Jaisalmer: 250 साल पुराना रहस्य और एक रात में वीरान हुए 84 गांव, जानिए कुलधरा के श्राप और पालीवाल ब्राह्मणों के पलायन की पूरी कहानी


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Jaisalmer Kuldhara History: जैसलमेर का कुलधरा गांव आज भले ही ‘हंटेड विलेज’ के रूप में जाना जाता हो, लेकिन इसका इतिहास पालीवाल ब्राह्मणों के अदम्य स्वाभिमान और त्याग की कहानी कहता है. रियासत काल में सालिम सिंह के अत्याचारों के विरोध में 84 गांवों के पालीवाल समाज ने एक ही रात में अपनी जन्मभूमि छोड़ने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था. काठोड़ी मंदिर में नमक मिला पानी पीकर लिए गए संकल्प के बाद वे हमेशा के लिए जैसलमेर छोड़कर चले गए और पीछे छोड़ गए एक वीरान मरुधरा व अनसुने किस्से.

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Jaisalmer: कुलधरा का सच, एक रात में क्यों उजड़ गए थे 84 गांव?Zoom

Jaisalmer Kuldhara History: कुलधरा गांव और 84 गांवों के उजड़ने की कहानी

जैसलमेर: राजस्थान की रंग-बिरंगी संस्कृति और ऐतिहासिक धोरों की भूमि जैसलमेर का कण-कण अपने भीतर अनगिनत रहस्य समेटे हुए है. स्वर्णनगरी जैसलमेर से कुछ ही दूरी पर स्थित ‘कुलधरा’ गांव आज भले ही भूतों की काल्पनिक कहानियों और ‘हंटेड विलेज’ के रूप में देश-दुनिया में प्रसिद्ध हो, लेकिन इस वीरान जगह के पीछे एक गौरवशाली इतिहास, स्वाभिमान की अनूठी दास्तान और एक ही रात में 84 गांवों के उजड़ने की दर्दनाक सच्चाई छिपी है. न्यूज18 के संवाददाता सांवलदान रतनू की रिपोर्ट के अनुसार, कुलधरा से जुड़े उन तमाम मिथकों को खारिज किया जा चुका है, जिनमें यहां भूतों के होने का दावा किया जाता है. आइए जानते हैं कि आखिर क्या था कुलधरा का वास्तविक इतिहास और क्यों एक ही रात में 84 गांवों के पालीवाल ब्राह्मणों ने अपनी जन्मभूमि को अलविदा कह दिया था.

यह घटना जैसलमेर के रियासत काल की है, जब शौर्य और स्वाभिमान के प्रतीक पालीवाल ब्राह्मण जाति के लोगों ने अपनी आन-बान और आत्मसम्मान की खातिर एक ही रात में अपने 84 गांवों को खाली कर दिया था. मूल रूप से पाली जिले से संबंधित पालीवाल समाज जब पाली से विस्थापित हुआ, तब जैसलमेर रियासत के तत्कालीन महारावल ने उनकी कर्मशीलता, व्यापारिक कुशलता और उनके विशेष हुनर को पहचाना. महारावल ने उन्हें जैसलमेर में बसने का न्योता दिया, ताकि इन मेहनती लोगों के कौशल से थार की बंजर मरुभूमि में भी कृषि और फसल उत्पादन को बढ़ावा मिल सके. महारावल ने उन्हें वचन दिया था कि वे जब तक चाहें जैसलमेर में रह सकते हैं, राज्य उनके बसने का पूरा प्रबंध करेगा और उनसे किसी भी प्रकार का कर (लगान) नहीं लिया जाएगा.

थार के रेगिस्तान में खेती की कला और आर्थिक समृद्धि की चाबी
पालीवाल अपनी कुशाग्र बुद्धि, व्यापारिक कला और प्रयोगधर्मिता के लिए जाने जाते थे. थार के रेगिस्तान में गेहूं जैसी अधिक पानी चाहने वाली फसलों को उगाने की अद्भुत कला में वे माहिर थे. वे जिप्सम और चट्टानी भूमि के नीचे बहने वाले पानी की सही पहचान कर उसका उपयोग करना बखूबी जानते थे. उस कालखंड में जैसलमेर की आर्थिक समृद्धि की चाबी वस्तुतः पालीवाल समाज के हाथों में थी, जिसे उन्होंने अपनी प्रतिभा से कई बार साबित भी किया था.

सालिम सिंह के अत्याचार के खिलाफ एक लोटे नमक से लिया गया ऐतिहासिक संकल्प
आज के कुलधरा सहित अन्य 83 उजड़े हुए गांवों को जो पर्यटक कौतूहल से देखते हैं, वे उन पालीवाल समाज के स्वाभिमान के गवाह हैं. इतिहासकार एवं पालीवाल रिसर्च फाउंडेशन के फाउंडर डॉ. ऋषिदत्त कुलधरा के अनुसार, जब तत्कालीन रियासत में सामंती अत्याचार बढ़ने लगे, तब 84 गांवों के पालीवाल काठोड़ी के ऐतिहासिक मंदिर में एकत्र हुए. वहां उन्होंने एक ही लोटे से नमक मिला पानी पीकर यह ऐतिहासिक संकल्प लिया कि वे अपनी जन्मभूमि और कर्मभूमि भले ही छोड़ दें, लेकिन सामंत सालिम सिंह (सालम) के अन्याय और अत्याचार के आगे कभी अपना सिर नहीं झुकाएंगे. उन्होंने तय किया कि वे सालिम सिंह द्वारा लगाया गया कोई कर नहीं चुकाएंगे और इसी संकल्प के साथ हमेशा के लिए जैसलमेर को अलविदा कह दिया.

बिना पलक झपके छोड़ा घर-आंगन, मरुधरा को दे गए श्राप
वे एक ऐसी सुबह थी जब किसी ने उन्हें रोकने के लिए हाथ आगे नहीं बढ़ाया और न ही अपने घरों को छोड़ते समय उनके कदम ठिठके. अपनी मातृभूमि को स्वर्ग बनाने वाले ये मर्मज्ञ कारीगर अपना सब कुछ पीछे छोड़कर सिर्फ अपना स्वाभिमान, अपनी इज्जत और अपना वजूद बचाने के लिए निकल पड़े. वे तो हमेशा के लिए चले गए, लेकिन जाते-जाते इस मरुधरा को श्रापग्रस्त कर गए. उस दिन मानो आसमान भी उनके साथ रोया हो, लेकिन कोई ऐसा नहीं आया जो इस रेगिस्तान को सरसब्ज बनाने वाले उन हुनरमंदों को रोक पाता. वे चलते रहे, चलते रहे और एक ही रात में अपने घर-आंगन, खेत-खलिहान और अपनी बसी-बसाई दुनिया को हमेशा के लिए सूना छोड़ गए.



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