चीन की खुराफातों से पूरी दुनिया परेशान है, वो दुनिया भर के देशों को कर्ज के जाल में फंसा चुका है. चीन का प्लान हमेशा कमजोर देशों को कंट्रोल करते पावरफुल देशों को घेरने का होता है. पहले उसने पाकिस्तान को फंसाकर CPEC के जरिए भारत को घेरने की कोशिश की, जो बुरी तरह फेल हुई. अब पाकिस्तान ने अफगानिस्तान को पटा लिया है. अब चीन लद्दाख और PoK का नया ‘दरवाजा’ तैयार कर रहा है. इसे वाखान कॉरिडोर का नाम दिया गया है, जो भारत के लिए जी का जंजाल बन सकता है.
चीन, अफगानिस्तान में कौन सी चालें चल रहा है?
दरअसल, अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने वाखान कॉरिडोर के जरिए चीन के शिनजियांग इलाके को जोड़ने वाली एक नई सड़क का उद्घाटन कर दिया है. इस मौके पर तालिबान के मंत्री अब्दुल लतीफ मंसूर ने साफ कहा कि यह सड़क उनके देश के लिए सामरिक, राजनीतिक और आर्थिक, हर लिहाज से बहुत ज्यादा मायने रखती है.
ऊपर से देखने पर ये भले ही एक सीधी-सादी सड़क लगे, लेकिन अगर आप नक्शे और सुरक्षा के लिहाज से समझेंगे, तो खेल साफ हो जाएगा. चीन और तालिबान ने मिलकर भारत के सामने एक बहुत बड़ी सामरिक चुनौती खड़ी कर दी है. पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान (PoK) और हमारे लद्दाख के बिल्कुल मुहाने पर बनी ये सड़क भारत के लिए किसी बड़े सिरदर्द से कम नहीं है.
क्या है वाखान कॉरिडोर और क्यों है ये इतना खास?
वाखान कॉरिडोर अफगानिस्तान के सुदूर पूर्व में स्थित एक संकरा और पहाड़ी इलाका है. ये इलाका अफगानिस्तान, तजाकिस्तान, चीन और भारत के पाकिस्तान ऑक्यूपाइड कश्मीर (PoK) के गिलगित-बाल्टिस्तान रीजन के संगम पर मौजूद है.
- शिनजियांग का सुरक्षा चक्र पूरा: चीन का शिनजियांग प्रांत लगभग 5,500 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है. ये इलाका मंगोलिया, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, तजाकिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत (लद्दाख) जैसे 8 देशों से सटा है.
- भारत को छोड़कर सबसे कनेक्टिविटी:मइस नई सड़क के बनने के बाद, भारत को छोड़कर चीन की सीमा से सटे इन सभी सात पड़ोसी देशों के साथ बीजिंग का सीधा सड़क संपर्क स्थापित हो चुका है.
- पीछे से पैसा, आगे तालिबान: आधिकारिक तौर पर तालिबान का कहना है कि उसने इस सड़क को बनाने में करीब 40 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए हैं. लेकिन सुरक्षा जानकारों का पक्का मानना है कि इस प्रोजेक्ट के पीछे असली पैसा और दिमाग चीन का ही है, जो पिछले कई दशकों से अफगानिस्तान में पैर जमाने की फिराक में था.
CPEC में ‘बलूच फाइटर्स’ का खौफ: चीन का प्लान-B बना अफगानिस्तान
चीन का ये कदम सिर्फ लद्दाख की घेराबंदी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे चीन का भारी आर्थिक नुकसान भी एक बड़ी वजह है.
चीन ने पाकिस्तान में ‘चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर’ (CPEC) और ग्वादर पोर्ट बनाने में अरबों डॉलर बहा दिए हैं. लेकिन बलूचिस्तान के आजादी पसंद लड़ाके चीन के प्रोजेक्ट्स, इंजीनियरों और अधिकारियों पर लगातार आत्मघाती हमले कर रहे हैं. इससे CPEC किसी काम का नहीं रहा है.
पाकिस्तान में जारी असुरक्षा और बलूच हमलों से तंग आकर चीन अब समुद्र तक पहुंचने के लिए अफगानिस्तान के रास्ते एक वैकल्पिक रूट तैयार कर रहा है. तालिबान से सुरक्षा की गारंटी लेकर चीन अब वाखान कॉरिडोर के रास्ते अफगानिस्तान से होते हुए सीधे ईरान तक अपनी सीधी पहुंच बना सकता है.
भारत के लिए क्यों बज रही हैं खतरे की घंटी?
- गिलगित-बाल्टिस्तान और लद्दाख के बेहद करीब : ये सड़क भारत के उस इलाके के बिल्कुल पास से गुजरती है जिसे भारत अपना अभिन्न अंग मानता है, यानी पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला गिलगित-बाल्टिस्तान. साथ ही, ये सड़क लद्दाख के उस इलाके के करीब है जहां 2020 के गालवान घाटी हादसे के बाद से भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने डटी हुई हैं.
- मध्य एशिया से भारत का संपर्क पहले ही कटा था, अब घेराबंदी मजबूत : ऐतिहासिक सिल्क रूट के जमाने से लेकर 1947 में पाकिस्तान के अवैध कब्जे से पहले तक, भारत इसी वाखान कॉरिडोर और गिलगित के रास्ते सेंट्रल एशिया से व्यापार करता था. 1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद जब 5 नए मध्य एशियाई देश बने, तब भारत के पास वहां तक जाने का कोई सीधा जमीनी रास्ता नहीं था. अब चीन ने उस बचे-खुचे रास्ते पर भी अपना मजबूत शिकंजा कस लिया है.
- भारतीय पैसे से बनी ‘जरंज-डेलाराम’ रोड पर चीन का कब्जा : सबसे कड़वी सच्चाई ये है कि भारत ने अफगानिस्तान में कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च करके ‘जरंज-डेलाराम’ रोडबनाई थी, ताकि भारत ईरान के चाबहार पोर्ट से अफगानिस्तान तक पहुंच सके. अब डर ये है कि चीन वाखान कॉरिडोर की नई सड़क को भारत की ही बनाई हुई जरंज-डेलाराम रोड से जोड़कर ईरान के चाबहार और अब्बास बंदरगाह तक बेहद आसानी से पहुंच जाएगा. यानी लागत भारत की और फायदा चीन को!
- चाबहार पोर्ट पर अनिश्चितता के बादल : पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और तनाव के कारण भारत का ड्रीम प्रोजेक्ट ‘चाबहार पोर्ट’ पहले से ही मुश्किल में है. दूसरी तरफ चीन ने 2021 में ईरान के साथ 25 साल का एक बड़ा करार करके वहां 400 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया हुआ है. चीन अब चाबहार में अपने पैर बहुत तेजी से पसार रहा है.
- CASA रेलवे कॉरिडोर में चीन का दबदबा : हाल ही में कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और यूएई (UAE) ने मिलकर सेंट्रल एशिया-साउथ एशिया (CASA) रेलवे कॉरिडोर बनाने के लिए समझौते पर दस्तखत किए हैं. हालांकि चीन अभी इसमें सामने नहीं दिख रहा है, लेकिन इन देशों के पास इतना पैसा नहीं है कि वे इतना बड़ा रेल नेटवर्क खुद बना सकें. जाहिर है, इसके लिए भी अंत में चीन का ही दरवाजा खटखटाया जाएगा.
अब भारत कैसे निपटेगा?
चीन और तालिबान की इस जुगलबंदी से भारत को अपनी विदेश नीति और सीमा सुरक्षा रणनीति में बड़े बदलाव करने की सख्त जरूरत है.
- तालिबान से बातचीत: भारत को अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के साथ बिना हिचकिचाहट के सीधे और सकारात्मक कूटनीतिक संबंध मजबूत करने होंगे, ताकि तालिबान की जमीन का इस्तेमाल पूरी तरह चीन या पाकिस्तान के भारत विरोधी एजेंडे के लिए न हो सके.
- चीन के साथ सीधी सुरक्षा वार्ता: वाखान कॉरिडोर के आसपास की संवेदनशीलता को देखते हुए भारत को चीन के साथ द्विपक्षीय बातचीत जारी रखनी चाहिए ताकि इस इलाके में कोई नया सैन्य तनाव पैदा न हो.
- वैकल्पिक हवाई रास्ते: ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और पाकिस्तान द्वारा एयरस्पेस बंद करने के बाद भारत को अरबों का नुकसान हुआ है. शिनजियांग के खोतान शहर के ऊपर से भारतीय उड़ानों के एयरस्पेस इस्तेमाल करने जैसे विकल्पों पर काम करना एक सही दिशा में उठाया गया कदम हो सकता है.
चीन का वाखान कॉरिडोर में सड़क बनाना इस बात का साफ संकेत है कि एशिया का ‘ग्रेट गेम’ अब एक नए मोड़ पर पहुंच चुका है. भारत को अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा और संप्रभुता बनाए रखने के लिए अब और अधिक आक्रामक और व्यावहारिक कूटनीति अपनानी होगी.