उस महिला ने उनसे अपनी मौत के बाद चिता को आग देने की गुजारिश की थी, क्योंकि उसका अपना बेटा उसे जीते-जी रोटी और पानी तक नहीं देता था. इसी घटना ने अनिरुद्धाचार्य को बेसहारा माताओं की सेवा के लिए प्रेरित किया.
एक बुजुर्ग मां की बात सुनकर बदला सेवा का संकल्प
इंटरव्यू में किशोर अजवानी ने अनिरुद्धाचार्य से पूछा कि उन्हें कैसे लगा कि वह इस रास्ते पर आएंगे, कथावाचक बनेंगे और फिर एक सेलिब्रिटी के तौर पर पहचाने जाने लगेंगे. इस पर अनिरुद्धाचार्य ने कहा कि उन्होंने खुद कुछ नहीं सोचा था. उनके मुताबिक, भगवान ने उनसे जो करवाया, वह होता चला गया.
अनिरुद्धाचार्य ने बताया कि करीब 2016 या 2017 के आसपास एक बुजुर्ग महिला उनके पास आई थी. उस महिला ने उनसे कहा कि जब उसकी मौत हो जाए, तो वह उसकी चिता को आग दे दें. यह बात सुनकर अनिरुद्धाचार्य ने उससे पूछा कि जब उसका अपना बेटा है, तो वह अंतिम संस्कार क्यों नहीं करेगा?
बेटे से नहीं मिलता था रोटी-पानी, मां ने बताई अपनी पीड़ा
अनिरुद्धाचार्य के मुताबिक, उस बुजुर्ग महिला ने जवाब दिया कि उसका बेटा उसे रोटी और पानी तक नहीं देता. ऐसे में जब बेटा जीते-जी उसकी देखभाल नहीं कर रहा, तो वह उससे अंतिम संस्कार की उम्मीद कैसे करे?
अनिरुद्धाचार्य ने इंटरव्यू में बताया कि महिला की यह बात उनके मन में बैठ गई. उन्हें लगा कि शायद भगवान ने उन्हें ऐसी ही बेसहारा माताओं की सेवा के लिए चुना है, जिन्हें अपने ही परिवार से सहारा नहीं मिल रहा. उन्होंने कहा कि उस घटना के बाद उन्होंने अपना संकल्प बदल दिया और तय किया कि वह ऐसी महिलाओं की सेवा करेंगे.
कथा वाचन के साथ बुजुर्ग माताओं की सेवा पर जोर
अनिरुद्धाचार्य ने बताया कि उन्होंने बेसहारा माताओं की सेवा को अपने जीवन का हिस्सा बनाया. उनके अनुसार, भगवान शायद उनसे यही काम करवाना चाहते थे. इंटरव्यू में उन्होंने गौरी गोपाल आश्रम का जिक्र करते हुए कहा कि वहां करीब 300 से अधिक वृद्ध माताओं की सेवा की जाती है, जो बिल्कुल बेसहारा हैं.
किशोर अजवानी के सवाल के जवाब में सुनाया गया यह किस्सा अनिरुद्धाचार्य के जीवन के उस पहलू को सामने लाता है, जिसमें कथा वाचन के साथ बुजुर्ग महिलाओं की सेवा का संकल्प भी जुड़ा है. उनकी बातों के मुताबिक, इस रास्ते की शुरुआत किसी बड़ी योजना से नहीं, बल्कि एक जरूरतमंद मां की पीड़ा सुनने के बाद हुई थी.