Bal Mithai: कुमाऊं की फेमस बाल मिठाई आखिर कैसे पहुंची उत्तराखंड? यहां जानें इसका दिलचस्प इतिहास

Bal Mithai: कुमाऊं की फेमस बाल मिठाई आखिर कैसे पहुंची उत्तराखंड? यहां जानें इसका दिलचस्प इतिहास


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Bal Mithai History: उत्तराखंड के कुमाऊं की पहचान मानी जाने वाली बाल मिठाई सिर्फ अपने स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि इससे जुड़ी पुरानी कहानियों के लिए भी मशहूर है. अल्मोड़ा की इस खास मिठाई को लेकर मान्यता है कि इसकी परंपरा नेपाल से कुमाऊं तक पहुंची थी. इसके इतिहास को कटारमल सूर्य मंदिर और जोगा लाल शाह से भी जोड़कर देखा जाता है. खोये से बनने वाली इस मिठाई पर लगी सफेद चीनी की छोटी-छोटी गोलियां इसे अलग पहचान देती हैं. आज यह मिठाई कुमाऊं की संस्कृति और मेहमाननवाजी का हिस्सा बन चुकी है. लेकिन इसकी शुरुआत कैसे हुई, इसे पहले किस नाम से जाना जाता था और अल्मोड़ा में इसे लोकप्रिय बनाने का श्रेय किसे दिया जाता है? जानिए बाल मिठाई से जुड़ी ये दिलचस्प बातें.

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बागेश्वर: उत्तराखंड के कुमाऊं की बात हो और बाल मिठाई का जिक्र न आए, ऐसा कम ही होता है. गहरे भूरे रंग की इस मिठाई पर लगी छोटी-छोटी सफेद चीनी की गोलियां इसे सबसे अलग बनाती हैं. अल्मोड़ा की बाल मिठाई का स्वाद लोगों को इतना पसंद आता है कि यहां आने वाले कई पर्यटक इसे अपने साथ ले जाना नहीं भूलते. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस मशहूर मिठाई की शुरुआत कैसे हुई और इसे नेपाल से जोड़कर क्यों देखा जाता है? इसके इतिहास से जुड़ी कुछ ऐसी मान्यताएं भी हैं, जिनके बारे में कम ही लोग जानते हैं.

स्थानीय जानकार और वरिष्ठ व्यापारी नरेंद्र राणा बताते हैं कि बाल मिठाई की परंपरा नेपाल से कुमाऊं तक पहुंचने की मान्यता है. कुछ स्थानीय कहानियों में इसका संबंध सातवीं और आठवीं शताब्दी से भी जोड़ा जाता है. पुराने समय में इसे बालभोग के नाम से जाना जाता था. धीरे-धीरे कुमाऊं में इसे बनाने का चलन बढ़ा और अल्मोड़ा इसकी पहचान बन गया. जो आज पूरे उत्तराखंड में फ़ेमस है. इतना ही नहीं देश के पीएम नरेंद्र मोदी भी ये काफी पसंद है.

कटारमल सूर्य मंदिर से भी जुड़ी है मान्यता
बाल मिठाई के इतिहास से जुड़ी स्थानीय चर्चाओं में अल्मोड़ा के कटारमल सूर्य मंदिर का नाम भी आता है. मान्यता है कि कुमाऊं में इस मिठाई की परंपरा शुरू होने के बाद इसे मंदिर में भोग के रूप में चढ़ाया गया था. कटारमल सूर्य मंदिर उत्तराखंड के पुराने और खास सूर्य मंदिरों में से एक है. हालांकि, बाल मिठाई के पहले भोग से जुड़ी इस कहानी को स्थानीय मान्यता के तौर पर ही देखा जाता है.

जोगा लाल शाह ने दिलाई अलग पहचान
अल्मोड़ा की बाल मिठाई को लोकप्रिय बनाने का श्रेय स्थानीय मिठाई कारोबार से जुड़ी कहानियों में जोगा लाल शाह को दिया जाता है. प्रचलित जानकारी के मुताबिक, उन्होंने 19वीं शताब्दी में इस मिठाई को तैयार करने और बाजार में पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई. कुछ विवरणों में इसकी शुरुआत 1856 से 1865 के बीच बताई जाती है. ब्रिटिश शासन के दौर में अल्मोड़ा की मिठाइयों की पहचान आसपास के इलाकों तक पहुंचने लगी. धीरे-धीरे बाल मिठाई भी लोगों के बीच लोकप्रिय हो गई. समय के साथ यह कुमाऊं आने वाले पर्यटकों के लिए भी खास आकर्षण बन गई.

खोये से तैयार होती है बाल मिठाई
बाल मिठाई बनाने के लिए मुख्य रूप से खोये यानी मावे का इस्तेमाल किया जाता है. मावे को लगातार पकाया जाता है, जिससे उसका रंग गहरा भूरा हो जाता है और वह ठोस रूप लेने लगता है. इसके बाद इसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है. फिर इन टुकड़ों पर सफेद चीनी की छोटी-छोटी गोलियां लगाई जाती हैं. यही गोलियां बाल मिठाई को अलग पहचान देती हैं.

कुमाऊं की परंपरा का हिस्सा है बाल मिठाई
आज बाल मिठाई सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि कुमाऊं की पहचान का भी हिस्सा बन चुकी है. अल्मोड़ा के अलावा बागेश्वर और उत्तराखंड के दूसरे इलाकों में भी इसे खूब पसंद किया जाता है. त्योहार हो, घर में कोई खास मौका हो या मेहमानों का स्वागत करना हो, बाल मिठाई लोगों की पसंद में शामिल रहती है. यही वजह है कि समय के साथ इसकी लोकप्रियता बनी हुई है.



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