता है.
अगर यह सिग्नल उस समय वहां मौजूद होता, तो टेलीस्कोप इसे किसी भी सूरत में मिस नहीं कर सकता था. इसका मतलब साफ है कि अक्टूबर 2022 में वहां ऐसा कुछ भी नहीं था. यह चमक 2022 के बाद और अगस्त 2023 से पहले किसी वक्त अचानक पैदा हुई.
वैज्ञानिक इसे एक ट्रांजिएंट इवेंट मान रहे हैं, जिसका मतलब कुछ समय के लिए होने वाली घटना होता है. अंतरिक्ष में कई ऐसी घटनाएं होती हैं, जो अचानक तेज रोशनी पैदा करती हैं और फिर गायब हो जाती हैं. किसी भी सिग्नल को सिर्फ एक अकेली लाइन देखकर पहचानना बेहद मुश्किल होता है. जब तक उस सोर्स की सही दूरी का पता न चले, तब तक यह तय नहीं किया जा सकता कि वह रोशनी कितनी ताकतवर थी.
क्या यह शुरुआती ब्रह्मांड की कोई भूली-बिसरी गैलेक्सी है जो अब सामने आई है?
- ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है और इस फैलाव की वजह से दूर से आने वाली रोशनी की वेवलेंथ खिंचकर लाल रंग की तरफ बढ़ जाती है. इस प्रक्रिया को विज्ञान में रेडशिफ्ट कहा जाता है. इसी वजह से एक इन्फ्रारेड फोटॉन बहुत दूर स्थित किसी ताकतवर धमाके का हो सकता है या पास की किसी कमजोर रोशनी का भी हो सकता है.
- वैज्ञानिकों ने इस रहस्य को सुलझाने के लिए चार मुख्य संभावनाओं पर विचार किया. पहली संभावना यह जताई गई कि शायद यह शुरुआती ब्रह्मांड की कोई बहुत पुरानी और अनजान गैलेक्सी हो. लेकिन इस थ्योरी के सामने दो बहुत बड़ी रुकावटें आ गईं.
- शुरुआती ब्रह्मांड न्यूट्रल हाइड्रोजन गैस के घने बादलों से भरा हुआ था. इतनी लंबी दूरी से आने वाली अकेली एमिशन लाइन का उस गैस को पार करके हम तक पहुंचना मुमकिन नहीं लगता. इसके अलावा अगर वह कोई स्थाई गैलेक्सी होती, तो वह 2022 के जेड्स सर्वे में भी जरूर नजर आती. अगर कोई पास की सामान्य गैलेक्सी होती, तो उसके स्पेक्ट्रम में सिर्फ एक लाइन नहीं बल्कि दूसरी गैसों की कई और लाइनें भी दिखतीं.
क्या किसी भूखे ब्लैक होल ने किसी बदनसीब तारे को बेरहमी से चीर दिया था?
दूसरी बड़ी संभावना अंतरिक्ष के सबसे ताकतवर ऑब्जेक्ट यानी ब्लैक होल से जुड़ी हुई है. जब कोई तारा किसी महाविशाल ब्लैक होल के बहुत करीब से गुजरता है, तो ब्लैक होल का भारी गुरुत्वाकर्षण उसे चीरकर टुकड़ों में बांट देता है. इस खगोलीय घटना को टाइडल डिसरप्शन इवेंट कहा जाता है.
तारे के मलबे जब ब्लैक होल के चारों तरफ तेजी से खिंचते हैं, तो बहुत तेज ऊर्जा और खास तरह की रोशनी पैदा होती है. इस तरह की घटना में बिना दूसरी रोशनी के भी एक बहुत मजबूत और अकेली एमिशन लाइन निकल सकती है. यह थ्योरी इस नए सिग्नल के व्यवहार से काफी हद तक मेल खाती है.
यह एक अचानक होने वाली घटना है, जो 2022 में नहीं थी और 2023 में अचानक भड़क उठी. वैज्ञानिकों का कहना है कि सिर्फ इतने भर डेटा से इस नतीजे पर पक्की मुहर नहीं लगाई जा सकती. इस घटना को साबित करने के लिए जो दूसरे सबूत मिलने चाहिए थे, वे मौजूदा डेटा में दर्ज नहीं हुए हैं. इसलिए ब्लैक होल का एंगल फिलहाल एक मजबूत कयास भर है.
हबल अल्ट्रा डीप फील्ड. (NASA, ESA, and S. Beckwith (STScI) and the HUDF Team)
क्या किसी विशाल तारे में भयानक धमाका हुआ था जिसे हम सुपरनोवा कहते हैं?
- खगोलविदों की लिस्ट में तीसरा संभावित कारण एक सुपरनोवा विस्फोट था. जब कोई बहुत भारी तारा अपनी जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर पहुंचता है, तो उसमें एक भीषण धमाका होता है. यह धमाका इतना जोरदार होता है कि कुछ हफ्तों के लिए यह पूरी गैलेक्सी से भी ज्यादा रोशनी बिखेरता है.
- सुपरनोवा की चमक भी समय के साथ बदलती है और धीरे-धीरे धीमी पड़ जाती है. वैज्ञानिकों ने सोचा कि शायद किसी सुदूर तारे के फटने से यह अनोखी रोशनी पैदा हुई होगी. लेकिन सुपरनोवा की थ्योरी में भी एक बड़ा सवाल फंसा हुआ है.
- जब कोई तारा फटता है, तो अंतरिक्ष में अलग-अलग तरह के तत्व फैलते हैं. इन तत्वों की वजह से स्पेक्ट्रम में कई अलग-अलग वेवलेंथ पर कई एमिशन लाइन्स दिखाई देनी चाहिए थीं. जेम्स वेब के डेटा में सिर्फ और सिर्फ एक ही लाइन मिली है, जिसके साथ कोई दूसरी लाइन नहीं है. इस अकेलेपन ने सुपरनोवा की संभावना को भी काफी कमजोर कर दिया है.
अब वैज्ञानिक इस ब्रह्मांडीय रहस्य की तह तक जाने के लिए आगे क्या करने वाले हैं?
इसके लिए जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप से उस जगह की दोबारा और ज्यादा गहराई से जांच करनी होगी. आने वाले समय में ज्यादा संवेदनशील स्पेक्ट्रोस्कोपी के जरिए अतिरिक्त डेटा जुटाया जाएगा. अगर अगली निगरानी में उस सिग्नल से जुड़ी कुछ और कमजोर लाइनें मिल जाती हैं, तो उसका सटीक रेडशिफ्ट तय हो सकेगा.
रेडशिफ्ट का पता चलते ही यह साफ हो जाएगा कि यह सिग्नल पृथ्वी से कितनी दूरी पर पैदा हुआ था. जब तक वह नया डेटा सामने नहीं आता, तब तक अंतरिक्ष के उस खाली कोने से आई यह रोशनी खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी पहेलियों में से एक बनी रहेगी. वैज्ञानिक लगातार उस खाली जगह पर नजर बनाए हुए हैं, ताकि इस रहस्य से पर्दा उठाया जा सके.