‘डॉक्टर साहब बोले मेरे बच्चे का दिल पत्थर जैसा’, सिवनी अस्पताल में बिलखे परिजन, 6 महीने में 80 मासूमों की मौत


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Seoni News: मध्य प्रदेश के सिवनी में पिछले 6 महीने में 80 बच्चों की मौत हो गई है. बच्चों की मौत के बाद उनके परिजन बिलख रहे हैं और उन्होंने बताया आरोप लगाया है कि सही इलाज ना मिलने की वजह से बच्चों की मौत हुई है. बताया जा रहा है कि जिन बच्चों की मौत हुई है. उनमें से ज्यादातर स्पेशल न्यू बोर्न केयर यूनिट में भर्ती थे.

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'डॉक्टर बोले मेरे बच्चे का दिल पत्थर जैसा', सिवनी अस्पताल में बिलख रहे परिजनZoom

सिवनी में बच्चों की मौत के बाद बिलख रहे परिजन

Seoni News: सिवनी में बीते 3 महीने में 46 नवजात बच्चों की मौत सामने आने के बाद हड़कंप मच गया. जिला अस्पताल के स्पेशल न्यू बोर्न केयर यूनिट (SNCU) वार्ड में 1 जुलाई से 30 सितंबर के बीच कुल 592 बच्चों को एडमिट कराया गया और जिनमें से 46 बच्चों ने दम तोड़ दिया. यानी हर एक दिन के अंतराल में एक बच्चे की मौत हुई. वहीं 1 अप्रैल से 30 सितंबर के बीच यानी 6 महीने के दरमियान एसएनसीयू में 80 बच्चों की मौत हो चुकी है. बरघाट ब्लॉक के डुंगरिया गांव के रहने वाले मनीष वरकड़े की पत्नी ने 15 जुलाई को अपने पहले बच्चे को जन्म दिया था. फिर बच्चे को सांस लेने में तकलीफ और दिल की धड़कनें सामान्य ना होने की वजह से एसएनसीयू में भर्ती कराया गया, लेकिन कुछ घंटे बाद ही बच्चे की मौत हो गई.

मृत बच्चे के पिता मनीष वरकड़े ने बताया कि 12-13 जुलाई को पत्नी की अस्पताल में भर्ती कराया था, लेकिन किसी ने ध्यान ही नहीं दिया. दो दिन गुजर गए. फिर एक इंजेक्शन लगाए और कुछ नहीं बताया. पानी बहते जा रहा था तो नर्स ने बोला पेट दबाकर रखो. तीन दिन बाद पहले नॉर्मल डिलीवरी कर रहे थे. जब नॉर्मल डिलीवरी नहीं हुई, ऑपरेशन किया. बच्चे का वजन करीब 3 किलो था, लेकिन दिल पत्थर की तरह जम गया था. डॉक्टर्स ने बताया बच्चा रोया नहीं है. इसीलिए बचना मुश्किल है और आईसीयू में रख दिए.

6 दिन बाद बच्चे ने तोड़ा दम
बरघाट के ही जावरकाठी के रहने वाले संजय उइके की पत्नी ने 7 सितंबर पहले बच्चे को जन्म दिया. समय से पहले डिलीवरी होने की वजह से बच्चे का वजन कम था. साथ ही दिल की धड़कन काफी कम थी. बच्चे को एसएनसीयू में भर्ती कराया गया, लेकिन 6 दिन बाद बच्चे ने दम तोड़ दिया.

संजय उइके ने बताया दर्द
संजय उइके ने बताया कि पहले हम बरघाट लेकर गए. इसके बाद हमको सिवनी रेफर किया गया था. फिर वहां पर नॉर्मल डिलीवरी हो गई. इसके बाद एक मशीन में उसको रखा गया. उसकी सांसें कम चल रही हैं. फिर उन्होंने एक बड़ी मशीन में रख दिया और उसके बाद से ही बच्चे की मौत हो गई. अगर हम बताते कि दूसरी जगह शिफ्ट करना है, तो बच्चे की जान बच सकती थी. सातवें महीने में डिलीवरी हुई थी बच्चे का वज़न 1.6 किलो था.

बीजेपी विधायक ने किया जिले का दौरा
तीन महीने में 46 नवजात बच्चों की मौत की खबर बाहर आने के बाद स्थानीय बीजेपी विधायक दिनेश राय भी जिला अस्पताल पहुंचे. उन्होंने डॉक्टर्स की गैरमौजूदगी पर सवाल पूछे. विधायक ने इस बारे में जिला कलेक्टर से लेकर मुख्यमंत्री तक शिकायत करने की बात कही.

डॉक्टर साहब ने दी सफाई
जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ विनोद कुमार नावकर ने कहा कि एसएनसीयू में जो बच्चे भर्ती होते हैं. वो सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं कई बार 6 महीने या 7-8 महीने में पैदा हुए बच्चे रहते हैं. ऐसे बच्चे होते हैं, जिन्हें एस्फिक्सिया इंजरी होती है और पूरे जिले से आते हैं. सरकार ने हर जिले में एसएनसीयू की स्थापना इसीलिए की है, क्योंकि वहां गंभीर नवजात शिशु का इलाज होता है.

उन्होंने कहा कि बीते 6 महीने में हमने 1188 शिशुओं का उपचार किया है, जिनमें से 642 बच्चों का वजन सामान्य से कम था. उनमें से 60 बच्चों को हम नहीं बचा पाए. हालांकि WHO और सरकार की रिकमेंडेड रेट एसएनसीयू में मॉर्टलिटी का 10 फीसदी लेकिन हमारे यहां 7.5 फीसदी है. जबलपुर संभाग के बाकी जिलों के मुकाबले कम है. एक और वजह है, वो ये कि जिला अस्पताल सिवनी मेडिकल कॉलेज से संलग्न है. हम मेडिकल कॉलेज के शिशु रोग विभाग से जो सहयोग चाहते थे. उनका रोस्टर ही नहीं बना. यहां ड्यूटी करने का, अगर मेडिकल कॉलेज के शिशु रोग विभाग के डॉक्टर यहाँ ड्यूटी करेंगे तो हम और अच्छा कर पाएंगे.



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