छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के सीतापुर के सुर के रहने वाले 65 वर्षीय बुर्जुग निहरसाय अपने हुनर और मेहनत के दम पर अपनी आजीविका चला रहे हैं. दरअसल, बुर्जुग बांस के टुकड़े को छीलकर पतली पट्टियां बनाने के बाद एक आकार देकर बुनाई कर रहे हैं, इसके लिए वे लकड़ी का औजार का इस्तेमाल करते हैं. अकसर बुजुर्ग होने के बाद लोग अपने कामकाज से दूरी बना लेते है. लेकिन सरगुजा का ये बुजुर्ग अपने दम पर घर चला रहा है. बाजारों में अपने हाथों से तैयार वस्तुओं को विक्री करते हैं जिसमें हर सीजन में अलग-अलग वस्तुएं बनाते हैं. जैसे झेलेगी, पथिया टोकरी घरना, जैसी पारंपरिक वस्तुएं तैयार करते हैं.. देखिए ये रिपोर्ट…
निहरसाय बताते हैं कि वे बचपन से बांस की वस्तुएं बनाने का काम कर रहे हैं, यह उनका बारहों महीने चलने वाला व्यवसाय है, लेकिन मौसम के अनुसार वस्तुओं के निर्माण में बदलाव होता रहता है. धान की कटाई के समय बोनी और सूप जैसी वस्तुएं बनाई जाती हैं, जबकि ठंड के मौसम में झेझरी, पथिया और झेलेगी बनाने का काम अधिक होता है. इसी हुनर के सहारे वे वर्षों से अपनी आजीविका चला रहे हैं.
हर काम में लगती है मेहनत
बांस की वस्तुएं तैयार करना आसान काम नहीं है. इसके लिए सबसे पहले बांस के टुकड़ों को छीलकर पतली पट्टियां बनाई जाती हैं. इसके बाद उन्हें आवश्यक आकार देकर बुनाई की जाती है. बांस को चिकना करने और छीलने के लिए वे लकड़ी से बने पारंपरिक औजार का इस्तेमाल करते हैं. निहरसाय आसपास के ग्रामीण इलाकों से बांस खरीदकर लाते हैं और फिर अपनी मेहनत से उसे उपयोगी वस्तुओं में बदल देते हैं.
150 से 500 रुपये तक में बिकती हैं तैयार वस्तु
निहरसाय के अनुसार, उनके हाथों से बनी वस्तुओं की कीमत आकार और प्रकार के हिसाब से तय होती है. बाजार में उन्हें लगभग 150 से 500 रुपये तक में बेचा जाता है. एक टोकरी बनाने में करीब दो दिन लगते हैं, जबकि झेल्गी तैयार करने में लगभग तीन दिन का समय लगता है. तैयार सामान को वे सीतापुर के बाजार में बेचते हैं. इससे उन्हें आमदनी हो जाती है और घर का खर्च चलाने में मदद मिलती है..
झेल्गी की ज्यादा मांग, खेती-किसानी में आती है काम
निहरसाय बताते हैं कि उनकी बनाई सभी वस्तुओं की मांग रहती है, लेकिन मौजूदा मौसम में झेल्गी अधिक पसंद की जा रही है इसका उपयोग मिट्टी, घास और धान ढोने के लिए किया जाता है, ग्रामीण जीवन में ऐसी पारंपरिक वस्तुएं आज भी उपयोगी हैं यही वजह है कि मेहनत से तैयार किए गए उनके सामान को खरीदार मिल जाते हैं.
तीन दिन में तैयार होता है मुर्गियां रखने वाला घरना
इन दिनों निहरसाय बांस से घरना भी तैयार कर रहे हैं, जिसका उपयोग मुर्गियों को रखने और ढ़कने के लिए किया जाता है. इसे बनाने में करीब तीन दिन का समय लगता है और इसकी कीमत लगभग 400 रुपये है. निहरसाय का कहना है कि उम्र बढ़ने के बावजूद वे अपने पारंपरिक हुनर को नहीं छोड़ना चाहते इसी काम के सहारे वे आत्मनिर्भर बने हुए हैं और अपनी मेहनत से जीवन यापन कर रहे हैं.
पारंपरिक हुनर ही बना आजीविका का सहारा
निहरसाय साय की कहानी ग्रामीण जीवन में पारंपरिक कारीगरी के महत्व को दिखाती है. बांस से उपयोगी वस्तुएं तैयार करने की कला न केवल उनकी आजीविका का साधन है, बल्कि गांवों की पुरानी परंपरा को भी जीवित रखे हुए है. सीमित संसाधनों के बीच उनका हुनर और मेहनत यह बताती है कि पारंपरिक कारीगरी आज भी रोजगार का एक माध्यम बनी हुई है..