अनिरुद्धाचार्य क्यों नहीं बने डॉक्टर या इंजीनियर? खुद बताया कैसे चुनी कथा की राह, 30 रुपये फीस वाले स्कूल से जुड़ी है कहानी


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Aniruddhacharya Career: अनिरुद्धाचार्य महाराज ने बताया कि उनका बचपन खेती-किसानी वाले गांव में बीता, जहां डॉक्टर और इंजीनियर जैसे पेशों की जानकारी सीमित थी. आर्थिक परिस्थितियों के बीच उन्होंने पढ़ाई की और सत्यनारायण कथा सुनाने से धार्मिक कथाओं के प्रति रुचि बढ़ी. भागवत सुनाना और समाज की सेवा करना उनका लक्ष्य बन गया.

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अनिरुद्धाचार्य कैसे बने कथावाचक, खुद बताई बचपन की कहानी

Aniruddhacharya Career: अनिरुद्धाचार्य महाराज ने बताया कि बचपन में उनके मन में कभी डॉक्टर या इंजीनियर बनने की इच्छा नहीं आई. उनका सपना भागवत कथा सुनाने और समाज की सेवा करने का था. इसकी एक खास वजह उनके गांव का माहौल और परिवार की परिस्थितियां थीं. न्यूज18 के एंकर किशोर अजवानी के साथ एक इंटरव्यू में उन्होंने अपने बचपन, पढ़ाई और कथावाचक बनने के शुरुआती सफर के बारे में बताया. उन्होंने कहा कि उनका गांव काफी पिछड़ा हुआ था.

वहां के ज्यादातर लोग खेती करते थे और बच्चों को डॉक्टर या इंजीनियर जैसे पेशों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी. ऐसे माहौल में अनिरुद्धाचार्य की रुचि धार्मिक कथाएं सुनाने में बढ़ी. उन्होंने इसी काम को अपना लक्ष्य बनाया और आगे बढ़ते गए.

गांव में खेती करते थे लोग, डॉक्टर-इंजीनियर के बारे में नहीं थी जानकारी

अनिरुद्धाचार्य ने बताया कि वह एक ऐसे गांव से आते हैं, जहां लोगों की जिंदगी खेती-किसानी के आसपास ही घूमती थी. उनके गांव में ज्यादातर बच्चे किसानों के परिवारों से थे. ऐसे में उनके आसपास डॉक्टर या इंजीनियर बनने की प्रेरणा देने वाला कोई खास उदाहरण नहीं था. उन्होंने बातचीत में कहा कि गांव के लोग डॉक्टर और इंजीनियर जैसे पेशों के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे. इसलिए उनके मन में भी इन क्षेत्रों में करियर बनाने का विचार नहीं आया. उनके लिए कथावाचन का रास्ता ज्यादा जाना-पहचाना था.

30 रुपये फीस वाले स्कूल में की पढ़ाई

अनिरुद्धाचार्य ने अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए बताया कि उन्होंने सातवीं कक्षा तक सरकारी स्कूल में पढ़ाई की. इसके बाद वह एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ने गए, जहां महीने की फीस 30 रुपये थी. उन्होंने बताया कि उनके पिता के लिए हर महीने 30 रुपये फीस देना भी मुश्किल था. ऐसे में फीस कम कराने के लिए प्रार्थना की गई और 20 रुपये फीस तय हुई. इस तरह उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी. उनकी यह बात उनके शुरुआती जीवन की आर्थिक परिस्थितियों को समझने में मदद करती है. हालांकि, बातचीत में उन्होंने अपनी पढ़ाई के आगे के सफर के बारे में विस्तार से जानकारी नहीं दी.

ब्राह्मण परिवार और कथा सुनाने से जुड़ाव ने दिखाई राह

अनिरुद्धाचार्य ने बताया कि वह ब्राह्मण परिवार से थे और सत्यनारायण भगवान की कथा सुनाया करते थे. इसी वजह से उनका धार्मिक कथाओं से जुड़ाव बना. उन्होंने कहा कि उन्हें भागवत कथा सुनाने और समाज की सेवा करने की इच्छा थी. उनके मुताबिक, कथा सुनाना उनके लिए सहज था. इसलिए उन्होंने इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने का फैसला किया. उन्होंने यह भी बताया कि बचपन से ही उनके मन में भागवत सुनाने की इच्छा थी.

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कथावाचक बनने के पीछे क्या थी वजह?

अनिरुद्धाचार्य की बताई कहानी से पता चलता है कि उनके करियर की दिशा तय होने में गांव का माहौल, परिवार की आर्थिक स्थिति और धार्मिक कथाओं से शुरुआती जुड़ाव की भूमिका रही. जहां कई बच्चे अपने आसपास के लोगों को देखकर करियर चुनते हैं, वहीं उनके मामले में कथा सुनाने का अनुभव ही आगे बढ़ने की वजह बना. हालांकि, इस बातचीत में उन्होंने कथावाचक बनने के बाद के संघर्ष, वृंदावन पहुंचने या लोकप्रियता हासिल करने के पूरे सफर का जिक्र नहीं किया. इसलिए उनके जीवन की पूरी कहानी समझने के लिए उनके दूसरे इंटरव्यू और उपलब्ध जानकारियों को भी देखना जरूरी है.



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